बासमती धान की खेती कैसे करे ?Best जानकारी

बासमती धान की खेती को अन्य नाम से भी जाना जाता है, जैसे-basmati paddy , बासमती धान , चावल ,पूसा बासमती 1121 , वैरायटी , बासमती 370,पूसा बासमती 1692
बासमती धान(Basmati) की खेती– भारत में पिछले सैकड़ों वर्षों से होती रही है। भारत तथा पाकिस्तान को बासमती धान (Basmati dhan)का जनक माना जाता है | हरित क्रांति(green kranti) के बाद भारत में खाद्यान की आत्मनिर्भरता (self confidence) प्राप्त करके बासमती धान की विश्व में मॉग तथा भविष्य में इसके , निर्यात की अत्यधिक संभावनाओं को देखते हुए, इसकी वैज्ञानिक खेती काफी महत्वपूर्ण (Importance)हो गयी है।

किसी भी फसल के अधिक उत्पादन के साथ-साथ अच्छी गुणवत्ता (Good Quality) में फसल की किस्मों का अत्यधिक महत्व है। बासमती चावल में विशिष्ट सुगंध एवं स्वाद होने के कारण -इसकी विभिन्न किस्मों का अलग-अलग महत्व है। बासमती धान की पारम्परिक प्रजातियाँ प्रकाश संवेदनशील, लम्बी अवधि तथा अपेक्षाकृत अधिक ऊँचाई वाली होती है, जिससे बासमती धान की उपज काफी कम होती है , परन्तु बासमती धान की नयी उन्नत किसमें अपेक्षाकृत कम ऊँचाई, अधिक खाद एवं उर्वरक चाहने , वाली तथा अधिक उपज देने वाली है।

सामान्यतः बासमती धान की खेती सामान्य धान की खेती के समान ही की जाती है ,परन्तु बासमती धान(Basmati) की अच्छी पैदावार एवं गुणवत्ता (Quality)के लिए निम्नलिखित सस्य क्रियाएं अपनायी जानी चाहिए ।

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1. खेती या जमीं का चयन :– बासमती धान की खेती के लिए भूमि का चयन उसके संरचना के जलवायु एवं अन्य Reletated बासमती धान या चावल की सुगंध एवं स्वाद में प्रभाव करते है | बासमती धान की खेती में बहुत अच्छे जल धारण की क्षमता वाली चिकनी एवं जल बना रहे मृदा मिटटी की आवश्य्कता की जरुरत होती है|
2. भूमि (खेती) शोधन : फसल को जनित रोगो से बचाने के लिए तरीकोडर्मा हैड्रोजन २% डब्लूपी. की मात्रा प्रति हेक्टेयर में 60 से 75 kg साड़ी हुयी गोबर (जैविक खाद )की साड़ी हुयी खाद मिलकर थोड़ा पानी में छीटादेव 8 से 10 दिन तक छाया में रखकर आखिरी जुताई के time खेतो में डाल दे |

दीमक, सफेद गिडा सूत्रकृमि, जड़ की सूण्डी, कटवर्म आदि कीटों से बचाव हेतु ,ब्यूवेरिया बैसियाना 1% डब्लूपी. बायोपेस्टीसाइड्स व 2.5 किग्रा0 मात्रा प्रति हेक्टेयर 60-75 किग्रा0 गोबर की सड़ी हुई खाद में मिलाकर हल्के पानी का छीटा देक 8 से 10 दिन तक छाया में रखकर आखिरी जुताई के time खेतो में डाल दे |

3.प्रजातियों का चयन : बासमती धान की अच्छी पैदावार तथा उत्तम गुणवत्ता लेने के लिए अच्छी प्रजाति चुनाव अत्यन्त महत्वपूर्ण है। एक अच्छी प्रजाति में निम्नलिखित गुण होने चाहिए- –

अ) कम ऊँचाई तथा कम समय में पकने वाली

ब) अधिक पैदावार
स)उत्तम गुणवत्ता
द)कीट तथा रोग के लिए प्रतिरोधी

य) बाजार में अधिक मॉग तथा अच्छी कीमत वाली होनी चाहिए

रोपाई के समय के अनुसार अगेती, पछेती तथा उपरोक्त गुणों वाली प्रजाति के शुद्ध एवं अधिक अंकु क्षमता वाले बीज का चयन करना अच्छी पैदावार के लिए आवश्यक है। बासमती धान की विभिन्न प्रजातियां तालि में दी गई है :

बासमती धान की निम्न रूप से रोग मुख्य प्रकार से अधिक हानि पहुँचाते है
1.धान का तना बेधक
2 .धान का पत्ती लपेटक कीट
3.धान का झोंका (ब्लास्ट) रोग
4.धान का भूरा धब्बा रोग
5.धान का पर्णच्छद
6.झुलसा रोग
7.धान की जीवाणु पत्ती झुलसा रोग
8 .धान का खैरा रोग
9.धान का पर्णच्छद विगलन रोग
10.धान का मिथ्या कण्डुआ

बासमती धान की फसलों के किस्मों का महत्व की जानकारी

हर किस्म का अपना अपना महत्वा होता है जो अनाज उत्पादन में काफी मदद करता है |
बासमती धान या चावल या फिर किसी भी अनाज में कहलो उसकी किस्म की वजह से ही उसमे अनेक प्रकार की क्षमता होती है जैसे – बाष्मटी धान में सुगंध एवं स्वाद का होना | किसी किस्म में कम और किसी में ज्यादा खाद और उर्वरक की जरूरत होती है | बासमती धान की खेती साधारण धान की खेती जैसी ही होती है |

बासमती धान की खेती के लिए खेती का चयन करना

बासमती धान की खेती के लिए खेती का चयन बहुत ही सही करना चाहिए क्योकि बासमती धान की खेती से आपको बासमती चावल प्राप्त करना है जो बहुत लोकप्रिय होता है इसके लिए जलवायु एवं भूमि बहुत जरुरी है | बासमती धान के मटियारी मिटटी एवं चिकनी मिटटी की जरुरत है जो पानी अच्छे से सोख सके |

बासमती धान में लगने वाले रोग

बासमती धान (चावल) की खेती- में रोग उपर्युक्त कीटों एवं रोगों में देखरेख के लिए हम उचित रासायनिक तथा जैविक- साधनों का उचित मिश्रण basmati धान की Quality को ध्यान रखने के लिए उचित मात्रा में उपयोग करेंगे । जैविक- नियंत्रण से धान के मृदा कीटों की संख्या भी बनी रहती है ।

बासमती धान कीखेती का बीज बीजउपचार

बासमती धान की प्रजाति या किस्म के आधार पर 25-30 किलोग्राम बीज की मात्रा प्रति हेक्टेयर की जरुरत पड़ती है और फिर इसमें 2 ग्राम⁄किग्रा. दर से कार्बेन्डाजिम इसके बीजो का उपचार करके बोना चाहिए ।

बासमती में रोपाई का समय

इसके रोपाई के पहले पानी भरना चाहिए लगभग10 -15 पहले जिससे उस भूमि के बचे खुचे अवशेष खत्म हो जाये | खेत की मिटटी मिटटी को मुलायम होने के लिए उसमे पानी भरे और उसकी 2 से 3 बार जुताई करे |

बासमती धान की खेती के लिए बीज शोधन :

नर्सरी डालने से पहले बीज शोधन जरूर कर लें। इसके अलावा जहाँ पर जीवाणु झलसा या जीवाणु धारी रोग हो ,वहां पर स्ट्रेप्टोमाइसिन राल्फेट 40% टेट्रासाइक्लिन हाइड्रोक्लोराइड(hydrocloride) 10% की 4 ग्राम मात्रा / 25 किग्रा0 बीज की दर से 100 लीटर पानी में मिलाकर रातभर भिगो दें। दूसरे दिन छाया में सुखाकर नर्सरी डालें। यदि शाकाणु झुलसा की समस्या क्षेत्रों में नहीं है, तो 25 किग्रा0 बीज को रातभर पानी में भिगोने के बाद दूसरे दिन निकाल कर अतिरिक्त पानी निकल जाने के बाद 62.5 ग्राम थीरम या 50 ग्राम कार्बेन्डाजिम को पानी मे मिलाकर बीज मे मिला दिया जाये इसके बाद छाया मैं अंकुरित करके नर्सरी में डाली जाये। बीज शोधन हेतु बायोपेस्टीसाइड का प्रयोग किया जाये।

बासमती धान की सिंचाई का प्रबंधन

बासमती धान को 3 से 4 सिचाई की जरुरत पड़ती है और फसल कटाई के समय यदि बारिश जयदा हो तो 15 दिन पहले उसमे से पानी निकाल देना चाहिए |

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बासमती धान की कटाई करने का समय

बासमती धान की खेती में किसान भाइयो को जब धान की बाली हरी से सुनहरी कलर होने लगे तो इसकी कटाई कर लेना चाहिए | लगभग 90 दिन बाद आपको ऐसा देखने को मिल जायेगा |

Q.सबसे ज्यादा पैदावार वाली धान कौन सा है?

Ans.-pusa 834 basmati sabse हाई quality seeds

Q.1 एकड़ में कितना धान उगाया जा सकता है?

Ans.-1 एकड़ में लगभग 20 से 22 कुंतल धान की खेती की जा सकती है |

Q.1 बीघा में कितने कुंटल धान होते हैं?

Ans.-1 बीघा में लगभग 15 से 16 कुंतल धान की खेती की जा सकती है |

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