ज्वार की खेती की जानकारी: उपयोगी टिप्स और गाइड 2023

भारत में कृषि एक महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि है, और आज हम ज्वार की खेती की जानकारी(jwar ki kheti ki jankari) के बिषय में बातें करें करेंगे | इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा ज्वार की खेती है। ज्वार एक अहम अनाज है जो भारतीय कृषि के लिए महत्वपूर्ण है, खासतर दक्षिण भारत में। ज्वार की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी, उचित पानी प्रबंधन, और सुखद जलवायु की आवश्यकता होती है।

ज्वार का पौधा कठिनाई और पर्याप्त पानी की कमी में भी अच्छी तरह से उग सकता है। यह ज्वार को सूखे और गरमी की परिस्थितियों में भी सहने में मदद करता है, जिससे यह एक महत्वपूर्ण फसल बन जाता है।

ज्वार की खेती से आर्थिक लाभ भी होता है, क्योंकि इससे उत्पादन में वृद्धि होती है और किसानों को स्थायी आय प्राप्त होती है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि ज्वार का उपयोग अनेक भारतीय खाद्य पदार्थों के रूप में होता है, जैसे कि रोटी, रोटला, और बिस्किटों में।

इसके साथ ही, ज्वार की खेती पर्याप्त खाद्य सुरक्षा प्रदान करती है और कृषि व्यवसाय में सामाजिक और आर्थिक सुधार को प्रोत्साहित करती है। इसलिए, ज्वार की खेती भारतीय कृषि के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और किसानों के जीवन को सुधारती है।

इस ज्वार की खेती मुख्यतयः प्रदेश के झांसी, हमीरपुर, जालौन, बांदा, फतेहपुर, प्रयागराज, फर्रुखाबाद, मथुरा एवं हरदोई जनपदों में होती है। प्रजातियों का चयन अच्छी उपज प्राप्त करने हेतु उन्नतशील प्रजातियों का शुद्ध बीज ही बोना चाहिए। बुवाई के समय क्षेत्र अनुकूलता के अनुसार प्रजाति का चयन करें। विभिन्न क्षेत्रों के लिए संस्तुत प्रजातियों की विशेषताओं तथा उपज क्षमता तालिका में दर्शायी गयी हैं ।

ज्वार की उन्नतशील प्रजातियां

प्रजातिपकने की अवधि(कु./हे.)दाने की उपज (कु./हे.)सूखे चारे की उपजभुट्टे के गुणउपयुक्त क्षेत्रफल
संकुल प्रजातियाँ :
वर्षा125-13025-30100-110दो दनिया,बुन्दुलखण्ड
हल्का बादामीको छोड़करसमस्त उ.प्र.
सी.एस.वी.- 13105-11122-27100-110एक दनियासमस्त उ. प्र.
सी.एस.वी.-15105-11023-28100-110तदैव
चमकीला हल्का बादामीएक दनिया,
बड़ा,मोती के समानतदैव
सफेद चमकीला विजेता100-11030-35115-120
संकर प्रजातियाँ :
सी.एस. एच. 16105-11038-4290-95लम्बा,तदैव
बादामी एक दनियामध्यम
सी.एस.एच. 9110-11535-4080-100एक दनिया,तदैव
चमकीला हल्का सी.एस.एच. 14100-10535-4080-100तदैव
सी.एस. एच. 18115-12535-4080-100तदैव
सी.एस. एच. 13115-12535-4080-100तदैव
सी.एस. एच. 23120-12540-4575-120तदैव
jwar ya jondhari ki unnatsheel kheti

खेत की तैयारी : 

बलुई दोमट अथवा ऐसी भूमि जहाँ जल निकास की अच्छी व्यवस्था हो, ज्वार की खेती के लिए उपयुक्त होती है। बुंदेलखण्ड क्षेत्र में ज्वार की खेती प्रायः मध्यम भारी एवं ढालू भूमि में की जाती है। मिट्टी पलटने वाले हल से पहली जुताई तथा अन्य दो – तीन जुताई देशी हल से करके खेत को भली भांति तैयार कर लेना चाहिए ।

भूमि शोधन : 

फसल को भूमि जनित रोगों से बचाने के लिए ट्राइकोडर्मा 2% डब्लू.पी. की 2.5 किग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर 60-75 किग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छीटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त आखिरी जुताई के समय खेतों में मिला दें दीमक, सफेद गिडार,सूत्रकृमि(sutrakrimi), जड़ की सूण्डी, कटवर्म(katwarm) आदि कीटों से बचाव हेतु किया जाता है |

ज्वार या जोंधरी की बुवाई :

(अ) समय: ज्वार की बुवाई हेतु जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक का समय अधिक उपयुक्त (ब) बीज – दर : 1 हे. क्षेत्र की बुवाई के लिए 10-12 किग्रा. बीज की आवश्यकता होती है।

Note : संकर : 7-8 किग्रा./ हे., संकुल : 10-12 किग्रा./हे. ।

(स) बीजोपचार: बोने से पूर्व एक किग्रा. बीज को थीरम के 2.5 ग्राम से शोधित कर लेना चाहिए, जिससे अच्छा जमाव होता है एवं कंडुवा रोग नहीं लगता है। दीमक के प्रकोप से बचने हेतु 2.5 मिली. प्रति किग्रा. बीज की दर से क्लोरपाइरीफास से शोधित करें।
(द) पंक्तियों और पौधों की दूरी : ज्वार की बुवाई 45 सेमी. की दूरी पर हल के पीछे करनी चाहिए। पौधे से पौधे की दूरी 15-20 सेमी. होनी चाहिए। देर से पकने वाली अरहर की दो पंक्तियों के बीच एक पंक्ति ज्वार का बोना उचित होगा । 

उर्वरक : 

उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना श्रेयस्कर होगा। उत्तम उपज के लिए संकर प्रजातियों के लिए 80:40:20 किग्रा. एवं अन्य प्रजातियों हेतु 40:20:20 किग्रा नत्रजन फास्फोरस तथा पोटाश प्रति हे. प्रयोग करना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत में बुवाई के समय कूंडों में बीज के नीचे डाल देना चाहिए तथा नत्रजन का शेष 1 / 2 भाग बुवाई के लगभग 30-35 दिन बाद खड़ी फसल में प्रयोग करना चाहिए ।

सिंचाई :

फसल में बाली निकलते और दाना भरते समय यदि खेत में नमी कम हो तो सिंचाई अवश्य कर दी जाय अन्यथा इसका उपज प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।

निराई-गुड़ाई: 

ज्वार की खेती में निराई-गुड़ाई का अधिक महत्व है । निराई-गुड़ाई द्वारा खरपतवार नियंत्रण के साथ ही ऑक्सीजन का संचार होता है जिससे वह दूर तक फैल कर भोज्य पदार्थ को एकत्र कर पौधों को देती है। पहली निराई जमाव के 15 दिन बाद कर देना चाहिए और दूसरी निराई 35-40 दिन बाद करनी चाहिए ।

ज्वार में खरपतवारों को नष्ट करने के लिए :

मध्यम भूमि के लिए, 1. एट्राजीन किग्रा प्रति हेक्टेयर या 800 ग्राम प्रति एकड़ दर दिन 2 दिनों के लिए बुवाई के तुरंत बाद, 500 लीटर प्रति हेक्टेयर या 200 लीटर प्रति एकड़ पानी में मिलाकर स्प्रे किया जाना चाहिए।

इस शाकनाशी के प्रयोग से एकवर्षीय घासकुल एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार बहुत ही प्रभावी रूप से नियमित हो जाते हैं। इस रसायन द्वारा विशेषरूप से पथरचटा (ट्राइएन्थीमा मोनोगाइना) भी नष्ट हो जाता है ।
2.हार्डी खरपतवारों जैसे कि वनपट्टा (ब्राचेरिया रेप्टान्स), रसभरी (कोमेलिया वैफलेन्सिस) को नियन्त्रित करने हेतुबुवाई के दो दिनों के अंदर, एट्राजीन 600 ग्राम और पेण्डीमेथिलीन 30 ई.सी. को 1 लीटर प्रति एकड़ में पूरी तरह से मिलाकर, 200 लीटर पानी के साथ प्रयोग करने पर उम्मीदवार परिणाम मिलते हैं।

फसल सुरक्षाः कीट :

1.ज्वार की प्ररोह मक्खी (शूट फ्लाई) :

पहचान : यह घरेलू मक्खी से छोटे आकार की होती है जिसका शिशु (मैगेट) जमाव के प्रारम्भ होते ही फसल को हानि पहुँचाती हैं।
उपचार : क्यूनालफॉस 25 ई.सी. 1.5 लीटर प्रति हे0 का छिड़काव करें।
2.तना छेदक कीट :
पहचान : इस कीट की सूंड़ियां तने में छेद करके अन्दर ही अंदर खाती रहती हैं जिससे बीच का गोभ सूख जाता है।
उपचार : मक्का के तना छेदक के लिए बताये गये उपायों को प्रयोग करें।
3. ईयर हेड मिज :
पहचान : प्रौढ़ मिज लाल रंग की होती है और यह पुष्प पत्र पर अण्डे देती है। लाल मैगेट्स दानों के अन्दर रहकर उसका रस चूसती हैं, जिससे दाने सूख जाते हैं।
उपचार : डाईमेथोएट 30 प्रतिशत ई.सी. 1.5 लीटर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
4. ज्वार का माइट :
पहचान : यह बहुत ही छोटा अष्टपदीय होता है, जो पत्तियों की निचली सतह पर जाले बुनकर उन्ही के अन्दर रहकर पत्तियों से रस चूसता है। पत्तियाँ जब ग्रसित होती हैं, तो वे लाल रंग की हो जाती हैं और सूखने लगती हैं।

 उपचार : निम्न रसायनों में से किसी एक का छिड़काव करना चाहिए। डाइमेथोएट (30 ई.सी) 1 लीटर प्रति हे. अथवा क्लोरपाइरीफास 25 ई.सी. 1.5-2.00 लीटर प्रहित हेक्टेयर ।

5. दीमक :

खड़ी फसल में प्रकोप होने पर सिंचाई के पानी के साथ क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत ई.सी. 2.5 ली0 प्रति हे० की दर से प्रयोग करें ।

ज्वार या जोंधरी का भूरा फफूँद(fafund) :

पहचान : प्रारम्भिक अवस्था में बीमारी सफेद रंग की फफूँदी बालियों एवं वृन्त पर दिखाई देती है । अन्ततः जो दाने बनते है वह भद्दे एवं उनका रंग हल्का गुलाबी भूरा या काला फफूँदी के अनुसार हो जाता है। रोग ग्रसित दाने हल्के या भुरभूरे हो जाते है ऐसे दानों का उपयोग स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता | यह बीमारी ज्वार की संकर प्रजाति अथवा शीघ्र पकने वाली प्रजातियों में प्रायः अधिक पाई जाती है।

• खेत की गहरी जुताई करें।
• फसल चक्र सिद्धान्त का प्रयोग करें ।
फसल और खराबी के अवशेषों को उन्मूलन करें।

  • सिंचाई का समुचित प्रबन्ध करें।
  • उन्नतशील / संस्तुत प्रजातियों की ही बुवाई करें।
  • बीजशोधन हेतु थिरम 75 प्रतिशत डब्लू0एस0 2.5 ग्राम अथवा कार्बेण्डाजिम 50 प्रतिशत डब्लू0पी0 की 2.0 ग्राम अथवा मेटालैक्सिल 35 प्रतिशत डब्लू0एस0 की 6.0 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिए ।
  • रासायनिक नियंत्रण हेतु मैंकोजेब 75 प्रतिशत डब्लू०पी० 2.0 किग्रा. प्रति हे. की दर से 700-800 ली0 पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

उपचार : मैंकोजेब 2.00 किग्रा./हे0 की दर से आवश्यकतानुसार छिड़काव करें।

सूत्रकृमि: रोकथाम हेतु गर्मी की गहरी जुताई आवश्यक है।

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प्रभावी बिन्दु :

  • उन्नतिशील / संस्तुत प्रजातियों की बुवाई समय से करायें ।
  • बीज शोधन अवश्य करें ।
  • उर्वरक का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करें ।
  • बाली निकलने एवं दाना बनते समय पानी आवश्यक है। अतः वर्षा के अभाव में सिंचाई करें ।
  • कीट एवं रोगों का समय से नियंत्रण करें ।
  • दो पंक्तियों के बीच में हल बैल चलित कल्टीवेटर / हो चलाकर खरपतवार नियंत्रण करें

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