लोबिया की उन्नतशील खेती कैसे करें 2023

भारत जैसे- देश में जहां हर प्रकार की खेती होती है वही लोबिया की उन्नतशील खेती एक दलहनी सब्जी है । इसकी लम्बी, हरी तथा मुलायम फलियों को सब्जी बनाने के लिये प्रयोग किया जाता है। यह एक पौष्टिक तथा स्वादिष्ट सब्जी है जिससे प्रचुर मात्रा में प्रोटीन व कार्बोहाइड्रेट की प्राप्ति होती है। इसके पौधे वायुमण्डल से नत्रजन लेकर उसे जीवाणुओं की सहायता से भूमि में संचित करते हैं। जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति कायम रहती है।

लोबिया की उन्नतशील खेती किस्मों का चुनाव :

सब्जी के लिये उगाई जाने वाली जातियां दो प्रकार की हैं :- झाड़ीनुमा किस्में

पूसा दोफसली :

यह जाति गर्मी तथा बरसात दोनों मौसमों के लिये उपयुक्त है। इसके पौधे झाड़ीनुमा तथा फलियां लगभग 18 सेमी. लम्बी होती हैं। यह जाति मैदानी तथा पहाड़ी दोनों क्षेत्रों के लिये उपयुक्त है। इसकी औसत उपज 100 कुन्तल प्रति हेक्टेअर है।

सेलेक्शन – 263: यह जाति गर्मी तथा बरसात दोनों मौसमों के लिये उपयुक्त है। इसके पौधे छोटे, फलियां मध्यम हरी, चपटी तथा मुलायम होती हैं । फलियों की लम्बाई 20 सेमी. के लगभग होती हैं। यह एक अगेती किस्म है तथा मोजैक व गोल्डेन मोजैक प्रतिरोधी है। इसकी उपज 80 कुन्तल प्रति हेक्टेअर है।

पूसा कोमल : यह जाति भी खरीफ तथा जायद दोनों ऋतुओं की बुवाई के लिए उपयुक्त है। पौधे काडीनुमा, फलियां हल्के हरे रंग की गोलाई लिए हुए लगभग 20-22 सेमी. लम्बी तथा बीज नीमी सफेद संख्या के होते हैं । यह एक अगेती किस्म है जिसकी फलियां 60 दिन में तोड़ने योग्य तैयार हो जाती हैं।

नरेन्द्र लोबिया 1:

यह भी बौनी जाति है जो खरीफ तथा जायद दोनों ऋतुओं में उगाई जा सकती है। पौधे 40-45 सेमी. ऊँचे, पत्तियां बड़े आकार की तथा फलियां 28-30 सेमी. लम्बी होती हैं। जिसका ऊपरी सिरा बैंगनी रंग का होता है। बुआई के 48-50 दिन बाद फलियां तोड़ने योग्य तैयार हो जाती हैं।

फैलने तथा चढने वाली किस्में :

अर्का गरिमा : यह जाति वर्षा ऋतु के लिये अधिक उपयुक्त है। गर्मी के मौसम में पौधों की बढ़वार, फलियों की संख्या प्रभावित होती है तथा इसकी उपज कम होती है और फलियों में बीज नही बनते। इसके पौधे 2.50 से 3.0 मीटर लम्बे होते हैं। यह जाति विषाणु रोग प्रतिरोधी है। इसकी फलियों की उपज 80-85 कुन्तल प्रति हेक्टेअर है।

लम्बी फलियों वाली किस्में :

यह जातियाँ सामान्यतः उत्तर प्रदेश के पूर्वी भागों में ऊगायी जाती हैं। इनकी खेती गर्मी तथा बरसात दोनों मौसमों में की जा सकती है। बीज के आधार पर लाल और काले बीज वाली किस्में पायी जाती हैं । इसकी फलियाँ हल्के रंग की तथा 50 सेमी. तक लम्बी होती हैं। पौधों की लम्बाई 2-3 मीटर और उपज 100-110 कुन्तल प्रति हेक्टेअर है।

भूमि तथा भूमि की तैयारी :

लोबिया की खेती सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है लेकिन इसकी खेती के लिये बलुई दोमट से लेकर दोमट भूमि अच्छी होती है। एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद 2 जुताई कल्टीवेटर या हैरो से करते है। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाकर भूमि को समतल कर लेना चाहिये।

इससे मिट्टी भुरभुरी हो जाती है और बीज का अंकुरण अच्छा होता है। बुआई के समय भूमि में पर्याप्त नमी का होना भी आवश्यक है । बरसात की फसल के लिये खेत में जल निकास का समुचित प्रबंध होना चाहिये ।

बुआई का समय :

उत्तरी भारत में लोबिया की बुआई दो मौसमों में की जाती है। बसन्त ऋतु में फरवरी से मार्च तथा वर्षा ऋतु में जून से जुलाई तक इसकी बुआई का उत्तम समय है ।

लोबिया की उन्नतशील खेती, lobia ki unnatsheel kheti

बीज की मात्रा :

एक हेक्टेअर खेत के लिये 20-25 किग्रा. झाड़ीनुमा और 10-15 किग्रा. फैलने तथा चढ़ने जातियों के पर्यापत होता है।

जलवायु :

वाली के 48 घण्टे के अंदर समान रूप से मिट्टी के ऊपर छिड़काव करें।

लोबिया ग्रीष्मकालीन फसल है । इसलिये इसे हमारे देश में गमी तथा वर्षा दोनों मौसमों में मैदानी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता इसकी खेती 21° से 35° सेल्सियस तापन पर सफलतापूर्वक की जा सकती है।

बीज की बुआई व पौधों की दूरी

1 लोबिया की बुआई पंक्तियों में की जाती है। इसकी बुआई डिबलिंग विधि से करना अच्छा होता है। झाड़ीदार जातियों के लिये पंक्ति से पंक्ति की दूरी 40-50 सेमी0 तथा पौधों से पौधे के बीच की दूरी 10-15 सेमी. रखनी चाहिये। फैलने तथा चढ़ने वाली जातियों के लिये कतार से कतार की दूरी 90 सेमी, तथा पौधे से पौधे की दूरी 20-25 सेमी, रखी जाती है।

खाद तथा उर्वरक :

लोबिया एक दलहनी फसल है। जिसके कारण इसकी नत्रजन की आवश्यकता कम होती है। इसकी अच्छी फसल के लिये 20-25 टन गोबर की खाद तथा 40 किग्रा. नत्रजन, 50-60 किग्रा फास्फोरस व 50 किग्रा० पोटाश प्रति है. की दर से देना पर्याप्त होता है। फास्फोरस, पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा बीज बोने से पहले या बुआई के समय दें और आधी नाइट्रोजन की मात्रा बुआई के 30-35 दिन बाद टापड्रेसिंग के रूप में दें।

अंतः सस्य क्रियायें :

लोबिया की फसल में बुआई के लगभग एक माह बाद खुर्पी या कुदाल से निराई-गुड़ाई करना पर्याप्त होता है। मजदूरों के अभाव में या सम्भव होने पर रासायनिक खरपतवार नियन्त्रण करना चाहिये। इसके लिये स्टाम्प 3.3 ली. 1000 लीटर पानी में घोल कर एक हेक्टेअर खेत में बुआई

सिंचाई :

लोबिया की बुआई के समय खेत में पर्याप्त मात्रा में नमी होना आवश्यक है। सिंचाई की मात्रा तथा संख्या भूमि व मौसम पर निर्भर करती है। वर्षा ऋतु में सामान्यतः सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन गर्मी की ऋतु में 7-10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करना आवश्यक है।

प्रमुख रोग :

पीला विषाणु रोग : यह विषाणु जनित बीमारी है जिससे लोबिया की फसल को काफी नुकसान होता है। शुरू में नवविकसित पत्तियों पर लक्षण दिखायी पड़ता है जो धीरे-धीरे पूरे पौधे पर फैल जाता है। सफेद मक्खी तथा माहू कीट, बीमारी को फैलाने में मदद करते हैं।

नियन्त्रण :

1.बुआई के लिये बीज, रोग रहित पौधों से प्राप्त करें ।

2.सफेद मक्खी की रोकथाम के लिये मैलाथियान नामक दवा का (1.5 मि.ली. दवा प्रति ली. पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

3.रोगी पौधे उखाड़ कर नष्ट कर है। धब्बे के बीच का माग धूसर रंग का दें या जला दें ।

चूर्णिल आसिता:

इस बीमारी से पत्ती, कलियों तथा अन्य भागों पर छोटे-छोटे सफेद चूर्ण लिये हुये धब्बे बन जाते हैं। ये सफेद धब्बे धीरे-धीरे बढ़कर पूरी पत्ती की सतह को ढक लेते हैं। रोगी पत्तियां पीली पड़कर गिर जाती है।

नियन्त्रण :

सल्फेक्स की 2.5 किग्रा. मात्रा को 700 ली0 पानी में घोलकर प्रति हे. छिड़काव करें या कैलिकजिन 0.1 प्रतिशत या टोपास 0.05 प्रतिशत का छिड़काव करें। कुल 2-3 छिड़काव 10 दिन के अंतर पर करें |

किट्ट (रस्ट) :

तथा किनारे का भाग लाल भूरे या काले रंग की परत बन जाती है। रोग लाल रंग का होता है और गहरे भूरे या ग्रसित भाग सूख कर गिर जाता है। नियंत्रण बचाव के लिये लम्बी अवधि सफाई करें। टापसिन एम की मात्रा का फसल चक्र अपनायें तथा खेतों की 1000 ग्राम को 800 ली० पानी में घोलकर छिडकाव करें। कैक्टाफ या वेयर 0.05 प्रतिशत का घोल सबसे अधिक प्रभावशाली है । पहला छिड़काव बुआई के एक माह बाद करें तथा इसके बाद का छिड़काव 15 दिन के अंतर पर करते रहें ।

इस रोग के लक्षण पत्तियों पर स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। प्रभावित पत्तियों की निचली सतह पर छोदे-छोटे सफेद रंग के उभरे हुये धब्बे बनते हैं। धीरे-धीरे इन धब्बों का रंग पीला पड़ने लगता है और प्रभावित पत्तियां गिर जाती हैं।

नियन्त्रण :

लम्बे समय तक फसल चक्र अपनायें। दो किग्रा० डाइथेन एम-45 को 700 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेअर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए या कैक्टास 0.05 प्रतिशत के घोल का छिड़काव अधिक प्रभावी है। 7-10 दिन के अंतराल पर 3-4 छिड़काव करना पर्याप्त होता है। सर्कोस्पोरा (पर्ण दाग ) इस रोग का लक्षण पुरानी पत्तियों पर कोणीय भूरे रंग के धब्बे के रूप में उत्पन्न होता है ।

कीट तथा उनका नियन्त्रण :

माहू कीट (एफिड) : यह कीट नर्म पक्तियां तथा शाखाओं का रस चूसता है। जिससे पौधों की बढ़वार रुक जाती है ।

नियन्त्रण बचाव के लिये मैलाथियान लीफ माइनर (पत्तियों में सुरंग 50 ई.सी. का 1.5 मि.ली. पानी से घोलकर छिड़काव करें। की पत्तियों में सुरंग बनाकर हानि बनाने वाला कीड़ा) : यह कीड़ा पौधे पहुंचाता है।

नियन्त्रण नुआक्रान 1 लीटर या थायोडान 1.2 ली. को 625 लीटर पानी में घोलकर प्रति है. की दर से छिड़काव करें ।

तुडाई

तुडाई लोबिया की अगेती जातियां डेढ़ से दो माह में तुड़ाई के लिये तैयार हो जाती हैं। अच्छी उपज के लिये हरी व मुलायम अवस्था में ही तुडाई करना आवश्यक है। देर से तुड़ाई करने पर उसमें रेशे हो जाते हैं ओर इससे बाजार में कम कीमत मिलती है। झाड़ीदार जातियों से 3-4 तुड़ाई और चढ़ने वाली जातियों से 5-6 तुड़ाई मिल जाती है।

उपज :

झाड़ीदार जातियों से हरी फलियों की 60-80 कुन्तल प्रति है की उपज तथा चढ़ने वाली जातियों से लगभग 100 कुन्तल प्रति हेक्टेअर उपज मिलती है।

Conclusion

लोबिया की खेती का अनुभव साझा करने के माध्यम से हम अपने ग्रामीण समुदायों को उन्नतशील खेती के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं और आगे की पीढ़ियों के लिए एक बेहतर भविष्य बना सकते हैं। इसलिए, लोबिया की उन्नतशील खेती हमारे कृषि सेक्टर को मजबूत बनाने और किसानों के जीवन को सुखमय बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। इस बिषय की इकट्ठा की गयी जानकारी कुछ किताबो और नेट के जरिये निकाली गयी और आपके सम्पूर्ण जानकारी लायी गयी है |

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