1 NO तरीका जो गेंहू की उन्नत खेती को ज्यादा पैदावार बना देगा

आज हम अपने ब्लॉग में गेंहू की उन्नत खेती, गेंहू की उपज, गेंहू की खेती कैसे करें, गेंहू की खेती की जानकारी, गेंहू की उन्नत खेती के नियम, गेंहू की खेती के टिप्स, गेंहू की उन्नत बीजों की खेती, गेंहू की खेती के लाभ, गेंहू उत्पादन में उच्च उपज, आदि के बारे में बिस्तार से बात करेंगे जानकारी के लिए लास्ट तक जरूर पढ़े |

गेहूँ क्षेत्रफल एवं उत्पादन की दृष्टि से दुनिया की प्रथम महत्वपूर्ण फसल है। अपने प्रदेश में इसकी खेती मुख्यतः रबी के मौसम में की जाती है।गेहूँ की उन्नत खेती किस्मे प्रदेश में गेहूँ के उत्पादन वृद्धि की पर्याप्त संभावनाएं विद्यमान है जो विकसित वैज्ञानिक तकनीकों के अनुसरण द्वारा बढ़ाई जा सकती है। उत्पादन ही नहीं पोषण के दृष्टि से भी यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

गेहूँ में 8-12 प्रतिशत प्रोटीन, 62-71 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 1.2-2.0 प्रतिशत वसा, 2.0-2.5 प्रतिशत रेशा और लगभग 2 प्रतिशत राख पाई जाती है तथा विटामिन के रूप में बी1, बी2 तथा बी3 भी पाई जाती है। खनिज के रूप में लोहा, जस्ता, फास्फोरस, मैग्निशियम, मैग्नीज इत्यादि पाये जाते हैं।

प्रदेश में गेहूँ का मुख्य उपयोग रोटी बनाने के लिए होता है इसके अलावा गेहूँ से दलिया, हलवा, मिठाई, पावरोटी, बिस्कुट आदि पदार्थों का निर्माण होता है तथा गेहूँ से उच्च कोटि की मदिरा का भी निर्माण किया जाता है। इसके दाने से आटा एवं मैदा बनाने पर मिलने वाले छिलकों का उपयोग पशु चारे के लिए तथा फसल के सूखे वानस्पतिक भाग (भूसा) चारे के रूप में उपयोग किया जाता है।

Table of Contents

गेंहू की उन्नत खेती के लिए आधुनिक खेत की तयारी

गेंहू की उन्नत खेती के लिए एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हैरो तथा दो-तीन जुताई कल्टीवेटर से या देशी हल से करते हैं या एक जुताई रोटावेटर से कर लेते हैं। अंत में पाटा चलाकर खेत तैयार कर लेते हैं गेंहू की उन्नत खेती।

doubling agricultural income goal of doubling agricultural income

ज्यादातर धान के बाद गेहूँ की खेती की जाती है, धान का ठूंठ सड़ाने के लिये 40 किग्रा. यूरिया प्रति हेक्टेयर की दर से डालकर पलेवा करके ओट आने पर उपरोक्त विधि से खेत तैयार करने पर जमाव एवं फसल का विकास अच्छा रहता है।

भूमि शोधन के लिये फॉस्फेटिका कल्चर 2.5 किग्रा. तथा एजोटोबैक्टर 2.5 किग्रा. और ट्राइकोडर्मा पाउडर 2.5 किग्रा. इन तीनों जैविक कल्चरों को एक हे. खेत के लिये 60 से 75 किग्रा. गोबर की सड़ी खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरांत बुवाई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देने से अनावृत कन्हुआ, करनाल बन्ट आदि रोगों के प्रबन्धन में सहायता मिलती है।

गेंहू की उन्नत खेती के लिए उपयुक्त बीज की मात्रा

सामान्य परिस्थिति में -100 kg प्रति हेक्टेयर

बिसम परिस्थिति– 125 kg प्रति हेक्टेयर

बीज सोधन के कुछ निम्न प्रकार है

.थिरम : 2 . 5 ग्राम/प्रति kg बीज की दर

कार्बेंडाजिम : 2 . 5 ग्राम/प्रति kg की दर से

तरिकोडर्मा स्पोर :5 ग्राम /kg दर से

इन तीनो दवाओं को मिलकर घड़े में 8 -10 तक डालकर हिलाते रहे और उसके बाद बीज को बोया जाता है |

गेहूँ की उन्नत खेती लाभ

माव अच्छा होता है एवं बीज से होने वाले गेहूँ की उन्नत खेती ME रोगों से रक्षा होती है तथा मिट्टी से पैदा होने वाली बीमारियों को कम करता और रोकता है।

गेंहू की उन्नत खेती के लिए सावधानियाँ जरुरी

.रासायनिक विधि(vagyanik bidhi) :-में रसायनों की निर्धारित मात्रा ही प्रयोग करनी चाहिए।

दीमक से होने वाले नुकसान के लिए बीज को 3 मिली ग्राम / किग्रा. क्लोरोपाइरीफॉस नाम की दवा से उपचारित करके बोना चाहिए।

एक से अधिक प्रकार के शोधन करने में एफ-आई-आर क्रम के अनुसार ही प्रयोग करना चाहिए। अर्थात् : एक – फॅन्जीसाइड – फफूँदनाशी से, फिर आई. – इन्सेक्टिसाइड – कीटनाशी से और अन्त में आर. – राइजोबियम कल्चर बायो एजेन्ट से. के क्रम में शोधन करना चाहिए ।

गेंहू की उन्नत खेती के लिए बुआई की विधियाँ

गेहूँ की बुआई मुख्यतः निम्न प्रकार से की जाती है –

1. हल के पीछे कूड़ में

2. सीडड्रिल मशीन द्वारा

3. डिबलर द्वारा

4. जीरो टिल ड्रिल मशीन द्वारा

5. ऊभरी हुई क्यारी विधि द्वारा हैं।

गेंहू की उन्नत खेती के लिए बुआई की जीरो टिल विधि

गेंहू की उन्नत खेती जिन क्षेत्रों में नमी की अधिकता रहती है और खरीफ की फसल कटने के बाद खेत में ओट जल्दी नहीं आता जिसके कारण जुताई न हो पाने से गेहूँ की बुआई देरी से करना मजबूरी होता है। ऐसे क्षेत्रों में बिना जुताई के गेहूँ की बुआई अर्थात जीरो टिल ड्रिल विधि बहुत उपयोगी होती है।

लाभ : इस विधि से बुआई में 2000 से 2500 रूपये तक की बचत प्रति हेक्टेयर हो जाती है। गेहूँ की बुआई 8 से 10 दिन पहले की जा सकती है। पौधों की उचित संख्या एवं उर्वरक का प्रयोग सही स्थान पर तथा धान के एक फिट तक ठूंठ वाले में भी श्रेष्ठता से बुआई सम्भव हो पाती है। गेहूँ का मुख्य खरपतवार गेहुँसा का प्रकोप कम होता है। सीपेज अर्थात् जल रिसाव वाली जमीन के लिये यह विधि बहुत लाभदायी है।

सावधानियाँ : बीज दर 125 किग्रा. प्रति हेक्टेयर अवश्य रखनी चाहिए। दानेदार उर्वरक एन. पी.के. का ही प्रयोग करना चाहिए। पहली सिंचाई बुआई से 15 दिन बाद करनी चाहिए। भूमि समतल होनी चाहिए।

गेंहू की उन्नत खेती के लिए कुछ खाद और उर्वरक की मात्रा

गेंहू की उन्नत खेती खाद एवं उर्वरक का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना चाहिए। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए कम्पोस्ट खाद 60 कुन्तल प्रति हेक्टेयर अवश्य

प्रयोग करें।

1.कम्पोस्ट खाद

2.यूरिया

3.म्यूरेट ऑफ पोटाश

4.सिंगल सुपर फॉस्फेट

5.डाई अमोनियम फॉस्फेट

सामान्य दशा में : 150 किग्रा. नाइट्रोजन, 60 किग्रा. फॉस्फोरस एवं 40 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर आवश्यक है।

बुन्देलखण्ड क्षेत्र : 120:60:40 न.फा. पो. किग्रा./हे. तथा 30 किग्रा. गन्धक / हे. प्रयोग करें विलम्ब के लिए : 80 किग्रा. नाइट्रोजन, 40 किग्रा. फॉस्फोरस एवं 30 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर आवश्यक है।

अन्य तत्वों की पूर्ति के लिए : गन्धक 30 किग्रा., सूक्ष्म पोषक तत्व मिश्रण 20 से 25 किग्रा. प्रति हेक्टेयर आवश्यक है।

गेंहू की उन्नत खेती के लिए खरपतवारो का नियंत्रण

  1. फेलरिस माइनर (गेंहू का मामा)/जंगली जई

2. गेंहू में मुख्यतः गेंहू का मामा , जई खरपतवार पाए जाते है |

3. जिनकी एक या दो बार निराई के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है |

गेंहू की उन्नत खेती के लिए इनको पहचानने का मुख बिंदु

गेंहू की उन्नत खेती कैसे करेwheat farming kaise kare

. गेंहू का मामा – जड़ के पास तना लाल होता है

. गेंहू का मामा -इस तरह की हरे रंग की बलि बनती है

.गेंहू का मामा –पुष्पावस्था में

.जंगली जई बीज बनने की अवस्था में

रासायनिक नियंत्रण : आइसोप्रोट्यूरान 75 प्रतिशत डब्लू.पी. की 1.25 किग्रा./हे. या सल्फोसल्फ्यूरान 75 डब्लू. जी. की 33 ग्राम (2.5 यूनिट) या सल्फोसल्फ्यूरान 75% + मेटसल्फ्यूरान 5% की 40 ग्राम (2.5 यूनिट), 500-600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर बुआई के 25-30 दिन बाद छिड़काव करते हैं।

नोट : खरपतवार न जमने के लिए बुआई के 72 घण्टे के अन्दर पैन्डीमैथिलीन 30 ईसी की 3.3 लीटर मात्रा 500 से 600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हे. फ्लैट फैन नोजल से छिड़काव करते हैं।

गेंहू की उन्नत खेती के लिए प्रमुख रोग का परिक्षण

इस रोग में बालियों में दाने के स्थान पर काला चूर्ण बन जाता है। इसकी रोकथाम के लिए 2.5 ग्राम कारबेंडाजिम या 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा से प्रति किग्रा. बीज शोधित करके बोना चाहिए। रोग ग्रसित पौधे को उखाड़कर जला देना चाहिए।

करनाल बन्ट

इस रोग में बालियों में दाने आंशिक रूप से काले चूर्ण में बदल जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए 2.5 ग्राम कारबेन्डाजिम या 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा से प्रति किग्रा. बीज शोधित करके बोना चाहिए । रोग ग्रसित पौधे को उखाड़कर जला देना चाहिए।

चूर्णीय आसिता रोग

इस रोग में पत्तियों पर भूरे रंग के चूर्णीय धब्बे प्रकट होते हैं। इसके रोकथाम के लिए रोग रोधी प्रजातियाँ उगानी चाहिए तथा रोग लगने पर जिनेब या मैंकोजेब या जिरम दवा की 2 किग्रा. मात्रा 750 लीटर पानी में घोलकर /हे. छिड़काव करना चाहिए ।

पत्ती का रस्ट

इस रोग में पत्तियों पर धब्बे बन जाते हैं। इसके रोकथाम के लिए रोग-रोधी प्रजातियाँ उगानी चाहिए तथा रोग लगने पर जिनेब या मैंकोजेब या जिरम दवा की 2 किग्रा. मात्र 750 लीटर पानी में घोलकर/हे. छिड़काव करना चाहिए।

गेंहू की उन्नत खेती के लिए प्रमुख कीट की जाँच

गेहूँ की गुजिया

यह मटमैले भूरे रंग का एवं लगभग 7 मिमी. लम्बा होता है। इसके अगले पंख पिछले पंखों की अपेक्षा लम्बे होते हैं। पंखों की उपस्थिति के बावजूद यह कीट उड़ने में असमर्थ होता है।

क्षति : इस कीट की प्रौढ़ एवं ग्रब, दोनों ही अवस्थाएं हानिकर होती हैं। प्रौढ़ कीट गेहूँ के नवजात पौधों की निचली पत्तियों या पूरे पौधे को भूमि की सतह से काट देते हैं। इस कीट का प्रकोप नवम्बर माह

अधिक होता है। ग्रब मिट्टी में रहकर पौधे की जड़ें खाते रहते हैं, जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं या सूख जाते हैं।

नियंत्रण के उपाय : खेत, मेड़ आदि के आस-पास के घास या खरपतवारों को नष्ट कर देना चाहिए। निराई-गुड़ाई क्रियाएं उचित समय पर करते रहने से इनका प्रकोप कम हो जाता है। सूंड़ी परजीवी, जैसे बैरिकन्युमोन एबेटोरियस का प्रयोग करके सूड़ियों को नष्ट कर देना चाहिए। ब्यूवेरिया बैसियाना 1.15% बायोपेस्टीसाइड (जैव कीट नाशी) की 2.5 किग्रा./हे. 60-70 किग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8-10 दिन छाया में रखने के उपरान्त बुवाई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिलादेने से दीमक / गुजिया से बचाव हो जाता है।

गेहूँ का माहूं या एफिड

यह एक हरे रंग का मुलायम कीट है। अक्टूबर-नवम्बर माह

अन्य पढ़े

आलू की फायदेमंद खेती की जानकारी

ड्रैगन फ्रूट्स की खेती

मुंग की खेती से मुनाफा कैसे निकले

में ये पंखदार कीट पहाड़ों से प्रवास करके आते हैं। इसके बाद ये पंखहीन बच्चों को जन्म देते हैं और फिर ग्रीष्म में पंखधारी एफिड (माहू) पहाड़ों पर प्रवास करने चले जाते हैं।

क्षति : इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ दोनों ही पत्तियों एवं बालियों का

रस चूसकर पौधों को हानि पहुँचाते हैं, जिससे पौधों में आवश्यक पौषक तत्वों की कमी हो जाती है एवं पौधे पीले पड़ जाते हैं।

नियंत्रण के उपाय : खेत, मेड़ आदि के आसपास के घास या खरपतवारों को नष्ट कर देना चाहिए।

प्रारम्भ में ही पौधे के प्रभावित भाग को तोड़कर जला देना चाहिए। शक्तिचालित छिड़काव यंत्र के माध्यम से पौधों को पानी से धो देना चाहिए। इससे कीट गिरकर नष्ट हो जाते हैं। कर्षण क्रियाएं उचित समय पर करने से इनका प्रकोप कम होता है। इसका प्रभावी परभक्षी कॉक्सिनेला भृंग है, जो 10 से 30 माहू (एफिड) प्रतिदिन खाता है तथा सिर्फिडी मक्खी के डिम्भक माहू (एफिड) को खा जाते हैं।

इनको बढ़ावा देना चाहिए। मिथाइल-ओ-डिमेटान 25प्रतिशत या थायोमिथान 25 प्रतिशत ई.सी. की 1 लीटर, 750 लीटर पानी में घोलकर/हे. छिड़काव करना चाहिए। या एजाडिरैक्टिन (नीम ऑयल) 0.15 प्रतिशत ई.सी. 2.5 लीटर/हे. की दर से प्रयोग कर सकते है।

गेंहू की उन्नत खेती की कटाई, मड़ाई एवं भण्डारण

कटाई

बालियाँ पक जाने पर हँसिया अथवा कम्बाइन हार्वेस्टर मशीन से कटाई कर लेते हैं।

कटाई के बाद अच्छी तरह सूख जाने के बाद थ्रेसर से मड़ाई करते हैं।

उपज एवं भण्डारण

प्रजातियों तथा खेत की उर्वरता के आधार पर उपज प्राप्त होती है।

सामान्यतः 50-55कुन्तल दाना एवं 35-40 कुन्तल भूसे का प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन हो जाता है। उत्पादित गेहूँ को अच्छी तरह सुखा कर (12 प्रतिशत नमी पर) धातु से बनी बखार या कोठियों में अल्यूमिनियम फॉसफाइड की 3 ग्राम की 2 गोली प्रति कुन्तल या ई.डी.बी. एमप्यूल 3 एम.एल. प्रति कुन्तल की दर से बखार/ कोठी को हवा अवरोधी बनाकर रखते हैं ।

गेंहू की उन्नत खेती के प्रभावी बिन्दु

  • जीवांश खादों का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।
  • शुद्ध एवं प्रमाणित बीज की बुआई बीज शोधन के बाद ही करनी चाहिए। प्रजातियों का चयन स्थान, समय एवं सुविधा विशेष के आधार पर करना चाहिए। तीन वर्ष बाद बीज अवश्य बदल देना चाहिए।
  • खाद एवं उर्वरक की मात्रा मृदा परीक्षण के आधार पर सही समय एवं उचित विधि से प्रयोग करना चाहिए ।
  • सिंचाई क्रान्तिक अवस्थाओं पर समय से एवं उचित मात्रा में करनी चाहिए।
  • कीड़े एवं बीमारी से बचाने के लिए नियमित निगरानी करनी चाहिए तथा आई.पी.एम. विधि अपनानी चाहिए।
  • गेहूँसा (गेहूँ का मामा) का प्रकोप होने पर उसका नियंत्रण समय से करना चाहिए।
  • मृदा के स्वास्थ्य एवं संरचना के लिए भूमि शोधन अवश्य करना चाहिए।
  • बीज बोने से पहले बीज का जमाव परीक्षण कर लेना चाहिए।
  • सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग भी करना चाहिए।
  • सिंचाई पतली क्यारियाँ एवं पट्टियाँ बनाकर ही करनी चाहिए।
  • दाना न झड़ने के लिए फसल पकने के बाद कटाई समय से करना चाहिए ।
  • भण्डारण के लिये गेहूँ का दाना ठीक से सुखाकर (12 प्रतिशत नमी पर ) रखना चाहिए।

मुख्य प्रजातियां डाउनलोड पीडीऍफ़

Some Question एंड Answers सम्बन्धी गेंहू की उन्नत खेती के लिए

Q. गेहूं की बुवाई कब से कब होती है?

Ans.-गेंहू की उन्नत खेती के लिए इसकी बुवाई का सही समय अक्टूबर से नवंबर होता है |

Q.गेहूं की फसल कितने दिन की होती है?

Ans.-गेंहू की उन्नत खेती लगभग 110 से 120 दिन में तैयार हो जाती है

Q.गेंहू की उन्नत खेती कब से कब तक बुवाई की जाती है ?

Ans.-गेंहू की उन्नत खेती के लिए इसकी बुवाई का सही समय अक्टूबर से नवंबर होता है |

Q.एक बीघा में कितना गेहूं पैदा होता है?

Ans.-एक बीघा लगभग 10 से 15 कुंतल तक की पैदावार होती है |

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top