Best हरा चारा की खेती जिसमे सभी हरे चारे की सम्पूर्ण जानकारी(2023)

हरा चारा का परिचय

हमारे देश में कृषक वर्षा ऋतु में हरे चारे(Hara chara) के लिए विभिन्न खरपतवारों का प्रयोग करते है जो कि पशु स्वास्थ्य के लिए कम लाभप्रद होते हैं। इसके विपरीत विभिन्न हरे चारे खिलाने से पशु का स्वास्थ्य अच्छा रहता है तथा वे अधिक दूध देते हैं। हरे चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए खरीफ में बहु कटाई वाली ज्वार, लोबिया, मक्का तथा बाजरा आदि फसलों को बोना चाहिए। चारे की फसलों की सघन पद्धतियां निम्नानुसार अपनाई जा सकती है।आज हम अपने पोस्ट Ariticle में हरा चारा की खेती से सम्बंधित बात करेंगे।

Table of Contents

1 -खरीफ / जायद में बोयी जाने वाली एकवर्षीय चारा फसलें

ज्वार की खेती :

ज्वार चारे एवं दाने के लिए उत्तर भारत की एक महत्वपूर्ण चारा फसल है। खरीफ की फसल में प्राप्त कुल हरे चारे का 80-85 प्रतिशत ज्वार से प्राप्त होता है। ऐसे क्षेत्र जहाँ पर अपेक्षाकृत कम बारिश होती है, ज्वार की फसल सफलतापूर्वक ली जा सकती है।

हरा चारा की खेती

मृदा एवं उसकी तैयारी :

बलुई दोमट से दोमट मृदा जिसका पी.एच. 6.5 से 7.5 तक, जल निकास की उत्तम व्यवस्था हो, ज्वार की खेती के लिए अच्छी रहती है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा बाद की दो जुताई हैरो अथवा कल्टीवेटर से करके पाटा लगाकर खेत तैयार करें।

बुवाई का समय एवं विधि :

खरीफ में बुवाई का समय 25 जून से 10 जुलाई एवं जायद में मध्य मार्च से मध्य अप्रैल सर्वोत्तम है। बुवाई हल के पीछे कूंडों में 25 सेमी. के अन्तर पर करनी चाहिए।

उन्नत किस्में :

एकल कटाई हेतु : पी.सी. – 6, 9, 23, एच.सी. – 171,260, यू.पी. चरी – 1, 2, राजचरी – 1, 2 आदि ।

बहुकटाई हेतु : एस.एस. जी. – 998, 855, एस. एस. जी – 59-3, को. 27, पंत चरी-5, पंजाब सूडेक्स चरी-1 आदि । बीज दर : ज्वार की अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिये 30-40 किग्रा. प्रति हे. की दर से बीज प्रयोग करना चाहिए। बीजजनित रोगों से बचाव हेतु बीज को 2-3 ग्राम थीरम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करें।

खाद एवं उर्वरक : बुवाई से 20-25 दिन पहले खेत में 10 टन गोबर की खाद प्रति हे. की दर से मिलायें । बुवाई के समय 60:30:30 किग्रा. नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश प्रति हे. बुवाई के समय एवं 30 किग्रा नत्रजन/हे. की दर से बुवाई के एक महीने बाद छिडकाव करें। कम वर्षा वाले व असिंचित क्षेत्रों में 60 किग्रा नत्रजन/ हे. की दर सेबुवाई करे ।

सिंचाई : (Hara chara)

वर्षा का वितरण असमान होने पर खरीफ ऋतु में 1-2 सिंचाई की आवश्यकता होती है। जायद में वाष्पोत्सर्जन अधिक होने के कारण 5-6 सिंचाई देने की जरूरत होती है।

खरपतवार नियंत्रण :

खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के 3-4 सप्ताह बाद वीडर कम मल्चर से एक गुड़ाई करें। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण हेतु एट्राजिन 0.50 किग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हे0 की दर से 600 लीटर पानी में घोलकर जमाव से पूर्व छिड़काव करना चाहिए ।

कीट एवं व्याधि नियंत्रण तना मक्खी व तना छेदक को कार्बोफ्यूरान या मैलाथियान 125 मिली प्रति हे० से छिड़काव कर नियंत्रित किया जा सकता है। तना छेदक से बचाने के लिए फसल की जुलाई में बुवाई करें। मृदुरोमिल आसिता ज्वार का प्रमुख रोग है जिनकी रोकथाम मेटालैक्सिल – एम 31.8 प्रतिशत ई.एस. 2.0 मिली./ किग्रा. बीज की विशेष दर से उपचार कर बुआई करें।

कटाई :

एकल कटाई वाली प्रजातियों मे कटाई बुवाई के 60-75 दिन बाद करें। बहु-कटाई वाली प्रजातियों में पहली कटाई 40-45 दिन पर तथा उसके बाद की कटाई 30 दिनों के अंतराल पर करें। कटाई से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि फसल में पानी की कमी तो नही थी। एच.सी.एन. की विषाक्तता से बचने के लिए पहली कटाई से पूर्व सिंचाई देना आवश्यक रहता है।

उपज :

एकल कटाई फसल से 350-450 कु0 / हे. एवं बहुकटाई से 750-1000 कु० / हे. हरा चारा किसान प्राप्त  कर सकता है।

उपयोगिता : शुष्क भार के आधार पर इसमें 9-10 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन, 55-65 प्रतिशत एन. डी. एफ. 32 प्रतिशत सेल्यूलोज एवं 21-23 प्रतिशत हेमी सेल्यूलोज पाया जाता है। मई से अक्टूबर तक हरे चारे की उपलब्धता बनी रहती है।

हरा चारा की खेती में महत्वपूर्ण खेती

2. बाजरे की खेती : भी एक हरा चारा की खेती होती है

बाजरे की फसल दाने एवं हरे चारे के लिए भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाई जाती है। ऐसे क्षेत्र जहाँ कम वर्षा तथा ज्यादा गर्मी पड़ती है, बाजरे की फसल अच्छी पैदावार देती है, और इसे पशुओं के लिए हरे चारे(हरा चारा), कड़बी, सायलेज, और “हे” रूप में संरक्षित करके उपयोग में लाया जाता है।

मृदा एवं उसकी तैयारी अच्छे जल निकासयुक्त बलुई दोमट या दोमट भूमि बाजरे की खेती के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से एवं दो जुताई हैरो / कल्टीवेटर से एवं अंतिम जुताई के बाद पाटा लगाकर बाजरे की बुवाई के लिए खेत तैयार करना चाहिए।

हरा चारा की खेती

बुवाई का समय :

सिंचित क्षेत्रों में गर्मियों में बुवाई के लिए मार्च से मध्य अप्रैल का समय उपयुक्त हैं। खरीफ की फसल के लिए जुलाई का प्रथम पखवाड़ा उपयुक्त है। भारत में कई जगहों पर अक्टूबर से नवम्बर में बुवाई रबी के मौसम में की जाती है।

उन्नत किस्में :

अधिक उपज प्राप्त करने के लिए अच्छी किस्म का चुनाव आवश्यक हो जाता है। उद्देश्य के अनुसार किस्म का चयन करना चाहिए।

(अ) एकल कटाई हेतु : राज बाजरा चरी-2, नरेन्द्र चारा बाजरा-2 आदि ।

(ब) बहु कटाई हेतु : जायंट बाजरा, प्रो एग्रो नं0-1 आदि ।

(स) चारे एवं दाने वाली ए. वी. के. बी. – 19 आदि ।

बीज दर एवं बुवाई विधि:

इस्टतम उत्पादन हेतु 10-12 कि.ग्रा./हे. की दर से बीज उपयोग करना चाहिए। बीज की बुवाई हल के पीछे या सीडड्रिल से 25 सेमी दूरी वाली पंक्तियों में 2 सेमी. गहराई पर करें। कवक रोगों से बचाने के लिए बीज को एग्रोसान जी एन अथवा थीरम (3 ग्रा./ किग्रा. बीज) से अवश्य उपचारित करना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक :

सिंचित दशा में फसल की समुचित पोषक आवश्यकता पूरी करने के लिए 10 टन/ हे. अच्छी सड़ी गोबर की खाद बुवाई के 20 दिन पहले खेत में मिला दें तथा 50:30:30 किग्रा. नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश/हे. दवाई के समय देना चाहिए। 30 किग्रा नत्रजन/ हे. बुवाई के एक महीने बाद छिड़काव करना चाहिए। असिंचित दशा में बुवाई के समय उपयुक्त खाद एवं उर्वरक के अतिरिक्त वर्षा होने पर 20-30 किग्रा / हे. नत्रजन का छिड़काव 30-35 दिन की अवस्था पर करना लाभदायक रहता है।

25-30 दिनों के दौरान, खरपतवार के प्रबंधन के लिए वीडर की कम कल्चर से या जल उपयोग को आदर्शित करके प्रभावी नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है।

से पूर्व (बुवाई के 2-3 दिन के अन्दर ) एट्राजिन खरपतवार नाशी 0.50-0.75 किग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हेक्टर की दर से 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कना खरपतवारों के नियंत्रण में सहायक होता है।

सिंचाई :

खरीफ की फसल में वर्षा न होने पर 2 सिंचाई की आवश्यकता होती है। सिंचाई 20-21 दिन के अंतराल करने से उपज में अधिकतम वृद्धि होती है। ग्रीष्म ऋतु में 12-14 दिनों के बीच में 4-5 बार सिंचाई की आवश्यकता होती है।

कीट एवं रोग नियंत्रण

कीट एवं रोग नियंत्रण अरगट डाउनी मिल्ड्यू एवं स्मट इसकी प्रमुख बीमारियां है। मेटालेक्सिल (2.0 मिली./ किग्रा. बीज और फसल में कीडोमिल 1000 पी.पी.एम) का छिड़काव समुचित नियंत्रण देता है। अरगट अथवा स्मट से प्रभावित बालियों को निकालकर जला देना चाहिए। शूट फ्लाई कीट नियंत्रण के लिए कार्बोफ्यूरॉन 125 मिली / हे0 का छिड़काव लाभकारी पाया गया है।

कटाई एवं उपज

कटाई एवं उपज एक कटाई वाली प्रजातियों में बुवाई के 60-75 दिन बाद (50 प्रतिशत फूल अवस्था पर ) कटाई करें। एकल कटाई में 300-400 कु./ हे. हरा चारा आसानी से प्राप्त होता है। बहु कटाई वाली प्रजातियों में पहली कटाई 40-45 दिन पर तथा उसके बाद की कटाई 30 दिनों के अंतराल पर करें। बहुकटाई किस्मों से 550-1000 कु./ हे. प्राप्त हो सकती है हरे चारे की विशेषता।

उपयोगिता:

बाजरे का चारा(Hara chara) विशेष रूप से मृदु और पोषणपूर्ण होता है, जिसमें 7-10 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन, 56-64 प्रतिशत एन.डी. एफ. 38-40 प्रतिशत ए. डी. एफ., 33-34 प्रतिशत सेल्यूलोज एवं 18-23 प्रतिशत हेमीसेल्यूलोज पाया जाता है। मई से अक्टूबर तक हरे चारे की उपलब्धता बनी रहती है। बाजरे से अच्छी गुणवत्ता वाला ‘हे’ भी तैयार किया जा सकता है।

3. मक्का की खेती :भी एक हरा चारा की खेती होती है

एकदालीय फसलों में मक्का के चारे का प्रमुख स्थान हैं। देश भर में मक्का स्वादिष्ट एवं पौष्टिक हरा चारा प्रदान करता है जो पशुओं के लिए विकास की दृष्टि से किसी भी स्तर पर खिलाया जा सकता है। इससे अच्छी गुणवत्ता का साइलेज भी तैयार होता है जिसे हरा चारा के रूप में खिलाया जा सकता है। इसमें 9-10 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन, 60-64 प्रतिशत एन. डी. एफ., 23-25 प्रतिशत हेमीसेल्यूलोज और शुष्क भार के आधार पर 28-30 प्रतिशत सेल्यूलोज पाया जाता है।

मृदा एवं उसकी तैयारी मक्का के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट एवं बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम मानी जाती है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से एवं दो जुताईयां हैरो से एवं अंतिम जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत समतल करें।

हरा चारा की खेती

बुवाई का समय :

गर्मी में फरवरी के अंतिम सप्ताह से मार्च के अंतिम सप्ताह तक तथा खरीफ में वर्षा शुरू होने पर जून-जुलाई में, रवी में अक्टूबर-नवम्बर तक बुवाई का समय सर्वोत्तम माना गया है।

उन्नत किस्में :

अफ्रीकन टाल, विजय कम्पोजिट, मोती कम्पोजिट, जवाहर कम्पोजिट बी. एल. – 54, ए.पी.एफ. एम-8, प्रताप मक्का चरी – 6 आदि मक्का की प्रमुख किस्में है।

कीट एवं व्याधि नियंत्रण तना मक्खी व तना छेदक को कार्बोफ्यूरान या मैलाथियान 125 मिली प्रति हे० से छिड़काव कर नियंत्रित किया जा सकता है। तना छेदक से बचाने के लिए फसल की जुलाई में बुवाई करें। मृदुरोमिल आसिता ज्वार का प्रमुख रोग है जिनकी रोकथाम मेटालैक्सिल – एम 31.8 प्रतिशत ई.एस. 2.0 मिली./किग्रा. बीज की मूल्यांकन द्वारा उपचार कर बुवाई करें।

कटाई :

एकल कटाई वाली प्रजातियों मे कटाई बुवाई के 60-75 दिन बाद करें। बहु-कटाई वाली प्रजातियों में पहली कटाई 40-45 दिन पर तथा उसके बाद की कटाई 30 दिनों के अंतराल पर करें। कटाई से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि फसल में पानी की कमी तो नही थी। एच.सी.एन. की विषाक्तता से बचने के लिए पहली कटाई से पूर्व सिंचाई देना आवश्यक रहता है।

उपज :

एकल कटाई फसल से 350-450 कु0 / हे. एवं बहुकटाई से 750-1000 कु० / हे. हरा चारा निकाला जा सकता है।

उपयोगिता :

शुष्क भार के आधार पर इसमें 9-10 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन, 55-65 प्रतिशत एन. डी. एफ. 32 प्रतिशत सेल्यूलोज एवं 21-23 प्रतिशत हेमी सेल्यूलोज पाया जाता है। मई से अक्टूबर तक हरे चारे की उपलब्धता बनी रहती है।

5.ग्वार की खेती (साइमोसिस टेट्रागोनालोवा) :भी एक हरा चारा की खेती होती है

ग्वार शुष्क एवं अर्द्धशुष्क भू-भाग में उगाई जाने वाली दलहनी चारा के साथ साथ बहुउद्देशीय फसल है। जिसमें 15-20 प्रतिशत प्रोटीन होता है तथा इसके बीज से गोंद बनाया जा सकता है।

उन्नतशील प्रजातियां :

बुन्देल ग्वार – 1, 2 एवं 3, एफ.एस.-277, एच.एफ. जी. – 119, ग्वार – 80, एच. जी. – 75, 182 एवं मरु ग्वार प्रमुख है।

बुवाई का समय :

जायद की फसल के लिए मार्च-अप्रैल तथा खरीफ के लिए जून – जुलाई का माह उत्तम मान गया है ।

बीज दर एवं बुवाई :

30-35 किग्रा / हे. बीज की पक्तियों में 25 सेमी की दूरी पर बुवाई करनी चाहिए। पोषक तत्व प्रबंधन : 20 किग्रा. नत्रजन 50 किग्रा. फॉस्फोरस / हे. को बुवाई के समय प्रयोग करें।

सिंचाई प्रबंधन:

ग्वार को अपेक्षाकृत कम पानी की आवश्यकता पड़ती है। खरीफ में आवश्यकतानुसार एवं जायद में 3-4 सिंचाई की जरुरत  पड़ती है । कटाई एवं उपज फसल की कटाई पुष्पावस्था या फली आने की अवस्था पर बुवाई के 60-75 दिन बाद) की जा सकती है। इस प्रकार ग्वार से 300-350 कु. हरा चारा / हे. प्राप्त होता है ।

1.खरीफ / जायद में बोयी जाने वाली बहुवर्षीय चारा घासें

बाजरा नैपियर संकर :भी एक हरा चारा की खेती होती है

बाजरा नैपियर संकर वर्ष में कई कटाईयां देने वाली बहुवर्षीय चारा फसल है। इसकी जड़ों को एक बार रोपण करके उचित प्रबन्धन के द्वारा 4-5 वर्षों तक हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है। इस घास से बाजरे जैसा पौष्टिक एवं रसीला चारा प्राप्त होता है। साथ ही यह सुपाचक एवं गुणवत्तापूर्ण होता है ।

अपने इन्हीं गुणों के कारण यह घास किसानों के बीच काफी लोकप्रिय होती जा रही है। कम तापमान वाले क्षेत्रों को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में इसकी खेती आसानी से की जा सकती है। इसके चारे में शुष्क भार के आधार पर (8-9) % क्रूड प्रोटीन(Protean) पाई जाती है।

भूमि एवं उसकी तैयारी :

इस घास के लिये अच्छी उर्वरा वाली दोमट या बलुई दोमट भूमि उपयुक्त होती है जिसमें जल निकास का उचित प्रबन्ध हो। यह मृदा से काफी मात्रा में पोषक तत्व अवशोषित करती है। इस घास की रोपण के लिए एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा उसके बाद 2-3 जुताईयां हैरो / कल्टीवेटर से करके भूमि तैयार कर लेनी चाहिए ।

खाद एवं उर्वरक :

फसल बुवाई से पहले मृदा का परीक्षण करा लेना लाभदायक रहता है। सामान्यतः 20-25 टन/हे. सड़ी गोबर की खाद का प्रयोग रोपण से एक माह पूर्व करना चाहिए। रोपाई के समय 60 किग्रा नत्रजन, 50 किग्रा. फास्फोरस एवं 40 किग्रा. पोटाश प्रति हे. डालें एवं 30 किग्रा नत्रजन प्रति हे० प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई के तुरन्त बाद छिडकाव करना लाभदायक रहता है।

उन्नत किस्में :

आई.जी.एफ.आर.आई.- . 3, 5, 6, 7, 10, को. – 1, 2, 3, 4, 5, बी. एन. एच. – 10, एन. बी. – 21, 37, यशवंत, ए.पी.बी.एन-1, पूसा जायन्ट इत्यादि ।

रोपाई का समय :

सिंचित दशाओं में फरवरी माह में रोपाई एवं असिंचित दशाओं में जुलाई-अगस्त महीने में रोपाई लाभदायक होती है। इसकी रोपाई जड़दार कल्लों द्वारा की जाती है। रोपण हेतु जडयुक्त कल्ले 100 x 100 सेमी. या 50 × 50 सेमी. परिस्थिति अनुसार की दूरी पर प्रयुक्त किये जाते हैं । इस तरह एक हे० के लिए 20,000-30,000 टुकड़ों की आवश्यकता पड़ती है।

सिंचाई :

नम मिट्टी में रोपाई करें एवं रोपाई के बाद तुरंत सिंचाई करें। मार्च-अप्रैल में 15-18 दिन एवं गर्मी में 10-12 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें। प्रत्येक कटाई बाद फसल में सिंचाई करना जरुरी होता है ।

निराई-गुड़ाई :

रोपाई के बाद खरपतवार नियंत्रण हेतु एक-दो निराई-गुड़ाई करनी चाहिए अथवा एट्राजीन 3–4 किग्रा. प्रति हे. की दर से 500 ली पानी में घोलकर रोपाई से पूर्व प्रयोग किया जा सकता है। वर्षा ऋतु मे प्रथम रोपाई के समय लोबिया की अन्तः फसल से भी खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है साथ ही गुणवत्तायुक्त अतिरिक्त हरा चारा भी मिल जाता  है।

कटाई

बाजरा नैपियर संकर की पहली कटाई रोपाई के 60 दिन बाद तत्पश्चात् प्रत्येक कटाई 30-35 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए। अधिक उपज प्राप्त करने हेतु कल्लों को जमीन से 10-15 सेमी ऊपर से काटना चाहिए। वर्ष पर्यन्त इस घास से 6-8 कटाई आसानी से ली जा सकती है, यह अनूठा तरीका है।

उपज :

बाजरा नैपियर संकर से 6-8 कटाइयों में 700-1700 कु./ हे. प्रति वर्ष हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है। पुनरुद्धार : कई वर्षो तक लगातार कटाई करते रहने से घास मे मृत कल्लों की संख्या बढती रहती है जिससे पौधों की परिधि तो बढती है लेकिन सजीव कल्लों की संख्या प्रायः कम ही रहती है।

अतः अधिक चारा उत्पादन हेतु कटाई के बाद वर्षा ऋतु से पहले घास में मृत ठूंठों को हटा दिया जाता है और बाद में खेत की सिंचाई करने से नये कल्ले निकलते रहते है जिससे अधिक चारा प्राप्त किया जा सकता है एवं इन्ही पौधों से जडे निकाल कर किसान या तो दूसरे खेत में रोपित कर सकते है या फिर इन्हें दूसरे किसानों को विक्रय कर सकते हैं।

अतः इस घास को वर्तमान परिपेक्ष्य में पशुओं को वर्ष भर चारा उपलब्ध कराने के उददेश्य से उगाना लाभदायक है।

2. गिनी घास :भी एक हरा चारा की खेती होती है

गिनी घास बहुवर्षीय चारा है । चारे की फसलों में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। यह सिंचित स्थिति में वर्ष भर चारा प्रदान करती है। शुष्क दशा में, वर्षा काल के दौरान ही इस फसल के लिए हरा चारा उपलब्ध होता है, जिसे देश के सभी भागों में उगाया जाता है।

हरा चारा की खेती

मृदा एवं उसकी तैयारी:

उचित जल निकास वाली सभी प्रकार की भूमि में इसको उगाया जा सकता है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करके दो से तीन जुताई कल्टीवेटर/ हैरो से करने के बाद पाटा लगाकर मिट्टी को भुरभुरी कर खेत तैयार करना चाहिए ।

उन्नत किस्में :

बुन्देल गिनी – 1, 2, मेकोनी, हामिल, को-1, को-2, पी. जी. जी. – 1, 9, 19, 101, Gini गटन -1 और 9 Etc.

बुवाई का समय :

नर्सरी तैयार करने के लिए फरवरी या मार्च में क्यारियां बनाकर बीज डाल देना चाहिए। इसके लिए 1 से 1.5 मीटर चौड़ी क्यारी बनानी चाहिए। एक हे० के लिए 8 मीटर लम्बी लगभग 15 क्यारियों की आवश्यकता होती है जबकि सीधे खेत में बुवाई करने के लिए मानसून से पहले बुवाई कर लेनी चाहिए। गिनी की बुवाई पंक्ति में करनी चाहिए तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी 1 मीटर एवं पौधे से पौधे की दूरी 50 सेमी आवश्यक है।

बीज डालने और पौधों को उगाने की विधि:

गिनी हुई घास को सीधे खेत में या नर्सरी में बीज डालकर लगाया जाता है। इन दोनों तरीकों में लगभग 2.5 से 3 किलो बीज प्रति हेक्टेयर के लिए पर्याप्त होता है। जबकि जड़ों द्वारा बुवाई के लिए 25000 से महीने पुराना बीज एक 66000 जड़ें एक हे0 के लिए पर्याप्त होती हैं। नर्सरी में पौध तैयार करने के लिए लगभग 6 सेमी. गहराई पर बोना चाहिए। इसके बाद क्यारियों को जूट बैग से ढककर पानी लगाना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक :

अच्छी प्रकार गोबर की खाद 25 टन/ हे. पर्याप्त होती है। बुवाई के समय 60 किग्रा. नत्रजन, 40 किग्राफास्फोरस, एवं 40 किग्रा. पोटाश प्रति हे. की दर से रोपाई पूर्व खेत में फर्टीलाइजर ड्रील से डालना बाद 40 किग्रा नत्रजन प्रति हे. की दर से प्रयोग करना चाहिए।

इसके बाद प्रत्येक कटाई खरपतवार नियंत्रण :

शुरू के 30-40 दिनों में खरपतवारों की भरमार होती है। अतः 2, 4-डी 1.0 किग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हेक्टर की दर से 500 ली. पानी में मिलाकर छिडकाव करना चाहिए। प्रथम रोपाई के समय लोबिया की अन्तर फसल से भी खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है, साथ ही गुणवत्तायुक्त हरा चारा भी आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।

सिंचाई करने से वर्ष भर चारा उपलब्ध रहता है। खरीफ में सामान्यता सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है ।

सिंचाई :

सिंचाई उपलब्ध होने पर गर्मी के दिनों में सिंचाई करनी चाहिए। मार्च से जून तक 20 दिन के अंतराल पर कटाई एवं उपज फसल 60-65 दिन पर पहली कटाई के लिए तैयार हो जाती है। सिंचित दशा में 50 दिन के हैं। असिंचित दशा में सिर्फ मानसून पर आधारित खेती से दो-तीन बार कटाई की जाती है जो अगस्त से लेकर दिसम्बर तक प्राप्त होती है। अतः इसको चारा वाले वृक्षों के बीच लगाकर (छाया सहनशीलता के कारण) भी चारा बाद फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इस प्रकार लगभग 1000-1500 कु० प्रति हे. हरा चारा (Hara chara) उपलब्ध होता उत्पादन किया जा सकता है।

3. घास 1 :भी एक हरा चारा की खेती होती है

नन्दी घास (सिटैरिया स्फेसिलाटा) :

यह एक बहु सिंचित / असिंचित एवं ठड़े मौसम में सफलता पूर्वक, उगाई जाने वाली मुलायम सुपाच्य मृदा एवं खेत की तैयारी अच्छे जल निकास वाली दोमट भूमि सर्वोत्तम मानी जाती है। एक गहरी जुताई :तत्पश्चात् 2-3 हैरो या कल्टीवेटर से जुताई करनी चाहिए।

हरा चारा की खेती

प्रमुख प्रजातियाँ :

नंदी, कंजीगुला, पी. एस. एस. -1, सिटैरिया-92 आदि ।

नर्सरी तैयार करना : गिनी के अनुसार ।

खाद एवं उर्वरक :

15-20 टन सड़ी गोबर की खाद भूमि तैयारी के समय उसके बाद 50:40:30 किग्रा. समय खेत में डालकर अच्छी तरह मिला दे। उसके बाद प्रत्येक कटाई उपरान्त 30 एन.पी.के./ हे. को रोपाई किग्रा. नत्रजन / हे. की दर से डालना चाहिए ।

बीज एवं बुवाई / रोपाई :

यदि नंदी घास को सीधे बीज द्वारा बुवाई करनी है तो 3-4 किग्रा. बीज प्रति हे0 की दर सीड पेलेटिंग मशीन द्वारा छोटी छोटी गोलियां बनाकर उन्हें छाया में सुखाकर तैयार करें तत्पश्चात् तैयार खेत में वर्षा से पूर्व छिड़काव कर बुवाई करनी चाहिए।

यदि नर्सरी द्वारा तैयार पौध की रोपाई करनी है तो लाइन से लाइन की दूरी 75 सेमी. एवं पौध से पौध की दूरी 40 सेमी रखनी चाहिए। प्रत्येक रोपाई 2 से 3 पौधों के साथ करें, इस प्रकार प्रति हे. 30,000 से 45000 हजार पौध की आवश्यकता होती है ।

सिंचाई :

पहली सिंचाई रोपाई के तुरन्त बाद उसके तत्पश्चात् 2-3 सप्ताह के अंतराल पर करनी चाहिए। गर्मी के दिनो में सिंचाई 10-12 दिन के अंतर पर करें।

कटाई :

बीज द्वारा बुवाई करने पर प्रथम कटाई तीन माह बाद करें एवं पौध रोपण पर ढाई महीने बाद करनी चाहिए। उसके बाद प्रत्येक कटाई वर्षा ऋतु में 30-35 दिनो पर व गर्मी में 40-45 दिनो के अंतराल पर करते रहते हैं

उपज :

इस प्रकार प्रति वर्ष औसतन 500-600 कु. हरा चारा प्रति हे. प्राप्त किया जा सकता है।

4. पैरा घास (ब्रेकेरिया म्यूटिका) :भी एक हरा चारा की खेती होती है

यह नम जलवायु में होने वाली महत्वपूर्ण चारा फसल है, जो जल भराव क्षेत्र, नहर के किनारे, एवं अन्य जल स्त्रोतों के नजदीक उगाने के लिए उपयुक्त है। 

भूमि एवं उसकी तैयारी :

यह निचली एव लम्बे समय तक जल भराव वाली भूमि में सफलता पूर्वक उगायी जा सकती है। साथ ही सिंचित योग्य कृषि भूमि में भी सफलता पूर्वक उगायी जाती है। इसके लिए दोमट मटियार भूमि सर्वोत्तम मानी जाती है।

रोपाई :

इसकी रोपाई तने टुकड़ें अथवा जड़ सहित कल्लें से की जा सकती है। पंक्ति से पंक्ति दूरी 50 सेमी. एवं पौध से पौध 25 सेमी रखनी चाहिए। इस प्रकार प्रति हे. 40,000 से 80,000 तने की आवश्यकता रहती है।

उन्नत प्रजातियाँ :

ब्रेकेरिया म्यूटिका एवं ब्रेकरिया ब्रेजेन्था प्रमुख है।

खाद एवं उर्वरक :

15-20 टन अच्छी सड़ी गोबर की खाद खेत में तैयारी के समय डालें। तत्पश्चात् प्रत्येक कटाई के बाद 25-30 किग्रा नत्रजन/ हे. की दर से डालने से पैदावार अच्छी मिलती रहती है 1

सिंचाई :

यह घास नम एवं अधिक पानी वाली निचली जगह पर ही उगाई जा सकती है। इसे सूखे स्थानों पर नहीं उगाया जा सकता ।

निराई गुड़ाई:

रोपाई के पश्चात एक निराई करने से खरपतवार नहीं आते। एक बार फैलने के बाद फिर इसमे कोई खरपतवार नहीं उग पाता है एवं इसमे कोई कीड़ा / बीमारी भी नहीं लगती है।

कटाई :

प्रथम कटाई रोपाई के 100-105 दिन पर, तत्पश्चात् प्रत्येक 30-35 दिनो के अंतराल से करते रहते है। उपज : प्रति हे. 500-800 कु. हरा चारा प्राप्त होता है।

5. दीनानाथ घास (पेनीसिटम पेडीसिलेटम) :भी एक हरा चारा की खेती होती है

दीनानाथ घास सभी जगहो पर आसानी से उगाई जा सकती है। यह कम वर्षा आधारित क्षेत्रों में जल्दी उगने वाली, सूखा सहन करने वाली बहुवर्षीय चारा फसल है।

भूमि :

दोमट व बलुई दोमट मिट्टी अच्छी होती है, परन्तु उचित प्रबंधन के द्वारा इसे किसी भी प्रकार की भूमि में • आसानी से उगाया जा सकता है I

खेत की तैयारी:

दो-तीन जुताई के बाद, मिट्टी को भुर-भुरी करके लेनी चाहिए।

बुवाई का समय :

बुवाई का उचित समय जून-जुलाई माह होता है। सिंचित क्षेत्रों में इसे मार्च-अप्रैल में भी उगा सकते हैं। इसे बोने के लिए कतार से कतार की दूरी 40 सेमी व बीज की गहराई 1-1.5 सेमी होनी चाहिए। इसकी नर्सरी में पौध तैयार करके भी रोपाई कर सकते है।

बीज की मात्रा :

छिड़काव विधि से 6-8 किग्रा. प्रति हे. बीज की आवश्यकता पड़ती है जबकि नर्सरी द्वारा पौध तैयार करने के लिए 3 किग्रा. बीज की आवश्यकता होती है।

खाद एवं उर्वरक :

8-10 टन सड़ी गोबर की खाद बुवाई से पूर्व खते में डाले। 60-70 किग्रा नत्रजन को दो भागों में बांट कर आधी मात्रा बुवाई रोपाई के समय शेष रोपाई के 6-7 सप्ताह बाद फसल में छिडकें ।

उन्नत किस्में :

बुंदेल दीनानाथ -1 एवं 2, जवाहर पेनिसेटम – 12 एवं सी.ओ.डी. – 1 प्रमुख है।

सिंचाई :

सामान्यता वर्षा ऋतु की फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। मार्च-अप्रैल में उगाई गई फसल में वर्षा होने तक प्रत्येक 10-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए।

कटाई प्रबंधन बीज द्वारा बोये गए फसल की कटाई बुवाई के 80-100 दिन पर करें जबकि रोपाई की फसल को 65-75 दिन पर कटाई करते है। कटाई भूमि से करीब 10-12 सेमी. ऊपर से करनी चाहिए जिससे पुनः भीघ् फुटान हो सके। उपज औसतन 550-650 कु./ हे. हरा चारा प्राप्त होता है।

6. अंजन घास (सेन्क्रस सिलिरियस) :भी एक हरा चारा की खेती होती है

अंजन कम वर्षा वाले भाष्क एवं अर्धशुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में आसानी से उगायी जा सकने वाली बहुवर्षीय भूमि तथा खेत की तैयारी अंजन सभी प्रकार की भूमि मे उगाई जा सकती है लेकिन अच्छे जल निकास वाली हल्की भूमि उत्तम होती है। 2-3 जुताई हैरो व कल्टीवेटर से करके पाटा लगा देना चाहिए। तत्पश्चात् कल्टीवेटर से 50 सेमी के अंतराल पर कूड बना ले।

नर्सरी तैयार करना मई के महीने में 6 मी. लम्बी व 1 मी. चौडी 10-12 क्यारियाँ बनाकर उसमे 30 किग्रा. सड़ी गोबर की खाद 25 ग्राम यूरिया 75 ग्राम सुपर फास्फेट प्रत्येक क्यारी में डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें। तत्पश्चात् प्रत्येक क्यारी में 40 ग्राम बीज को 1 सेमी की गहराई में पंक्ति से पंक्ति 10 सेमी की दूरी पर बोये।

क्यारियों में ऊपर से जूट के बोरे को डाले व उसके ऊपर फौहार से सिंचाई करते रहें। बीज उगने पर बोरे को हटा दे। दो सप्ताह बाद 15 ग्राम यूरिया प्रति क्यारी की दर से छिड़काव करें तथा समय समय पर नमी बनाए रखे। इस प्रकार 6 सप्ताह बाद जब पौध 15 से 20 सेमी लंबी हो जाये, रोपण के लिए तैयार हो जाती है।

खाद एवं उर्वरक :

100-150 कु./ हे. सड़ी गोबर की खाद जुताई के समय खेत में डाले। 30 किग्रा नत्रजन एवं 30 किग्रा. फॉस्फोरस को प्रति हे. की दर से डाले। बुवाई के एक माह बाद 30 किग्रा. यूरिया प्रति हे. की दर से छिड़काव करने से पैदावार अच्छी मिलती है।

उन्नतशील प्रजातियाँ :

बुन्देल अंजन-1, 3 आर.सी.सी.बी. 2 एवं काजरी – 75 आदि ।

रोपाई :

मानसून में 4–6 सप्ताह के तैयार पौधों को पंक्ति से पंक्ति 50 एवं पौध से पौध 50 सेमी. की दूरी पर रोपाई करें। सीधे बीज द्वारा बुवाई के लिए कूड़ो में 3-4 किग्रा. प्रति हे. बीज को 1-1.5 सेमी की गहराई में डाले।

निराई-गुड़ाई:

समय-समय पर खरपतवार निकालते रहना चाहिए।

पैदावार :

अंजन घास से प्रति वर्ष प्रति हे. 800-1000 कु. हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है। प्रथम वर्ष में एक कटाई उसके बाद प्रत्येक 45-60 दिन पर काटते रहना चाहिए ।

1. सहजन (मोरिंगा ओलीफेरा) :भी एक हरा चारा की खेती होती है

महत्वपूर्ण चारा वृक्ष :भी एक हरा चारा की खेती होती है

परिचय :

सहजन विश्व का एक बहुवर्षीय, शीघ्र बढ़ने वाला है। जिसे सभी तरह की जलवायु में मनुष्यों के उपयोग हेतु चारे के रूप में, दवा, रंगाई एवं पानी को शुद्धीकरण हेतु उगाया जाता है। सहजन को घर के पीछे अथवा हेज के रूप में परम्परागत तौर पर उगाया जाता है तथा इसकी पत्तियों का उपयोग घरों में कई उददेश्यों हेतु किया जाता है।

इसकी ऊँचाई 10–12 मी. तथा तने की मोटाई 45 सेमी. तक होती है। इसके फूल खुशबूदार, नर एवं मादा फूल अलग-अलग होते हैं जो पाँच असामान्य पीली सफेद पंखुड़ियों से घिरे रहते हैं। फूलों की लम्बाई 1.0-1.5 सेमी. से 2 सेमी तक होता है। इसके फल तीन तरफा ‍

कैप्शूल जिनका आकार 20-45 सेमी. होता है, जैसे दिखते हैं एवं उनमें गाढे भूरे 1 सेमी. परिधि के बीज पाये जाते हैं। बीजों में तीन सफेद पतले पंख होते हैं तथा यह आसानी से पानी तथा हवा द्वारा बहा एवं उड़ा दिये जाते हैं।

पोषक तत्व :

इससे बहुत ही अच्छी गुणवत्ता का चारा प्राप्त होता है। इसकी पत्तियों में शुष्क भार के आधार पर 15-20 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन तथा 10-18 प्रतिशत क्रूड रेशा तथा 11-14 प्रतिशत खनिज तत्व पाया जाता है। इसकी फलियों को सब्जी के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है जिसमें 87 प्रतिशत नमी, 2.5 प्रतिशत प्रोटीन, 4 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 5 प्रतिशत रेशा तथा 2 प्रतिशत खनिज तत्व पाया जाता है।

उपयुक्त परिक्षेत्र:

सहजन आमतौर पर भारत वर्ष के विभिन्न राज्यों के अर्ध शुष्क, शुष्क एवं उपोष्ण भागों में उगाया जाता है। यह गर्मी तथा धूप सहन कर सकता है, परन्तु जाड़ा एवं पाला सहन नहीं कर सकता। सहजन को शुष्क क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है क्योंकि इसे पानी की कम आवश्यकता होने के कारण यह वर्षा आधारित क्षेत्रों में भी उग सकता है। सहजन एक ऊष्ण जलवायु का पेड़ है।

मृदा एवं जलवायु :

यह बलुई मृदा में अच्छा बढता है तथा समुद्र तटीय खराब मिट्टी में भी हो जाता है। इसको उचित जल निकास वाली बलुई दोमट या दोमट मिट्टी भाती है। इसके लिए अधिक दिनों तक जलभराव वाली भूमि अच्छी नहीं होती। इसको रोपित करने के लिए चिकनी मिट्टी का चयन नहीं करना चाहिए। यह 5.0-9.0 मृदा पी. एच. पर उगाया जा सकता है।

सहजन एक ऊष्ण जलवायु का पेड़ है, जो 25° – 35° सेल्सियस तापक्रम वाले क्षेत्रों में अच्छी तरह उगाया जा सकता है लेकिन यह 48 ° सेल्सियस के तापमान तक जीवित रहता है। सूखा रोधी पेड़ सहजन जहाँ वार्षिक वर्षा 250-1500 मिमी. होती है, वहाँ उगता है। समुद्रतल से 600 मी. से कम ऊँचाई वाले क्षेत्रों में सहजन की अच्छी वृद्धि होती है परन्तु इस पेड़ को 1200 मी. की ऊँचाई तक भी उगाया जा सकता है।

प्रसारण एवं रोपण:

सहजन को बीज तथा स्टेम कटिंग के माध्यम से प्रसारित किया जाता है। इसके बीज को सीधे बोया जा सकता है क्योंकि इसका अंकुरण 80-90 प्रतिशत तक रहता है। रोपाई के पहले छः महीने के बाद फूल आने लगता है। ठंडे क्षेत्रों में वर्ष में एक बार अप्रैल व जूल के बीच फूल उगता है, जबकि जहाँ सहजन (मोरिंगा ओलिफेरा) तापमान तथा वर्षा इसके अनुकूल होती है वहाँ वर्ष में दो बार या पूरे वर्ष फूल आता है।

एक वर्ष पुराने पौधे को स्थाई रूप से हैज के रूप में, या 3-5 मीटर की दूरी पर खेतों में लगाकर अंतः स्थान में फसल ले सकते हैं। लकड़ी की सख्त कटिंग जिसकी लम्बाई 1.5 फीट तक हो, से भी इसका रोपण किया जा सकता है। इन कटिंग को छाया में तीन दिन तक सुखना चाहिए। 1 मीटर लम्बी कटिंग जिनका व्यास कम से कम 4 सेमी. हो, को भी रोपित किया जा सकता है।

कटिंग को रोपण के समय एक तिहाई भूमि में दबा देना चाहिए। इसे मेड़ों पर भी बड़े ही आसानी से लगाकर चारा, फली प्राप्त किया जा सकता है। सहजन को अच्छी तरह से तैयार भूमि या क्यारी की जहाँ एक ही फयल ली जाती है अथवा आवश्यकता होती है। सहजन के बीज को वहाँ सीधे बोया जा सकता अन्य फसलों के साथ इसकी रोपाई की जाती है।

फिलीपीन्स में सहजन को जून से अगस्त के बीच 1-2 मीटर लम्बी कटिंग द्वारा रोपित किया जाता है। इसे बीज से भी प्रसारित किया जा सकता है, जिसे मिट्टी में 2-2.5 सेमी. की गहराई पर बुवाई कर अच्छे जल निकास वाली भूमि में पूरे वर्ष उगाया जा सकता है।

चारा उत्पादन :

सहजन का पेड़ 60-90 दिनों में 1.5-2.0 मी. तक बढ जाता है तभी इसकी पत्तियों की कटाई की जानी चाहिए। इसकी पत्तियों की कटाई तने सहित जमीन के 20-45 सेमी. ऊपर से तेज चाकू द्वारा की जानी चाहिए इस तरह कटाई करने से नये कल्ले निकल आते हैं। इसके बाद की कटाईयाँ इसके 30-40 दिन बाद करनी चाहिए। सहजन की पत्ती वाले तनों को चारे के प्रयोग हेतु 75 दिन के अन्तराल पर करना चाहिए।

सहफसली अवस्था में इसे दो से चार महीने की वृद्धि के बाद करना चाहिए। इसे वृद्धि के अनुसार इसकी कटाई वर्ष में तीन चार बार की जा सकती है। कटाई रोपण के तरीकों पर भी निर्भर करती है। खेत की मेड़ पर लगे पेड़ों से एक वर्ष में दो बार कटाई की जा सकती है।

2. सुबबूल ( ल्युसियाना ल्युकोसिफैलस) :भी एक हरा चारा की खेती होती है

परिचय:

सूबबूल को एक चमात्कारी वृक्ष कहते हैं क्योंकि इससे चारा, जलाऊ लकड़ी, कागज के लिए लुगदी एवं इमारती लकड़ी प्राप्त होती एवं मुदा उर्वरता वृद्धि करती है जो कृषि वानिकी के लिए सर्वोत्तम है। यह प्रतिकूल परिस्थति में भी मृदा उर्वरता को बढाता है। सूबबूल एक उपोष्ण जलवायु का पौधा है जिसके अनेकों उपयोग है। वन विभाग एवं कृषक इसके फायदे को पूरा-पूरा उपयोग कर रहे हैं।

उपयुक्त परिक्षेत्र सूबबूल की उत्पत्ति मध्य अमेरिका माना जाता है जहाँ से यह एक अच्छे पशु चारा के रूप में फिलीपिन्स, गुयाना, स्पेन, नीदरलैण्ड, न्यूगिनीया, मलेशिया, हवाई, आस्ट्रेलिया, भारत तथा अफ्रीका इत्यादि देशों में फैला है भारत में आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश में इसकी खेती की जा रही है। अच्छे मृदा जलवायु में यह बहुत ही उपजाऊ है और इससे अच्छा आय प्राप्त किया जा सकता है। इससे अच्छा एवं पौष्टिक चारा मिलता है जो पशु के शरीर का वजन बढाने में सफल है। इससे हे, लीफमील तथा साई भी बनाया जा सकता है। छाया युक्त फसल जैसे कहवा, कोकोआ, काली मिर्च, सिकोना, बनीला इत्यादि की खेती इसके नीचे की जा सकती है।

भी एक हरा चारा की खेती होती है

मृदा एवं जलवायु :

यह गहरी जड़ वाला वृक्ष है जिसकी जड़ नमी एवं पोषक तत्व की खोज में बहुत गहराई तक चली जाती है। यह सामान्य से क्षारीय जमीन (6–7.7 पीएच) तथा कंकरीली से चिकनी मिट्टी तक में हो सकता है। यह खराब से खराब जमीन में भी हो सकता है।

इसकी खेती उष्ण से उपोष्ण तक की जलवायु में समुद्रतल से 500 मीटर की ऊँचाई तक जहाँ 500-3000 मिमी. तक वार्षिक वर्षा होती है, अच्छी तरह हो सकती है। यह गर्म जलवायु के प्रति सहनशील है। यह सूर्य की अच्छी प्रकाश चाहता है। जहाँ 250 मि.मी. तक वर्षा होता है वहाँ भी इसकी खेती हो सकती है।

यहाँ तक की जहाँ 8–10 माह तक कोई वर्षा नहीं होता वहाँ भी इसकी खेती अच्छी तरह से हो सकती है। इसके पौध वर्षा के अतिरिक्त 8 माह बगैर पानी के जीवित रहे सकते हैं।

प्रसारण एवं रोपणः

इसका प्रसारण बीज द्वारा होता है जिसके लिए अच्छे पौधों को (प्लस ट्री) धनात्मक वृक्ष / मातृ पौधे के रूप में चयन करके उसके फलियों को पककर तैयार होने पर (बिखरने के पूर्व ) इन फलियों को इकट्ठा कर लेते हैं। क्योंकि जब बीज बिखरकर जमीन पर फैल जाता है तो बीज की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

फलियों को त्रिपाल पर फैलाकर धूप में सूखाकर डंडे से पीटकर निकालते हैं तत्पश्चात् सफाई करके सूबबूल (ल्यूसिना ल्यूकोसीफेला) 74 75 भंडारण करते हैं। 100 ग्राम भार में लगभग 2500 बीज आते हैं। बीज को भंडारित करने के लिए कवकनाशी 0 तथा कीटनाशी दवा के पाउडर रहित डिब्बे में कसकर बंद करके रखते हैं।

सही ढंग से बीज न रखने पर 4-5 सप्ताह बाद बीज का जमाव क्षमता उपचारित करके रखते हैं। बीज को 10 सेल्सियस पर हवा 50 प्रतिशत रह जाता है।फैलने की आशंका रहती है। अतः बीज जमने से पूर्व उपचारित करना आवश्यक रहता बीज स्कैरिफिकेशन: सहजन का बीज मोमी (चिकनी) तथा कठोर आवरण होने के कारण बीज जनित रोग भी |

गर्म पानी उपचार :

80 सेल्सियस तापक्रम पर 5 मिनट रखते हैं या उबलते पानी को उतारकर उसमें बीज 12 घंटे तक रखते है ।

अम्ल उपचार:

सान्द्र सल्यूरिक अम्ल से 5-10 मिनट तक उपचार करके ठंडे बहते पानी से अच्छी तरह धो लेना चाहिए। इस तरह के उपचार में सावधानी बतरनी चाहिए।

अभियांत्रिक उपचार:

बीज को बालू, कागज या पत्थर पर रगड़ते हैं। इसमें रगड़ते समय ध्यान रखना चाहिए कि बीज का अण्डाशय खराब नहीं होना चाहिए ।

पौधशाला क्यारियों में या पालीथीन की थैलियों में लगा सकते हैं। इसके बीज को सीधे खेत में बुवाई कर सकते हैं। सीधे खेत में बुवाई के लिए 5 किग्रा. बीज / हे. लगता है । क्यारियों में 1 वर्ग मीटर के लिए 25 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है।

बीज 1-2 सेमी. की गहराई में बोना चाहिए। इसके अंकुरण में 6-8 दिन लगते हैं। गर्म पानी (80 सेल्सियस) का उपचार करने से बीज अच्छा जम सकता है। उबलते पानी को उतारकर उसमें 24 घंटे बीज छोड़ देने से अच्छी जमाव होती है।

बीज से सीधे खेत में बुवाई :

चारा हेतु खेत में सीधे बुवाई कर सकते हैं। इसके लिए वर्षा ऋतु उचित रहता है। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सेमी. तथा पौध से पौध की दूरी 30 सेमी. रखते हैं । खेत की तैयारी के समय 8-10 टन सड़ा गोबर का खाद, 30 किग्रा. फॉस्फोरस तथा 20 किग्रा नत्रजन / हे. मिलाकर खेत तैयार कर लेना चाहिए।

बीज को 1.5 सेमी. गहराई में कल्टीवेटर चलाकर बुवाई करनी चाहिए। इसके लिए 15-20 किग्रा. बीज / पर्याप्त होता है। यह दलहनी फसल है इसे अलग से उर्वरक देने की आवश्यकता नहीं है । किन्तु यदि खेत बिल्कुल खराब है तो 20-25 किग्रा. नत्रजन, 30-35 किग्रा. फॉस्फोरस तथा 20 किग्रा. पोटाश / हे. देना अच्छा रहता है।

पौध जमने तथा बढवार के लिए आरम्भ के 2-3 माह खेत में नमी बनी रहनी चाहिए। यह गहरी जड़ वाला वृक्ष है जिसकी जड़े गहराई तक प्रवेश कर 8-9 माह बगैर सिंचाई के रह सकता है। 3-4 मीटर की दूरी पर पद्धति अपनाकर अंतः स्थान में फसल भी ले सकते हैं। खेत में सीधे 75 सेमी. की दूरी पर पंक्तियों में बीज की बुवाई कर सकते हैं।

जिसमें करीब 1-1.5 लाख पौध / हे. लगते हैं। पोल, लुगदी के लिए 10000 पौध / उपयुक्त होता है । वन हेतु : 3-10 मीटर की दूरी पर उद्देश्य के आधार पर रोपित करते हैं ।

चारा उत्पादन :

कहा जाता है कि सूबबूल है तो हरे चारे की कमी नहीं होगी। 50 दिन बाद चारा हेतु पहली कटाई आरम्भ कर देते हैं। जायन्ट प्रजाति से एक वर्ष में 16-18 टन/ हे. हरा चारा प्रति 8-12 सप्ताह पर कटाई करने पर प्राप्त होता है। मुख्य शाखा को इमारती लकड़ी या जलाऊ लकड़ी के लिए बढने देते है। 5-6 वर्ष में 20-30 सेमी व्यास की 18 मीटर लम्बी 10000 / हे. पौध सही देखरेख करने से प्राप्त हो सकती है।

पेरू किस्म में 4-6 सप्ताह में कटाई कर सकते हैं। हवाई जायन्ट के – 8 से 5000 / हे. से 8 टन हरा चारा 1.5 वर्ष में प्राप्त होता है । इमारती लकड़ी हेतु 12-15 वर्ष बाद कटाई करते हैं।

सूबबूल के पौध को लगाने के दो वर्ष बाद कटाई-छंटाई कर सकते हैं। जिसके लिए भाखा के अंगूठे जैसी मोटी शाखाओं को तेज धार की कैंची से काट सकते हैं। के- 8, इसकी लम्बाई 20 फीट या भाखाओं के बीच का कोण न्यूनतम तथा वर्षा आश्रित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसके 30-40 टन/ हे. जैवभार प्राप्त हो सकता है। कनीघंम टाइप में माइमोसीन कम होता है। जैवभार 30-40 टन/ हे. होता है।

किस्में :

पेरू टाइप : यह घनी शाखा एवं झाड़ीयुक्त अधिकतम ऊँचाई 5 मीटर तक होती है। इससे मोटी भाखाएं कम तथा हरा चारा पर्याप्त मिलता है। यह चारा एवं छायायुक्त फसल उगाने के लिए उपयुक्त है। इसकी कुछ भारतीय किस्में के-8, के-28, के 67 है जो चारा उत्पादन तथा वन चरागाह पद्धति के लिए उपयुक्त है ।

हवाई टाइप यह लम्बे तथा कम शाखा की भी बढ़ने वाली किस्म है जिसकी लम्बाई 50 मीटर तक जाती है। यह चाय बागान के लिए उपयुक्त है तथा इससे इमारती लकड़ी प्राप्त होता है।

सल्वाडोर टाइप :

इसे आर्वारियल या ग्वाटेमाला टाइप भी कहते हैं। जिसके पौध अलग-अलग ऊँचाई के होते हैं। यह बहुत ही उपजाऊ किस्म है जो उद्योगों के लिए बिजली उत्पादन हेतु जलाऊ लकड़ी प्रदान करती है। के-8 इसकी लम्बाई 20 फीट या शाखाओं के बीच का कोण न्यूनतम तथा वर्षा आश्रित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसके 30-40 टन/ हे. जैवभार प्राप्त हो सकता है ।

कनीघंम टाइप

इसकी शाखा फैली – फैली रहती है। इसमें माइमोसीन कम होता है। जैवभार 30-40 टन/हे होता है।

पोषक तत्व :

इसका चारा स्वादिष्ट सूपाच्य एवं प्रोटीन युक्त होता है। इसके पत्ती में 80 प्रतिशत शुष्क भार, 24.2 क्रूड प्रोटीन, 13.3 प्रतिशत क्रूड फाइबर, 10.8 प्रतिशत खनिज तत्व, 1.9 प्रतिशत कैल्शियम, 0.2 प्रतिशत फॉस्फोरस, 19.7 प्रतिशत पाचक प्रोटीन पाया जाता है।

इसकी पत्तियों में पर्याप्त मात्रा में कैरोटीन तथा विटामिन भी पाया जाता है। इसके चारे में शुष्क भार का 3.5 प्रतिशत मीमोसीन (एमीनो एसिड) होता है, जो पशुओं के लिए नुकसानदायक होता है, अतः पशु आहार में 20 प्रतिशत से कम सूबबूल होना चाहिए। मुर्गियों के आहार में शुष्क भार का 6 प्रतिश तथा सूअर इत्यादि बिना रोमपंथी पशु के आहार में 10 प्रतिशत से कम होना चाहिए ।

वृक्ष – फसल का संयोजन :

जब इसके साथ साथ सस्य फसल लेते हैं तो कटाई-छंटाई करते हैं अन्यथा यह छाया प्रदान करके फसल की उपज को कम करता है। इसके कटाई-छंटाई से वर्ष पर्यन्त हरा चारा मिलता है। 5×2 मीटर पर लगाने से अंतः स्थान में मक्का, ज्वार, बाजरा, लोबिया, जई इत्यादि लेकर वर्ष पर्यन्त हरा चारा प्राप्त कर सकते हैं। इसका ऐले फसल से 70-80 कुन्तल हरा चारा, 40-45 कुन्तल जलाऊ लकड़ी प्राप्त हो सकता है। ऐले के बीच गेहूँ, जौ की खेती कर सकते है 1

अन्य उत्पाद :

दलहनी होने के कारण यह नत्रजन संश्लेशण का भी काम करती है। यह भूमि की उर्वरता बढाने में भी सहायक है जो साथ में फसलों के लिए लाभकारी होता है। अच्छे मृदा- जलवायु की दशा में यदि इसे हरी खाद के लिए प्रयोग किया जाये तो यह 500 कि.ग्रा./हे. की दर से भूमि में नत्रजन भूमि में संजोकर एवं अच्छा जैविक खाद का भी काम कर सकती है। इसकी लकड़ी जलाऊ, चारकोल तथा पोल एवं लुगदी के लिए उपयुक्त है।

Hybrid Kheere ki kheti ki jankari

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top