जैविक खेती: एक लाभकारी और Top ऑर्गैनिक खेती से पर्यावरण को लाभ

जैविक खेती के नियम के अनुसार भारत में कुछ जैवी खेती या ऑर्गैनिक खेती इस प्रकार है -orgainic farming , भारत में जैविक खेती, जैविक खेती की आवश्यकता , जैविक परिभाषा , जैविक खेती के घटक,जैविक खेती का विकास , जैविक खेती का प्रोजेक्ट,से होने वाले लाभ और परिणाम के बारे में आज अपने ब्लॉग पोस्ट में बात करेंगे |

Table of Contents

जैविक खेती

अपना खेती , अपना बीज , अपना खाद , अपना स्वाद

परिचय -जैविक खेती

जैविक खेती एक ऐसी खेती होती है जिसमे हम पर्यावरण को कोई हानि नहीं होने देते जिसकी वजह से हमारे खेतो की प्राकतिक संतुलन भी कायम रहता है | जैविक खेती में हम भूमि में जल और वायु को बिना दुसित किये लम्बे समय तक उत्पादन को प्राप्त करने में सफल रहते है| जैविक खेती में हम बहुत ही कम रसायनिक उपयोग करते है या फिर जरुरत के अनुसार उपयोग करते है |

यह कृषि रसायनिक पद्दति के अनुसार सस्ती और स्वालम्बी एवं स्थाई होती है | कृषक इसकी मिटटी को जीवित मानते है |इस तरह के भूमि में जीवो का अंश माना जाता है | जैविक खेती में जीवांश के रूप में गोबर , पौधे ,व जीवो के अवशेस इत्यादि को खाद के रूप में जमीं या भूमि को प्राप्त होता है |

जीवांश खादों के प्रयोग से पौधों के समस्त पोषक तत्वो से प्राप्त हो जाते हैं। साथ हीसाथ इनके प्रयोग से उगाई गयी फसलों पर बीमारियों एवं कीटों का प्रकोप बहुत कम हो जाता है, जिससे हानिकारक रसायन, कीटनाशकों के छिड़काव की जरुरत नहीं पड़ती है। जैविक खेती परिणाम यह मिलता है, कि -फसलों से प्राप्त खाद्य , फल एवं सब्जी आदि हानिकारक रसायनों से पूर्णतः मुक्त हो जाते हैं, जीवांश खाद के प्रयोग से उत्पादित खाद्य पदार्थ अधिक स्वादिष्ट,एवं पोषक – तत्वों से भरपूर एवं रसायनों से मुक्त रहते हैं। जैविक खेती के लिए जीवांश जैसे- गोबर की खाद (नैडप विधि) वर्मी कम्पोस्ट, जैव उर्वरक एवं हरी खाद का प्रयोग भूमि में किया जाना जरुरी है।

1.नादेप कम्पोस्ट :

कम्पोस्ट बनाने का एक नया विकसित तरीका नादेप विधि है, जिसमें महाराष्ट्र के कृषक नारायण राव पान्डरी पाडे (नाडेप काका) ने खोज की है ।इस नादेप विधि में कम्पोस्ट खाद जमीन की सतह पर टांका बनाकर उसमें प्रक्षेत्र अवशेष तथा बराबर मात्रा में खेत की मिट्टी तथा गोबर को मिक्स करके बनाया जाता है। इस विधि से 01 किलो गोबर से 30 किलो खाद चार माह में बनकर तैयार हो जाती है । नादेप कम्पोस्ट निम्न तरीको द्वारा तैयार किया जाता है

(1) टांका बनाना :

नादेप कम्पोस्ट का टांका उस स्थान पर बनाये जाना चाहिए जहाँ भूमि समतल (Plane)हो तथा जल भराव की समस्या न हो। टांका के निर्माण हेतु आंतरिक माप 10 fut लम्बी, 6 fut चौड़ी और 3 fut गहरी होना चाहिए । इससे गड्ढे की मापन से टांका का आयतन 180 घन फुट हो जाता है। टांका बिधि में टांका की दीवार लगभग 9 Inch चौड़ी रखना। दीवार बनाने में कुछ बाते याद रखना जरुरी है | जैसे – कि बीच- बीच(Mid) में छेद छोड़ छोड़ना जरुरी होता है | इस प्रकार कि टांका में वायु का स्थान्तरण बना रहे , और खाद सामग्री आसानी से पक जाये । प्रत्येक दो ईटों के बाद तीसरी ईंट की जुड़ाई करते समय 7 इंच(Inch) का छेद छोड़ देना जरुरी है । 3 फुट ऊँची दीवार में पहले, तीसरे छठे और नवें रदे में छेद बनाना चाहिए। दीवार के भीतरी व बाहरी हिस्से को गाय या भैंस के गोबर से अच्छे से लीप दिया जाता है और फिर तैयार टांका को सूख जाने देना चाहिए। इस प्रकार के बने टांका में नादेप खाद बनाने के लिये मुख्य रूप से 4 चीजों की जरुरत पड़ती है |

पहली : व्यर्थ पदार्थ(Waist Material) या कचरा जैसे- सूखे एवं हरे पत्ते, डंठल,छिलके, जड़ें व बारीक टहनियां एवं व्यर्थ खाद पदार्थ (Waist Material) आदि । हमे ध्यान रखना चाहिए की इसमें कोई पल्स्टिक व कांच का कोई ख़राब पदार्थ न पड़पाये |इस प्रकार कचरे की मात्रा 1500 किलोग्राम(kg ) की जरुरत होती है।

दूसरी : गाय या भैंस का गोबर 100 किलोग्राम से गैस संयंत्र से निकाले गए गोबर का घोल ।

तीसरी : 1750 किलोग्राम मिट्टी चाहिए जो की सूखी महीन छनी हुई तालाब या नाले से निकाली गयी मिटटी । अगर गौसले की मिटटी मिल जाये तो अति उत्तम रहेगी ।उस मिट्टी में प्लास्टिक /पॉलीथीन नहीं होना चाहिए ।

चौथी : पानी की जरुरत मौसम पर निर्भर करता है। बरसात में उस जगहे हो जहाँ पानी की जरुरत कम हो | और उस जगहे पर गर्मी के मौसम में अधिक पानी की जरुरत होगी। लगभग 2000 लीटर की जरुरत पड़ेगी । इसमें अगर आप गो-मूत्र या अन्य पशु- मूत्र मिला देने से नादेप खाद की गुणवत्ता(Quality) में बढ़ोत्तरी होगी ।

(2) टांका का भरना :

टांका भरते समय कुछ बातो को ध्यान रखना चाहिए, कि टांका को भरने की प्रक्रिया एक ही दिन में समाप्त हो जाये । और इसलिए जरुरी है, कि हम कम से कम दो टैंकों का निर्माण करें| ,ताकि हम सभी सामग्री को इकट्ठा एक ही दिन में टैंक को पूरा भरने की प्रक्रिया कर सके। टैंक भरने प्रक्रिया निम्न प्रकार है- :

पहली परत : व्यर्थ पदार्थों (Waist Material) की 6 Inch की ऊँचाई तक फुल करते हैं। इस प्रकार व्यर्थ पदार्थों(Waist Material) की 30 घन फुट जो लगभग एक कुन्तल के बराबर होती है।

दूसरी परत : जो की गोबर के घोल बनायीं जाती हैं,और इसमें 150 लीटर(Liter) पानी में 4 किलोग्राम(KG) गोबर अथवा बायोगैस संयंत्र की गोबर के घोल की ढाई गुना ज्यादा(More) मात्रा में उपयोग में करते है । इस घोल की व्यर्थ पदार्थों(Waist Material) द्वारा निर्मित पहली परत पर अच्छी प्रकार से मिलने देते हैं ।

तीसरी परत : इसमें छनी हुई सूखी मिटटी की प्रति परत(Layer) आधा Inch मोटी दूसरी परत के ऊपर बिछा कर बराबर कर लेते है ।

चौथी परत : इस परत को हम परत न कहकर पानी की हल्की छीटें कह सकते हैं। इसमें जरुरी है- कि टैंक में लगायी गयी परतें ठीक से उसमे बैठ जायें ।

इस क्रम को क्रमशः टांका को पूरा भरने की किरिया को दोहराते है। टैंक भरने बाद उसमे अन्त में 2.5 फुट(Fut) उचाई(Hight) वाले झोपड़ी नुमा आकार में भराई(fulfil) करते हैं। इस तरह टैंक भरने बाद इसमें गोबर व गीली मिट्टी के मिश्रण(mix) से लेप लगाते हैं। अक्सर यह देखा जाता है कि- 10 या 12 परतों में गड्ढा पूरा फुल हो जाता है। यदि नादेप कम्पोस्ट की गुणवत्ता(Quality) में अधिक वृद्धि करती है ,तो आधा इंच(INch) मिट्टी की परतों के ऊपर 1.5 किलोग्राम जिप्सम 1.5 किलोग्राम(kg) राक फास्फेट + एक किग्रा(kg). यूरिया(Uria) का मिश्रण(mix) बनाकर सौ ग्राम प्रति परत बिखेरते जाते हैं। टांका भरने के 60 से 70 दिन बाद राइजोबियम(Raijobium) + पी.एस.बी. + एजोटोबैक्टर(aejotobactor) का कल्चर बनाकर मिश्रण को छेदों के द्वारा अंदर डाल देते हैं।

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टांका भरने के 15 -20 दिनों के बाद उसमें दरारे बनने लगती हैं, तथा इस विघटन के कारण मिश्रण(mixran) टैंक में नीचे की ओर बैठने या दबने लगता है। इस प्रकार की अवस्था में इसे उपरोक्त बताई गई, विधि से दुबारा(repet) भरकर मिट्टी एवं गोबर के मिश्रण(mix) से उसी प्रकार लीप दिया जाये |जैसा- कि पहली बार किया गया था। यह जरुरी है, कि टांका में 60 प्रतिशत(%) नमी का स्तर हमेशा बना रहे। इस तरह से नादेप कम्पोस्ट(compost) 90 से 110 दिनों में बनकर प्रयोग(use) हेतु तैयार हो जाती है।

लगभग 3.0 से 3.25 टन प्रति(/) टैंक नादेप कम्पोस्ट (compost)बनकर प्राप्त होती है, तथा इसका 3.5 टन प्रति हैक्टेयर (/hectare)की दर से खेतों में प्रयोग(use) करना पर्याप्त होता है। इस कम्पोस्ट(compost) में पोषक तत्वों की मात्रा(quantity) नइट्रोजन के रूप में 0.5 से 1.5 फास्फोरस(fasforas) के रूप में 0.5 से 0.9 तथा पोटाश(k) के रूप में 1.2 से 1.4 प्रतिशत(%) तक पायी जाती है। नादेप टांका(Nadep taanka) 10 वर्ष तक अपनी पूरी क्षमता से कम्पोस्ट(compost) बनाने में सक्षम रहता है।

नादेप कम्पोस्ट(compost) बनाने हेतु प्रति टांका(taanka) निर्माण में लगभग दो हजार(two thousand) रूपये की लागत आती है। यदि 6 टांका का निर्माण कर समय अन्तराल के स्वरूप एक एक टांका भरकर कम्पोस्ट(compost) बनाई ,जाये तो गरीबी की रेखा से नीचे जीवन (majdoor)यापन करने वाले व शिक्षित(education) बेरोजगारों को चार हजार(four thousand) रूपये प्रति माह के हिसाब से आर्थिक लाभ(benefits) हो सकता है।

2.वर्मी कम्पोस्ट–एक उत्तम जैविक खाद :

वर्मी कम्पोस्ट(compost) निर्माण में महत्वपूर्ण(important) भूमिका केचुओं की है, जिसके द्वारा कार्बनिक(corbenic) / जीवांश पदार्थों(Material) को विघटित करके /सड़ाकर(गलाकर) यह खाद तैयार की जाती है। यही वर्मी कम्पोस्ट(compost) या केंचुए की खाद(khad) कहलाती है वर्मी कम्पोस्टिंग(composting) कृषि के अवशिष्ट पदार्थ(Waist material), शहर तथा रसोई के कूडे कचरे को पुनः(re) उपयोगी(use) पदार्थ में बदलने तथा पर्यावरण प्रदूषण(envarmental) को कम करने की एवं प्रभावशाली विधा(vidha) है।

वर्मी कम्पोस्ट(compost) बनाने में किन-किन कार्बनिक पदार्थों(material) का प्रयोग किया जा सकता है ?

(अ) कृषि या फसल अवशेष :भूसा, पुवाल, गन्ने की खोई, खरपतवार,पत्तियां, फूस, फसलों के बायोगैस अवशेष, गोबर डंठल,आदि ।

(ब) घरेलू तथा शहरी कूड़ा कचरा : सब्जियों (vegetable)के छिलके तथा अवशेष, फलों(frutes) के छिलके तथा अवशेष, फलों(frutes) के छिलके तथा सब्जी मण्डी का कचरा, भोजन(food) का अवशेष आदि ।

(स) कृषि उद्योग सम्बन्धी व्यर्थ पदार्थ(material) : वनस्पति तेल शोध मिल, शराब उद्योग,चीनी मिल, बीज तथा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग(udyod) तथा नारियल(coconut) उद्योग के अवशिष्ट पदार्थ ।

जैविक खेती के लिए केचुओं की प्रजातियां :

कम्पोस्ट बनाने की सक्षम प्रजातियों(प्रकार ) में मुख्य रूप से ‘इसेनिया फोटीडा’ (eseniya fotida)तथा ‘इयू ड्रिल्स इयूजीनी’ है जिन्हें केचुयें की लाल प्रजाति(type) भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त ‘लैम्पीटो माउरीटी’,’पेरियानिक्स एक्सवकेटस’, ‘डावीटा कलेवी’ तथा डिगोगास्टर(digogaster) बोलाई प्रजातियां भी है, जो कम्पोस्टिंग(composting) में प्रयोग की जाती हैं, परन्तु ये लाल(red) केचुओं से कम प्रभावी है।

जैविक खेती के लिए वर्मी कम्पोस्ट(compost) कैसे बनायें :

किसी ऊँचे छायादार स्थान(place) जैसे पेड़ के नीचे या बगीचे(garden) में 2 मीटर x 2 मीटर x 2 मीटर क्रमशः चौड़ाई,लम्बाई तथा गहराई का गड्ढा बनायें जाते है । गड्ढे(gaddhe ) के अभाव में इसी माप(measurment) की लकड़ी या प्लास्टिक(plastic) की पेटी का भी प्रयोग(use) किया जा सकता है। जिसके निचले सतह पर जल निकास(way) हेतु 10-12 छेद बना देने चाहिए।

क – सबसे नीचे ईंट या पत्थर(stone) की 11 सेमी.(cm) की परत बनाइये फिर 2.0 सेमी. मौरंग या बालू(desurt) की दूसरी तह लगाइये। इसके ऊपर 15 सेमी.(cm) उपजाऊ मिट्टी की तह लगाकर पानी(water) के हल्के छिड़काव से नम कर दें।

ख – इसके बाद अधसड़ी गोबर(dung) डालकर एक किलो(kg) प्रति गड्ढे की दर से केचुएं छोड़ दें ।

10 सेमी. घरेलू कचरे जैसे -सब्जियों(vegetable) के अवशेष, छिलके आदि कटे हुए फसल(fasal) अवशेष्ट जैसे पुवाल,जलकुंभी भूसा, पेड़ पौधों की पत्तियां(leaves) आदि, को बिछा दें। 20-25 दिन तक आवश्यकतानुसार(needable) पानी का हल्का छिड़काव(spray) करते रहें |इसके बाद प्रति सप्ताह(week) दो बार 5-10 सेमी. सडने योग्य (capacity)कूड़े कचरे की तह लगाते रहें | जब तक कि पूरा गड्ढा भर(fulfil) न जाये ।

रोज पानी (water)का छिड़काव करते रहें । कार्बनिक पदार्थ के ढेर पर लगभग(about) 50 प्रतिशत नमी होनी चाहिए। 6-7 सप्ताह(week) में वर्मी कम्पोस्ट(compost) बनकर तैयार हो जाता है। वर्मी कम्पोस्ट(compost) बनने के बाद 2-3 दिन तक पानी का छिड़काव(spray) बन्द कर देना चाहिए। इसक बाद खाद(khad) निकाल कर छाया में ढेर लगाकर सुखा(dry) देते हैं। फिर इसे 2 मिली. छन्ने से छानकर(distribute) अलग कर लेते हैं ।

इस तैयार में 20-25 प्रतिशत(%) नमी होनी चाहिए। इस तैयार खाद(khad) को आवश्यक(need) मात्रा में प्लास्टिक की थैलियों(plastic) में खाद भर देते है।

इसके अतिरिक्त वर्मी कम्पोस्ट(compost) का निर्माण वायु(air) पंक्ति (विन्डरो)। विधि से भी किया जा सकता है जिसमें जीवांश पदार्थ(material) का ढ़ेर किसी छायादार जमीन(land) की सतह पर लगाकर किया जाता है, वर्मी कम्पोस्ट का निर्माण ‘रियेक्टर'(reactor) विधि से किया जाता है ,जो अधिक खर्चीला(expensive) तथा तकनीकी है । ऊपरी बतायी गयी विधि अत्यन्त सरल(esay) है ,तथा किसान आसानी(esay) से अपना सकता है ।

जैविक खेती के लिए केंचुए का कल्चर(culture) या इनाकुलम तैयार करना :

केंचुए कूड़े कचरे के ढेर के नीचे से कम्पोस्ट(compost) बनाते हुए, ऊपर(upward) की तरफ बढ़ते हैं, पूरे गड्ढे भी कम्पोस्ट(compost) तैयार होने के बाद ऊपरी सतह(layar) पर कूड़े कचरे की एक नयी(new) सतह लगा देते हैं तथा पानी छिड़क(spray) कर नम कर देते है। इस सतह की ओर सभी केंचुए (earthworms)आकर्षित हो जाते हैं। इन्हें हाथ(hand) या किसी चीज से अलग कर इकट्ठा(collect) कर लेते है जिसे दूसरे नये गड्ढे(pothole) में अन्तः क्रमण के लिये प्रयोग करते है।

जैविक खेती में वर्मी कम्पोस्ट(compost) के पोषक तत्व :

वर्मी कम्पोस्ट(compost) के अन्य जीवांश खादों(fertilizers) की तुलना में अधिक पोषक तत्व (Nutrients)उपलब्ध हैं। इसमें नाइट्रोजन(nitrogen) 1-1.5 प्रतिशत, फास्फोरस(phosphorus) 1.5 प्रतिशत तथा पोटाश(k) 1.5 प्रतिशत होता है। इसके अतिरिक्त इसमें द्वितीयक(secondary) तथा सूक्ष्म तत्व भी मौजूद होते है ।

जैविक खेती के लिए वर्मी कम्पोस्ट(compost) का प्रयोग :

धान्य फसलों, तिलहन(oilseeds) तथा सब्जियों(vegetables) के लिए 5.0 से 6.0 टन वर्मी कम्पोस्ट(वर्मी compost) प्रति हे. की दर से प्रयोग(use) करना चाहिए। बुवाई(sowing) के पहले इसे खेत(Farm) में बिखेर कर जुताई(plowing) करके भूमि में मिला(mix) देना चाहिए। फलदार वृक्षों(fruit trees) में 200 ग्राम प्रति पौधा(tree) तथा घास(grass) के लान में 3 किग्रा(kg)./ 10 वर्ग मीटर(meater) की दर से प्रयोग करें।

जैविक खेती के लिए वर्मी कम्पोस्ट के लाभ(benefits) :

1.मृदा के भौतिक(physical) तथा जैविक गुणों(Quality) में सुधार होता है ।

2.मृदा संरचना(structure) तथा वायु संचार में सुधार(Improvement) हो जाता है।

3.नाइट्रोजन(nitrojan) स्थरीकरण करने वाले जीवाणुओं(bactiria) की संख्या में वृद्धि होती है ।

4.कूड़े कचरे से होने वाले प्रदूषण(pollution) पर नियंत्रण होता है।

5.वर्मी कम्पोस्ट(compost) एक लघु कटीर उद्योग(small cottage industry) के रूप में रोजगार के नये अवसर प्रदान करता है।

6.फलों सब्जियों तथा खाद्यान्नों(food grains) की गुणवत्ता बढ़ती है तथा उनके उपज(Yield) में भी वृद्धि होती है।

7.यह रसायनिक उर्वरक(chemical fertilizers) की खपत कम करके मृदा स्वास्थय(soil health) को सुरक्षित रखने का प्रभावी उपाय है ।

3.जैव उर्वरक(organic fertilizers) :

जैव उर्वरक(organic fertilizers) विशिष्ट प्रकार के जीवाणुओं(bacteria) का एक विशेष प्रकार के माध्यम, चारकोल, मिट्टी या गोबर की खाद(cow dung Manure) में ऐसा मिश्रण है जो कि वायु मण्डलीय Nitrogen को चागिकीकरण(industrialization) द्वारा पौधों को उपलब्ध कराती है, या मिट्टी में उपलब्ध अघुलनशील(insoluble) फास्फोरस को घुलनशील(soluble) अवस्था में परिवर्तितत करके पौधों को उपलब्ध(Available) कराता है। जैव उर्वरक रसायनिक उर्वरकों (fertilizers)का विकल्प तो नहीं है परन्तु पूरक अवश्य(Sure) है। इनके प्रयोग से रासायनिक (chemical)उर्वरकों की 1 / 3 मात्रा तक की बचत(save) हो जाती है।

जैव उर्वरकों(organic fertilizers) का वर्गीकरण :

1.नाइट्रोजन पूर्ति करने वाले जैव उर्वरक

अ.राइजोबियम जैव उर्वरक

स.एजोस्पाइरिलम

ब. एजोटोबैक्टर

द.नील हरित शैवाल

2.फास्फोरसधारी जैव उर्वरक (पी.एस.बी.)

) राइजोबियम जैव उर्वरक(rhizobium organic fertilizer) : यह जीवाणु सभी दलहनी फसलों व तिलहनी(oilseeds) फसलों जैसे सोयाबीन और मूंगफली(Groundnut) की जड़ों में छोटी-छोटी ग्रन्थियों(glands) में पाया जाता है, जो सह जीवन के रूप में कार्य(work) करें वायु मण्डल में उपलब्ध नाइट्रोजन(nitorjen) को पौधों को उपलब्ध कराता है। राइजोबियम जीवाणु अलग-अलग(diffirent) फसलों के लिए अलग—अलग होता है। इसलिए बीज उपचार हेतु उसी फसल का कल्चर(crop culture) प्रयोग करना चाहिए।

) एजोटोवैक्टर(azotovector) : यह भी एक प्रकार का जीवाणु(bacteria) है जो भूमि में पौधे की जड़(Root) की सतह पर स्वतंत्र(free) रूप में रहकर आक्सीजन की उपस्थिति में वायुमण्डलीय(atmospheric) नत्रजन को अमोनिया में परिवर्तित(convert) करके पौधों को उपलब् कराता है। इसके प्रयोग से फसलों की उपज (

Yield)में 10-15 प्रतिशत(%) तक वृद्धि हो जाती है। इसका प्रयोग सभी अनाजवाली, तिलहनी, सब्जी वाली फसलों में किया जा सकता है।

) एजोस्पाइरिलम(Azospirillum) : यह भी एक प्रकार का जीवाणु(bacteria) है जो पौधों की जड़ों के पास रहकर, वायुमण्डल में उपलब्ध नाइट्रोजन पौधों(trees) को उपलब्ध कराता है ,इसका प्रयोग अनाज की चौड़ी पत्ती(broad leaf) वाली फसलों जैसे ज्वार, गन्ना(sugarcane) तथा बाजरा(Millet) आदि में किया जाता है ।

) नील हरित शैवाल(blue green algae) : नील हरित शैवाल भारत(India) जैसे- गर्म देशों की क्षारीय तथा उदासीन(Moody) मिट्टियों में अधिकता से पाई जाती है। इसकी कुछ प्रजातियों वायुमण्डल(atmosphiaric) में उपलब्ध नाइट्रोजन को अमोनिया(NH3) में परिवर्तित करके पौधों को NITROJEN उपलब्ध कराती हे । नील हरित शैवाल का प्रयोग केवल(ONLY) धान की फसल में किया जा सकता है। रोपाई के 8-10 दिन बाद दस किलोग्राम(KG) प्रति हे. के हिसाब से खड़ी फसल में छिड़का(SPRAY) जाता है। तीन सप्ताह(3 week) तक खेत में पानी भरा रहना आवश्यक है । इसके प्रयोग से धान(Rice) की खेती में लगभग 25-30 किग्रा. नाइट्रोजन(nitrojen) अथवा 50-60 किग्रा. यूरिया प्रति हेक्टेयर(hectare) की बचत की जा सकती है ।

फास्फोरसधारी जैव उर्वरक(Phosphorous Biofertilizer) :

यह जीवित जीवाणु(live bacteria) तथा कुछ कवकों का चारकोल(charcoal), मिट्टी अथवा गोबर की खाद में मिश्रण है, जो मिट्टी में उपस्थित अघुलनशील फास्फोरस(phosphorus) को घुलनशील सभी प्रकार की फसलों(crops) में किया जा सकता है, और लगभग 15-20 किग्रा. प्रति हे. फास्फोरस की मात्रा(Quatity) की बचत की जा सकती है।

जैव उर्वरकों(organic fertilizers) की प्रयोग विधि :

1) बीज उपचार विधि : जैव उर्वरकों के प्रयोग की यह सर्वोत्तम(the best) विधि है। 1/2 लीटर पानी में लगभग(about) 50 ग्राम गुड़ या गोंद उबालकर(by boiling) अच्छी तरह मिलाकर घोल(solution) बना लेते है| इस घोल को 10 किग्रा.(kg) बीज पर छिड़क(spray) कर मिला देते हैं, जिससे प्रत्येक बीज(seeds) पर इसकी परत चढ़ जाये। तब जैव उर्वरक को छिड़क (sprinkle) कर मिला दिया जाता है। इसके उपरान्त बीजों को छायादार(shady) जगह में सुखा लेते हैं । उपचारित बीजों की बुवाई(sowing) सूखने के तुरन्त बाद(after) कर देनी चाहिए ।

2) पौध जड़ उपचार विधि (Plant Root Treatment Method) : धान तथा सब्जी वाली फसलें(crops) जिनके पौधों की रोपाई (seedlings) की जाती है, जैसे फूलगोभी, टमाटर, पातगोभी, प्याज इत्यादि | फसलों में पौधों(trees) की जड़ों को जैव उर्वरकों (organic fertilizers) द्वारा उपचारित किया जाता है। इसके लिए किसी चौड़े व छिछले(wide and shallow) बर्तन में 5-7 लीटर पानी में एक किलोग्राम(kg) जैव उर्वरक मिला लेते है।

इसके उपरान्त नर्सरी(Nursery) से पौधों को उखाड़कर(uprooted) तथा जड़ों से मिट्टी साफ करने के पश्चात(after) 50-100 पौधों को बण्डल में बांधकर(bundled up) जीवाणु खाद के घोल में 10 मिनट तक डुबो(drown) देते हैं। इसके बाद तुरन्त रोपाई(seedling) कर देते है।

3) कन्द उपचार विधि(tuber treatment method) : अदरक,गन्ना, आलू, घुइया जैसे- फसलों(crops) में जैव उर्वरकों के प्रयोग हेतु कन्दों को उपचारित(treated) किया जाता है। एक किलोग्राम(kg) जैव उर्वरक को 20-30 लीटर घोलकर मिला लेते हैं। इसके उपरान्त कन्दों(tubers) को 10 मिनट तक धोल में डुबोकर(after dipping) रखने के पश्चात बुवाई कर देते है ।

4) मृदा उपचार विधि(soil treatment method) : 5-10 किलोग्राम जैव उर्वरक 70-100 kg. मिट्टी या कम्पोस्ट(compost) का मिश्रण तैयार करके अन्तिम जुताई(final plowing) पर खेत मिला देते है।

जैव उर्वरकों के प्रयोग में सावधानियां :

1.जैव उर्वरक(organic fertilizers) को हमेश धूप या गर्मता से बचा कर रखना चाहिए ।

2. कल्चर पैकेट(paket) उपयोग के समय ही खोलना चाहिए ।

3. कल्चर(culture) द्वारा उपचारित बीज, पौध, मिट्टी या कम्पोस्ट(compost) का मिश्रण छाया में ही रखना चाहिए।

4. कल्चर प्रयोग करते समय उस पर उत्पादन(Production) तिथि, उपयोग की Last date फसल का नाम आदि अवश्य लिखा देख(see) लेना चाहिए ।

5.निश्चित फसल के लिए अनुमोदित कल्चर(approved culture) का उपयोग करना चाहिए।

जैव उर्वरकों के उपयोग से लाभ :

1. रासायनिक उर्वरक एवं विदेश मुद्रा(foreign currency) की बचत ।

2. लगभग 25-30 किग्रा./हेक्टेयर | नाइट्रोजन एवं 15-20 किग्रा. प्रति हेक्टर पर फास्फोरस(phosphorus) उपलब्ध कराना तथा मृदा की भौतिक(physics) एवं रासायनिक(chemical) दशाओं में सुधार लाना ।

3.विभिन्न फसलों(various crops) में 15-20 प्रतिशत उपज में वृद्धि करना ।

4.इसके प्रयोग से अंकुरण(germination) शीघ्र होता है तथा कल्लों(Klons) की संख्या में वृद्धि होती है ।

5.इनके प्रयोग से उपज(Yield) में वृद्धि के अतिरिक्त गन्ने(sugarcane) में शर्करा की तिलहनी फसलों में तेल की तथा मक्का(Maize) एवं आलू में स्टार्च की मात्रा में बढ़ोत्तरी (growth)होती है ।

6.किसानों को आर्थिक लाभ(benefits) होता है।

4. हरी खाद एवं उसकी उपयोगिता (utility) :

मिट्टी(Soil) की उर्वरा शक्ति में वृद्धि हेतु पौधों के हरे वानस्पतिक(Botanical) को उसी खेत में उगाकर या दूसरे स्थान से लाकर खेत में मिला देने की क्रिया को हरी खाद (green manure)देना कहते हैं ।

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