chai patti ki kheti कैसे, कब और कहा करें?(2023)

चाय का परिचय

आइये जाने chai patti ki kheti कैसे और कब करे और भारत में कहा होती है | चाय विश्वभर में प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण पेय है। यह एक सदाबहार झाड़ी नुमा पौधा है जिसका वैज्ञानिक नाम ‘थियनेसेसिस’ है। चाय में थीन नामक पदार्थ होता है जो मानव शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है। इसे चाय के पौधों की पत्तियों से बनाया जाता है। चीन में चाय का सबसे अधिक उत्पादन किया जाता है जबकि भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। श्रीलंका चाय का सबसे अधिक निर्यात करने वाला देश है। भारत में दार्जिलिंग, असम, कोलुक्कुमालै, पालमपुर, मुन्नार, और नीलगिरि में चाय की खेती प्रचलित है। आइये जानते है चायपत्ती की खेती कैसे की जाती है |

चाय की खेती कैसे होती है ? | chai patti ki kheti

चाय के बुवाई का उपयुक्त समय

सबसे उपयुक्त पौधों को बुवाई के लिए अक्टूबर और नवंबर माह।

चाय पत्ती बुवाई का तरीका:

चाय के पौध बीज और कलम विधि से तैयार की जाती है। बीज से पौध तैयार करने के लिए खेती के बीजों से पहले नर्सरी में पौध तैयार की जाती है।

चाय की खेती का पौधरोपण नियम :

चाय के पौधों को खेत में तैयार गड्ढों में स्थापित किया जाता है. इसके लिए खेत में पहले से तैयार गड्ढों में एक छोटा सा गड्ढा तैयार कर लें । उसके बाद पौधे की पॉलीथीन को हटाकर उसे तैयार किए गए गड्डे में लगाकर चारों तरफ से अच्छे से मिट्टी डालकर दबा देते हैं। इसके पौधों को विकास करने के लिए छाया की जरूरत होती है। इसलिए प्रत्येक पंक्तियों में चार से पांच पौधों पर किसी एक छायादार वृक्ष की रोपाई करनी चाहिए।

Importants Points :

चाय के पौधों को खेत में तैयार किया जाता है।

पौधे को पॉलीथीन से हटाकर गड्डे में लगाना।

प्रत्येक पंक्ति में छायादार वृक्ष की रोपाई करना आवश्यक।

विकास के लिए पौधों को छाया की आवश्यकता है।

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चाय की खेती में पौधों की दूरी:

चाय पत्ती की खेती में हर एक पंक्तियों में 4-5 मी. के आसपास दूरी बनाते हुए गड्डे तैयार कर लेना आवश्यक होता है ।

चाय पत्ती के लिए जरुरी जलवायु

चाय के विकास के लिए तपता हुआ नम वातावरण सर्वोत्तम है। साथ ही 10 से 35 डिग्री तापमान में भी इसकी पैदावार अच्छी होती है.

भूमि का चयन

प्राकृतिक पदार्थों से भरपूर नाजुक अम्लीय मिट्टी चाय के अच्छे उत्पादन के लिए सर्वोत्तम है। चाय बागानों में रिसाव की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए। पीएच 4.5 – 5.0 वाली हल्की अम्लीय मिट्टी इसके विकास के लिए अच्छी मानी जाती है।

चाय पत्ती की खेती के लिए भूमि की तैयारी

पौध रोपण के पहले खेत को जुताई कर खुला छोड़ देना। फिर रोटावेटर से भुरभुरी मिट्टी बनाना। फिर खेत में पाटा लगाकर समतल बनाना और फिर उसमें पौधे लगाना।

चाय की खेती में खाद एवं कुछ रासायनिक उर्वरक

चाय की उच्च उपज के लिए अच्छी बढ़वार और खाद एवं उर्वरक की आवश्यकता होती है। गड्ढों में पौधों को 20 किलो गोबर खाद या वर्मीकम्पोस्ट देना चाहिए और रासायनिक उर्वरक में एन.पी.के. और आवश्यक पोषक तत्व देना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

खरपतवार की रोकथाम के लिए निराई-गुड़ाई आवश्यक है।

चाय की खेती में सिंचाई

चाय की खेती में सिंचाई बारिश के माध्यम से होती है। अगर बारिश कम होती है तो हर दिन फव्वारा विधि से सिंचाई करनी चाहिए।

चाय पत्ती की कटाई

पौधों को लगाने के लगभग एक साल बाद पत्तियां तोड़ने के लिए तैयार हो जाती हैं। किसान वर्ष में 3 बार इसकी तोड़ाई करके फसल प्राप्त कर सकते हैं।

हर वर्ष प्राप्त उत्पादन

चाय पत्ती की खेती से आप प्रति हेक्टेयर में लगभग1800 से 2500 किलोग्राम चाय पत्ती प्राप्त की जा सकती है |

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chai ki kheti ke liye kaun si mitti upyukt hai,?

चाय पत्ती की खेती के लिए उपयक्त मिटटी वह मानी जाएगी जो अम्लीय हो और उसका ph मान 5 से 6 के बीच हो |

chai ko hindi me kya kehte | chai ka hindi naam

चाय को हिंदी में चाय के अलावा ‘दुग्ध जल मिश्रित शर्करा युक्त पर्वतीय बूटी’ से जाना जाता है |

chai ki kheti kahan hoti hai | भारत में चाय की खेती कहां होती है ?

भारत का उत्तरी भाग 2022-23 में चाय उत्पादन में विश्वासनीय बढ़ोतरी हुई। असम और पश्चिम बंगाल प्रमुख उत्पादक हैं।

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असम चाय की खेती के लिए प्रसिद्ध है क्यों?

असम चाय की खेती के लिए कई कारण हैं। निम्नलिखित हैं कुछ मुख्य कारण:

  1. भूगोलिक स्थान: असम का भूगोल चाय की खेती के लिए उपयुक्त है। पहाड़ों, मैदानों और नदी किनारे के विशाल इलाकों में उच्च नमी और उपयुक्त मौसम चाय के उत्पादन के लिए सहायक होते हैं।
  2. जलवायु: असम का जलवायु चाय के पौधों के विकास के लिए अनुकूल होता है। धूले धुप और उच्च वर्षा के कारण चाय के पत्तों में उच्च पोषक तत्व होते हैं, जो उच्च गुणवत्ता वाली चाय का उत्पादन करते हैं।
  3. उपजाऊ मिट्टी: असम की मिट्टी चाय पौधों के विकास के लिए उपयुक्त होती है। यहां की मिट्टी में पोषक तत्वों की भरमार होती है, जिससे चाय की गुणवत्ता उच्च होती है।
  4. कारोबार का स्रोत: असम राज्य के लिए चाय एक महत्वपूर्ण आर्थिक कारोबारी स्रोत है। चाय उद्योग असम में लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करता है और उनकी आर्थिक स्थिति को सुधारता है।
  5. चाय की विविधता: असम में विभिन्न प्रकार की चाय उगाई जाती है, जैसे कि असमिका, चिनी चाय, गोलू चाय, और सादाय चाय। इसलिए, विविधता के कारण असम चाय विश्वभर में प्रसिद्ध है।
  6. उत्पादक राज्य: असम भारत का चाय उत्पादक राज्य है और वहां की चाय का भारतीय चाय उद्योग में महत्वपूर्ण योगदान है।

इन सभी कारणों से, असम चाय की खेती व्यापक रूप से प्रसिद्ध है और राज्य के आर्थिक विकास को सुनिश्चित करती है।

Chai utpadan ke liye kitne tapman ki avashyakta hoti hai

चाय उत्पादन के लिए तापमान की आवश्यकता तथा उच्चतम और न्यूनतम सीमा भिन्न हो सकती है, लेकिन आम तौर पर चाय के उत्पादन के लिए उच्चतम तापमान 30°C और न्यूनतम तापमान 15°C के बीच होता है।

चाय की खेती के लिए वर्षा

चाय की खेती के लिए वर्षा एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक परिस्थिति है। वर्षा की मात्रा और समय चाय के पौधों के विकास और उत्पादन पर सीधा प्रभाव डालते हैं। चाय के पौधों को समान रूप से उत्तम और अनुकूल वातावरण की जरूरत होती है जो उन्हें अच्छी तरह से बढ़ने और फलने देता है।

वर्षा के दौरान, उचित गर्मी और पानी की आवश्यकता चाय के पौधों के लिए मिलती है। अच्छी मात्रा में वर्षा से चाय के पौधे पोषक तत्वों से भर जाते हैं जो उनके उत्पादन में मदद करते हैं। जल आपूर्ति की यह आवश्यकता भी है क्योंकि अधिक पानी के अभाव में पौधे प्रभावित हो सकते हैं और यह उत्पादन पर असर डाल सकता है।

वर्षा चाय के पौधों के लिए सही मात्रा में न केवल पानी प्रदान करती है, बल्कि प्राकृतिक रूप से उपलब्ध खाद्य पदार्थों के साथ पौधों को पोषित करती है, जो उनके स्वास्थ्य और उत्पादकता को बढ़ाता है।

वर्षा के समय चाय की खेती के लिए विशेष ध्यान देना अत्यंत महत्वपूर्ण है ताकि चाय के पौधे अपने पूरे पोटेंशियल के साथ विकसित हो सकें और अच्छी उत्पादकता प्रदान कर सकें।

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