No.1 तरिके से करे मक्का की खेती(Maize Farming): होगी बम्फर पैदावॉर

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मक्का की खेती का परिचय

भारत में मक्का बहु उपयोगी खाद्य फसल में से एक हैं, जिसको मोटे अनाजो के नाम से भी जाना जाता है | और इसे भुट्टे के रूप में भी खाया जाता है।कई मैदानी क्षेत्रो में भी मक्का की खेती(Maize Farming) बड़ी सफलतापूर्वक उगाई जाती है , और इसको पहाड़ी एवं मैदानी क्षेत्रो में भी मक्का की खेती सफलतापूर्वक की जाती है।इसे भारत में पायी जाने वाली सभी प्रकार की मिट्टियों में लगाया जा सकता है| मिटटी जैसे – बलुई, दोमट मिट्टी जो मक्का की खेती के लिये उत्तम मानी जाती है। यह खरीफ की फसल भी कही जाती है |पर फिर भी जहा पानी की सुविधा नहीं होती वहाँ रबी और खरीफ की खेती पहले की जाती है |
मक्का में कार्बोहाइड्रेट की उपयुक्त मात्रा पायी जाती है |यह कार्बोहाइड्रेट का बहुत सही स्रोत है।मक्का की खेती किसान भाइयो एक साथ कई प्रकार से उपयोग करने का मौका देता है | ब्यपार के दृश्टिकोण से यह एक सर्वाधिक मुनाफे वाली खेती है |

मक्के का उपयोग

हम ऐसे कई रूप में प्रयोग कर सकते है जैसे -रोटी के रूप में , मधु मक्का को उबालकर कार्नफ्लेक्स के रूप में ,भुट्टे सेककर चबाने के रूप में , आजकल तो पॉपकॉर्न बहुत प्रचलित है और लइया के रूप में इत्यादि रूप में उपयोग में होता है |
और अब इसका प्रयोग बायोफ्यूल , card oil के रूप में भी किया जाने लगा | मक्के का 60 से 65 % पशुआहार जैसे मुर्गी एवं पशु आहार के रूप उपयोग हो जाता है | मक्के से हमे पोष्टिक आहार प्राप्त होता है | मक्के के भुट्टे निकलने के पश्च्यात का मटेरियल को पशु का चारा के रूप में उपयोग कर लेते है |

औद्योगिक कंपनियों में मक्के का उपयोग

औद्योगिक दृष्टि से मक्के मे प्रोटिनेक्स की मात्रा के होने चलते इसको हम , पेन्ट्स, चॉक्लेट ,स्याही ,लोशन ,कोका-कोला , स्टार्च के लिए कॉर्न सिरप इत्यादि बनाने में उपयोग करते है |हमे इससे मक्के के एक नया रूप जिसे हम बेबीकार्न मक्का बोलते है । बेबीकार्न पौस्टिक होने के कारण सब्जियों से अधिक मूल्य पर बिकता है।

मक्के के खेती के लिए जलवायु एवं भूमि

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मक्का उष्ण(march me makka ki kheti) एवं नम जलवायु की फसलों में से एक है। इसको के लिए ऐसे भूमि का चयन करना जहा जल निकास अच्छा हो |

मक्के की खेती के लीये भूमि की तैयारी

पहली बारिश होने के बाद इसमें हैरो चलकर , उसमे पलटा चलाना चाहिए | यदि जैविक खेती करनी है तो आप गोबर के खाद का प्रयोग करे एवं इसमें अंतिम जुताई के समय भूमि में मिला दे | रबी मक्का की खेती में मौसम सबकुछ होने बाद कल्टीवेटर से 2 बार जुताई करने के बाद 2 बार हैरो से जुताई करना चाहिए।

मक्के के बुवाई का समय

  1. खरीफ मक्का की खेती :- जून – जुलाई तक।
  2. रबी ऋतू में मक्का की खेती :- अक्टूबर – नवम्बर तक।
  3. जायद जायद मक्का की खेती :- फरवरी – मार्च तक।

उन्नत किस्मे

कम्पोजिट जातियां
साधारण समय वाली – चंदन मक्का-1

तीब्र पकने वाली – चंदन मक्का-3

बहुत जल्दी पकने वाली – चंदन सफेद मक्का-2

बीज की मात्रा प्रति हेक्टेयर

संकर जातियां(mongrel) :- 12 से 15 किलोग्राम /हेक्टेयर |

कम्पोजिट जातियां (composite species) :- 15 से 20 किलोग्राम /हेक्टेयर |

हरे चारे के लिए(for green fodder) :- 40 से 45 किलोग्राम /हेक्टेयर |

विशेष बिंदु : छोटे या बड़े दानो के आधार पे भी बीज की मात्रा काम या जयदा हो सकती है |

मक्का की खेती का बीजोपचार

मक्का का बीज बोने से पहले भूमि में किसी फंफूदनाशक दवा का छिड़काव करना जरुरी है जिससे मक्के की सेहत के लिए फायदेमंद रहेगा | फफूंद नमक दवाये जैसे- थायरम या एग्रोसेन G.N. 2.5-3 ग्राम./किलो. के बीज का दर से छिड़काव करके ही बोना चाहिए । उसके पश्चात् एजोस्पाइरिलम या P.S.B.Culture 5-से 10 ग्राम प्रति किलो बीज का उपचार करके प्रयोग करे ।

मक्का की खेती का पौध अंतरण

शीघ्र पकने वाली:- कतार से कतार-60 CM. पौधे से पौधे-20CM


देरी से पकने वाली :- कतार से कतार-75 CM पौधे से पौधे-25 CM


पशु के लिए हरा चारा :- कतार से कतार:- 40 CM. पौधे से पौधे-CM

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ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती में बुवाई

ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती में बुवाई में वर्षा के पहले ही मक्का को बोना चाहिए।अगर सिंचाई का साधन जैसे आस पास समरसिम्ब्ल या सरकारी समरसिम्ब्ले आदि | तब आपको 8 से 10 दिन पहले ही बुवाई करनी चाहिये, जिससे आपकी मक्के की पैदावार मे वृध्दि हो जाती है।मक्के की बीज की Buwai मेंड़ के किनारे व उपर 3-5 CM. की गहरान में करनी है। बुवाई के एक महीने बाद मिट्टी चढ़ाई का कार्य होना चाहिए। और चाहे जो बिधि बुवाई की गयी हो पर उसमे पौधों की संख्या 55-80 हजार /HECTARE रखनी चाहिए।

मक्का में कौन सा खाद व उर्वरक की मात्रा डालना चाहिए

जल्दी पकने वाली :- 80 : 50 : 30 (ऐन :पी :के )


बराबर (मध्य) पकने वाली :- 120 : 60 : 40 (ऐन :पी :के )


बहुत देर(Late) से पकने वाली :- 120 : 75 : 50 (ऐन :पी :के )


जमीं की तयारी करते समय 8 से 10 टन लगभग सड़ी हुयी गोबर की खाद (organic kheti ) भूमि में डाल देना चाहिए | और जहा जस्ते की कमी हो उस जगहे पर 25 किलोग्राम/हेक्टेयर जिंक सल्फेट वर्षा के पहले डालना चाहिए।

मक्के की निराई-गुड़ाई

बुवाई के 15-से 20 दिन पश्च्यात डोरा चलाकर निराई -गुड़ाई(Weeding hoeing) करना उचित रहेगा | और भी रसायनिक निंदानाशक मे एट्राजीन(etrajeen) नामक निंदानाशक का इस्तेमाल करना चाहिए। एट्राजीन का प्रयोग अंकुरण हेतु पूर्व 600-800 ग्राम./एकड़ की दर से स्प्रे करें। इसके कुछ दिन बाद में मट्टी की चढ़ाई वाला कार्य करले |

मक्का की खेती के साथ कुछ अन्तरवर्ती फसलें

मक्का की खेती के साथ कुछ अन्य फैसले भी उगाई जा सकती है , जैसे – उड़द, बरबटी, ग्वार, मूंग आदि दाल के प्रकार है , सोयाबीन, तिल तेल की प्रकार , सेम, भिण्डी, हरा धनिया सब्जी के प्रकार , बरबटी, ग्वार चारा ये चारा के प्रकार है आदि अन्तर्वर्ती फैसले है |

मक्का की खेती में सिचाई

मक्का की खेती में सिचाई बहुत कम जरुरत पड़ती है इसमें फसल के समय लगभग 400-600 MM सिचाई की जरुरत होती है तथा इसकी सिंचाई की सबसे जरुरी समय पुष्पन और दाने भरने के बाद । इसके अतिरिक्त खेत को इसतरह मेन्टेन रखना चाहिए की इसमें पानी रुकने न पाए |

पौध संरक्षण करने की प्रक्रिया

(क) कीट प्रबन्धन(pest management) :

1.धब्बेदार तनाबेधक कीट(spotted stem borer) :- यह एक प्रकार के कीट है जो मक्का का धब्बेदार बढ़ने में प्रबल होता है |यह इतनी प्रबल कीट होती है जो सिर्फ इल्ली पौधे की जड़ को छोड़कर पूरी पौधे को प्रभावित करती है।इससे पौधे और पत्ते दोनो सूखने लगते है |

2.गुलाबी तनाबेधक कीट(pink stem borer):- इसप्रकार के कीट के मध्य भाग को नुकसान करती है |

मक्का की खेती में कीट प्रबंधन हेतु निम्नलिखित उपाय है :-

  • फसल की कतई के बाद भूमि को गहराई से जुताई करना चाहिए क्योकि इससे प्यूपा अवस्था नष्ट हो सके।
  • मक्का की कीट संरक्षण प्रजाति का इस्तेमाल करना चाहिए।
  • मक्की की खेती पहली बारिश के बाद करना चाहिए ।
  • इसमें एक ही कीटनाशक का प्रयोग हर बार नहीं करना चाहिए |
  • प्रकाश प्रपंच का प्रयोग साम के 6.30 बजे से रात में 10.30 बजे तक का टाइम उपयुक्त है |

(ख) मक्का की खेती में प्रमुख रोग

  1. डाउनी मिल्डयू(downy mildew) :- बोने के 2-3 सप्ताह बाद यह रोग लगने लगता है | सर्वप्रथम पत्तियों का ह्रास होने के कारन पत्तियों पर धारियां पड़ने लगती है, प्रभावित हिस्से पौधे की बढ़वार रुकने लगती है |

उपचार :- डायथेन M-45 दवा जरुरी WATER में मिलाकर 3-4 स्प्रे करना चाहिए।

  1. पत्तियों का झुलसा रोग (blight):- पत्तियों पर नाव के आकार जैसा भूरे धब्बे बन जाते हैं। रोग पत्तियों पर फैलने लगता है | रोग ग्रसित पत्तिया सुंख्ने लगती है |

उपचार :- रोग के लक्षण दिखते ही Zineb का 0.12% के मिलाकर का स्प्रे करना चाहिए।

  1. तना सड़न (stem rot):- पौधों की निचली गांठ से रोग की सुरुवात होती है और गलने जैसा गलता है और तीब्र गंध एवं पौधे कमजोर पद जाते है |

उपचार :- 150 ग्राम keptan को 100 लीटर जल मे मिलाकर जड़ों पर डालना चाहिये।

उपज

  1. जल्दी पकने वाली :- 50-60 कुन्टल/हे.

2.साधारण समय पकने वाली :- 60-65 कुन्टल/हे.

  1. बहुत देर पकने वाली :- 65-70 कुन्टल/हे.

मक्का की खेती की कटाई

फसल बोने के 65-से 70 दिन बाद, दाने वाली देशी(native) किस्म बोने के 80-से 85 दिन बाद, व संकर एवं संकुल किस्म बोने के 100-से 110 दिनों के बाद और इसके डेन में लगभग 25 प्रतिशत् नमी हाने पर कटाई कर लेनी चाहिए।

मक्के का भण्डारण

कटाई बाद प्राप्त दानों य फसल को धूप(SUNRISE) में अच्छी तरह सुखाकर भंडारण करना चाहिए। अगर दानों का उपयोग बीज के लिये रखना हो तो इनमे हलकी नमी लगभग 12 %बनी रहे |

मक्का की खेती PDF

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मक्का की खेती Related Some Question and Answers

मक्का बोने का सही समय क्या है?

जून से जुलाई के बीच में

मक्का की फसल कितने महीने की होती है?

3 महीने की फसल होती है |

1 एकड़ में मक्का कितना होता है?

1 एकड़ में मक्का लगभग 24 से 25 कुंतल होता है |

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