कालानमक धान की आधुनिक खेती से पैसा ही पैसा कमाइए 2023

कालानमक धान पूर्वाचल की पहचान, अतिसुगन्धित और ओषधीय गुणों से परिपूर्ण है। उत्तर प्रदेश सरकार की एक जिला एक उत्पाद’ के नीति के अनुरूप सिद्धार्थनगर जिले को कालानमक उत्पादन का बढ़ावा देने की जिम्मेदारी मिली है। लगभग तीन हजार वर्षों से इसी क्षेत्र से भगवान बुद्ध के जीवनकाल से इसकी खेती होती आ रही है।

एक समय ऐसा भी था जब पूर्वाचल में 50 हजार हैक्टेयर से भी अधिक क्षेत्रफल में इसकी खेती होती थी, किन्तु अधिक उपजशील प्रजातियों के आने से कालानमक पर उपयोगी अनुसंधान और प्रजातियों के आभाव में और इसकी खेती से कम आमदनी होने के कारण. कालानमक की खेती अलाभकर हो गई। अतः इसका क्षेत्रफल गत 20 वर्षो में 2 हजार हैक्टेयर से भी घटने लगा। इस प्रकार कालानमक धान लगभग विलुप्त होने के कगार पर आ गया था।

वर्ष 1998 में जब पीआरडीएफ संस्था ने नरेन्द्रदेव कृषि विश्वविद्यालय, नाबार्ड, उत्तर प्रदेश कृषि विभाग तथा स्थानीय जन प्रतिनिधियों के सहयोग से ‘कालानमक धान के पुनरूत्थान और पुनर्जागरण का आयोजन किया तो निराशा का वातावरण था। लम्बे तर्क-वितर्क के बाद यह निश्चय किया गया कि कालानमक एक ‘ऋषि ऋण है इसको हमें चुकता करना है कालानमक को जीवित रखकर उस समय के कृषि मंत्री ने पीआरडीएफ से चाहा कि उक्त यह आश्वासन आन्दोलन चलता रहेगा।

नरेन्द्र देव कृषि विश्वविद्यालय, पीआरडीएफ संस्था, उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद् (उपकार) तथा कृषि विभाग के समन्वित सहयोग से एक=-
आन्दोलन चलाया गया जिसमें मुख्य भूमिका पीआरडीएफ की रही । प्रारम्भिक अवस्था उपकार की आर्थिक सहायता और बाद
टाटा समूह से मिली आर्थिक सहायता से चला यह कार्यक्रम अनेक उपलब्धियों का आधार बना ।

जननद्रव्य का संकलन, प्रजातियों का प्रजनन, बौद्धिक सम्पदा की संरक्षा और जैविक खेती की नवोन्मेषी विधि क विकास और कालानमक का बाजारीकरण, एक-एक करके जुडते रहे। किसानों का सहयोग और उत्साह मिला। इस कारण विलुप्त होता कालानमक अब एक बार पुनः अपनी पुरानी ख्याति प्राप्त करने और किसानों को समृद्धि दिनाने की ओर अग्रसर हो रहा है। सामान्य धान की खेती तथा कालानमक धान की खेती में कोई विशेष अन्तर नहीं है। इन्ही भिन्नताओं और उपलब्धियों का संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया गया है।

कालानमक धान की आधुनिक खेती की प्रजातियां

कालानमक धान एक क्षेत्रीय प्रजाति (लैण्ड रेस) बन गया था जिसकी कोई भी विमोचित अथवा भारत सरकार द्वारा विज्ञप्तित प्रजाति नहीं थी । इसकी पहली प्रजाति जो उत्तर प्रदेश के कृषि विभाग द्वारा विमोचित तथा भारत सरकार द्वारा विज्ञप्तित हुई वह वर्ष 2010 में कालानमक केएन-3 के नाम से आई। यह सुगन्धित तो थी परन्तु लम्बी बढ़ने वाली तथा इसकी पैदावार भी कम थी।

इसके बाद अधिक उपजशील और बौनी प्रजाति बौना कालानमक 101 वर्ष 2016 तथा बौना कालानमक 102 वर्ष 2017 में आई । विस्तृत विवरण के लिये तालिका 1 देखें ।

 कालानमक धान की आधुनिक खेती,
KALANAMAK DHAAN KI AADHUNIK KHETI KAISE KARE

तालिका 1 कालानमक की तीन प्रजातियों केएन-3, बौना काला और बौना काला नमक – 102 के विशिष्ट एवं पहचाने जाने वाले गुण : नमक – 101
इससे स्पष्ट है कि कालानमक धान की वर्ष 2017 तक कुल तीन प्रजातियां ही उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विमोचित तथा भारत सरकार द्वारा विज्ञप्तित हैं। कालानमक के विषय में कुछ अन्य जानने योग्य बाते
निम्न हैं-

क्र. स.पादप और दाने के गुणके एन. 3बौना कालानमक – 101बौना कालानमक – 102
1बिमोचन का वर्ष201020162017
2प्रजनन की विधिशुद्ध वंश क्रम वर्नसंकरणसंकरण
3पूर्ण आवरण रंगहराहराहरा
4पुष्पन की अवधि115105105
5पकने की अवधि145133135
6पौध की उचाई142 सेमी.95 सेमी.95 सेमी.
7बाली की लम्बाई31 सेमी.35 सेमी.35 सेमी.
8दाने की सुगंधअत्यंत सुगन्धितअत्यंत सुगन्धितअत्यंत सुगन्धित
9भूसी का रंगबैगनी कालाभूरा कालाभूरा काला
10दाने पर तूड़नहींथोड़ानहीं
11चावल की लम्बाई5.76 सेमी.5.76 सेमी.5.76 सेमी.
12चावल की मोटाई2.18 सेमी.2.18 सेमी.2.18 सेमी.
कालानमक धान की आधुनिक खेती

4. वर्ष 2013 से कालानमक की जैविक खेती का प्रोटोकाल बना दिया गया है। उक्त प्रोटोकाल

कालानमक का जैविक उत्पादन कर सकते हैं तथा पीआरडीएफ गोरखपुर से जैविक प्रमाण पत्र प्राप्त कर सकत हैं

किलोग्राम प्रति हैक्टेयर नत्रजन, फास्फोरस और पोटाश का उपयोग करें। जिन क्षेत्रों में जस्ते की कमी होती प्रयोग में लाना चाहिये।

फसल की देखभाल :

चूँकि कालानमक की रोपाई जुलाई महीने के अन्त तक की जाती है अतः रोपाई सेका उपयोग करके किसान है यहाँ 25 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर पहले खेत की तैयारी करते समय सभी जिंक सल्फेट रोपाई के प्रयोग से पहले उगे हुये खर-पतवार नष्ट हो जाते हैं। इस कारण रोपाई के एक महीने के अन्दर एक बार हाथ से निराई करके खर-पतवार का नियन्त्रण कर सकते हैं।

इसके बाद कालानमक की फसल स्वयं ही खरपतवारों को खेत में उगने नहीं देती । अतः दूसरी बार निराई अथवा रसायनिक खर-पतवारनाशी के उपयोग करने की आवश्यक्ता नहीं पड़ती है।

5. गोरखपुर स्थित पीआरडीएफ संस्था राष्ट्रीय जैविक खेती का रिजनल काउन्सिल है। इसके अन्दर प्रदत्त अधिकारी से पीआरडीएफ पार्टीसिपेटरी गारन्टी सिस्टम (पीजीएस) प्रणाली में जैविक उत्पाद को प्रमाण पत्र देने में सक्षम है। अतः जो किसान कालानमक धान या किसी अन्य फसल का जैविक उत्पादन करना चाहते हैं पीआरडीएफ से संम्पर्क करके अपने उत्पाद का जैविक प्रमाणीकरण करा सकते हैं।

इसके लिये उन्हें संस्तुत की गई प्रक्रिया को अपनाना होगा । वर्ष 2018 में पहली बार कालानमक चावल का निर्यात सिंगापुर के लिये किया जा रहा है। कालानमक का निर्यात कालानमक के उत्पादकों और विक्रेताओं को मिलने वाले लाभ को बढावा देगा और साल दर साल उनके लाभ का तीन गुना करेगा।

कालानमक धान की खेती

किसान कालानमक केएन-3 अर्थात् लम्बी बढने वाली प्रजाति की खेती करना चाहते है तो उसमें खाद की मात्रा 60 किलोग्राम नत्रजन, 30 किलीग्राम फास्फोरस और 30 किलोग्राम पोटाश प्रति हैक्टेयर से अधिक नहीं होना चाहिये।

यदि किसान बौना कालानमक 101 अथवा बौना कालानमक 102 की खेती करना चाह रहे हैं तो 120:60:60

जैविक खेती करने की दशा में केवल हरी खाद, गोबर की खाद, कम्पोस्ट आदि जैविक खादों का ही उपयोग कर सकते हैं। यह पाया गया है कि यदि ढैचा की हरी खाद का उपयोग किया जाये तो 80 किलोग्राम नत्रजन स्वमेव मिल जाता है फास्फोरस और पोटाश तत्वों को गोबर की खाद तथा अन्य श्रोतों से दे सकते हैं।

बोने का समय और रोपाई :

प्रमाणित बीज उपचारित होने के बाद ही मिलता है। अतः उसको दोबारा उपचारित करने की आवश्यकता नहीं पड़ती किन्तु यदि घर का बीज का प्रयोग करना है अथवा खेती के लिये नर्सरी उगानी है तो बीज को दो ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलोग्राम बीज के उपचारत करके ही नर्सरी उगायें। इससे बीज जनित बीमारियों से बचाव में सहायता मिलेगी।

कालानमक की तीनो प्रजातियों प्रकाशअवधि की सेवेदी हैं अर्थात् इनमें बाली 20° अक्टूबर के आस-पास ही निकलती हैं जबकि दिन 12 घण्टे से छोटा होता है। अतः नर्सरी की बुआई मई में करने से भी इसकी बाली निकलने का समय 20 अक्टूबर होगा जैसा कि जून की बुआई करने से होगा।

पहले बुआई या रोपाई करने से फसल की देख-भाल व्यर्थ में करनी पड़ती है इसलिये कालानमक का बेहन उगाने का सेर्वोत्तम समय 15 से 30 जून के बीच ही है। जब पौध 20 से 30 दिन की हो जाये तो उसकी रोपाई 20 सेन्टीमीटर दूरी के कतार 15 सेन्टीमीटर दूरी पर करें। एक स्थान पर दो या तीन पौधे ही लगायें ।

फसल सुरक्षा

कालानमक की फसल में तना छेदक कीट का प्रकोप अधिक होता है क्योंकि वे इसेक सुगन्ध से आकर्षित होते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में कल्ले मरते हैं जिसकी जगह नये कल्ले निकलकर क्षतिपूर्ति कर देते हैं। परन्तु बाली निकलते समय सफेद बाली के रूप में तनाछेदक का नुकसान दिखायी पडता है। इसकी क्षतिपूर्ती सम्भव नहीं है।

किसान घबराहट में अनेक कीटनाशी का छिड़काव करते हैं जोकि आर्थिक रूप से ठीक नहीं है । यदि कल्ले निकलते समय तनाछेदक का प्रकोप अधिक गम्भीर है तो कारटोप हाइड्रोक्लोराइड 4-जी के दाने 20 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से बिखरें । जैविक खेती करने की दशा में फसल पर केवल नीम से बनाये हुये उत्पाद का ही प्रयोग करें।

इसके अतिरिक्त ट्राइकोकार्ड का उपयोग रोपाई के एक महीने बाद 15 दिन के अन्तराल पर 3 बार करें। सामान्य खेत में गन्धी कीट जोकि दाने का रस चूसता है, को नियंत्रित करने के लिये बीएचसी अथवा मैलाथीयान के धूल का प्रयोग कर सकते हैं। पर्ण अवस्था झुलसा (थ ब्लाइट) जो एक फफूँद से होने वाली बीमारी है, का प्रकोप कालानमक की बौनी प्रजातियों में देखा गया हैं।

बीमारी की प्रारम्भिक अवस्था में ही हैक्साकोनाजॉल अथवा प्रोपीकोनाजोल का 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें। ट्राईकोडर्मा के घोल का भी छिड़काव जैविक खेती करने वाले किसान कर सकते । इससे बीमारी बढ़ने से रूक जायेगी ।

कटाई और सुखाई

बाली निकलने के बाद सामान्य धान लगभग 30 दिन में कटाई के लिये तैयार हो जाते हैं। किन्तु कालानमक की फसल पकने के समय धूप कम हो जाती है तथा रात को ओस भी पड़ने लगती है। इसके कारण दाने की नमी धीरे-धीरे सूखती है। अतः फसल 40 दिन बाद ही कटाई के लिये तैयार हो पाती है। फसल के पूर्णरूप से सूख जाने पर जब दाने में नमी 18 प्रतिशत हो तो उसकी कटाई करनी चाहिये। फसल पूर्ण रूप से पकने के पहले काटने से कुटाई करते समय हरे हरे चावल नजर आयेंगे जोकि गुणवता में अच्छे नहीं माने जाते।

फसल काटने के तुरन्त बाद मड़ाई करके दाने अलग कर लें और 3 से 4 दिन तक धूप में सुखायें। रात को दानों को खुले में रहने दें अर्थात उसको इक्टठा करके ढेर बना कर ढक दें। जब दानों में नमी 12 प्रतिशत आ जाये तो उसे प्लास्टिक के बोरे अथवा बखारी या टीन से बने भण्डारण पात्र में सुरक्षित रख दें।

कारण दाने की नमी धीरे-धीरे सूखती है । अतः फसल 40 दिन बाद ही कटाई के लिये तैयार हो पाती है। फसल के पूर्णरूप से सूख जाने पर जब दाने में नमी 18 प्रतिशत हो तो उसकी कटाई करनी चाहिये। फसल पूर्ण रूप से पकने के पहले काटने से कुटाई करते समय हरे-हरे चावल नजर आयेंगे जोकि गुणवता में अच्छे नहीं माने जाते ।

फसल काटने के तुरन्त बाद मड़ाई करके दाने अलग कर लें और 3 से 4 दिन तक धूप में सुखायें। रात को दानों को खुले में रहने दें अर्थात उसको इक्टठा करके ढेर बना कर ढक दें। जब दानों में नमी 12 प्रतिशत आ जाये तो उसे प्लास्टिक के बोरे अथवा बखारी या टीन से बने भण्डारण पात्र में सुरक्षित रख दें ।

कुटाई :

कालानमक की कुटाई आवश्यक्तानुसार ही करें अर्थात् धान का भण्डारण करें न की वावल का | इससे उसकी सुगन्ध तथा गुणवत्ता बनी रहती है। पुरानी कहावत है कि धान पुराना और चावल नया ही उत्तम होता है।

कालानमक धान की महक को चावल में सुरक्षित रखने के लिये कुटाई अच्छी मिल में ही करें। आज कल ट्रेक्टर ट्राली के पीछे लगी मिलें

घर-घर घूमती नजर जाती हैं। इसमें ऊपर से धान डालने पर एक ही बार में हानिकारक है दो कारणों से। पहला- वावल निकल आता है। यह अत्यन्त ऐसी मिल वाले 10 प्रतिशत या उससे अधिक वावल को छीलकर उसका पालिश निकाल देते हैं। इस कारण किसान को कम चावल मिलता है। दूसरा कारण है कि सुगन्ध और पोषक तत्व चावल के ऊपरी फतह में होते है। जो इन मिलों द्वारा निकाल लिये जाते गुणवत्ता दोनों ही खराब हो जाती हैं।

अतः चावल की सुगन्ध तथा इसलिये सुझाव दिया जाता है कि चावल की कुटाई अच्छी मिलों में ही करें, जहाँ कि एक बार धान डालने से उसकी भूसी उतरती है और दूसरी बार भूसी उतरा चावल डालने से सफेद चावल निकलता है। भूसी निकलने के बाद चावल को फैलाकर ठण्डा कर लना चाहिये और फिर उसे दोबारा पालिश करने के लिये मिल में डाले ।

मिल से निकलने के बाद चावल निकलने पर बहुत ही गर्म होता है जिसको ठण्डा करके ही प्लास्टिक के बोरी में भरकर सिल दें। कभी भी 5 प्रतिशत से अधिक पालिश न करें । इस प्रकार कालानमक चावल की सुगन्ध और गुणवता बनी रहेगी ।

Conclusion

इस कालानमक धान की आधुनिक खेती करने का तरीका जो आपको बताया गया है वो कृषि बिभाग , उत्तर प्रदेश और Net और वेबसाइट से लिया गया जानकारी जिससे आपको सम्पूर्ण जानकारी प्रदान की जा सके |इसमें आपने जाना की कालानमक धान की आधुनिक खेती की कैसे की जाती है |

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