No 1 मटर की खेती कैसे करें ? मटर से लाभ ही लाभ कमाया किसान भाइयो ने

भूमि मटर की उपयोगिता के प्रति दोमट और हल्की दोमट भूमि का विवाद है। यह एक दिलचस्प विवाद है क्योंकि दोनों प्रकार की भूमि मटर की खेती उपयोगिता के अलग-अलग आधार हैं। दोमट भूमि मटर की पैदावार में अधिक है क्योंकि यह भूमि अधिक उर्वरक समृद्ध होती है, जबकि हल्की दोमट भूमि की मटर पैदावार कम होती है क्योंकि यह भूमि उर्वरक संदर्भ में कम समृद्ध होती है।

मटर की संस्तुत प्रजातियाँ

भूमि मटर की तैयारी में पहली जुताई मिट्टी को पलटने वाले हल का अच्छा संस्तुत उपयोग होता है। विभिन्न प्रजातियों में संस्तुत प्रजातियाँ हैं जिनका विवरण निम्नलिखित है:

1. मालवीय मटर – 1999 में उत्तर प्रदेश में अवधि 22-25 दिन है, उपयुक्त क्षेत्र 120-125 वर्ग दिन है।

2. पूसा प्रभात – 2000 में पूर्वी उत्तर प्रदेश में बुकनी रोग के अवरोधक के रूप में अवधि 15-18 दिन है, उपयुक्त क्षेत्र 100-105 वर्ग दिन है।

3. आदर्श – 2000 में बुंदेलखंड के लिए उत्तम बुकनी अवरोधक के रूप में अवधि 23-25 दिन है, उपयुक्त क्षेत्र 110-115 वर्ग दिन है।

4. जय – 2001 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए अवधि 32-35 दिन है, उपयुक्त क्षेत्र 125-130 वर्ग दिन है।

5. विकास – 2005 में तदैव क्षेत्र के लिए बौनी और सफेद बुकनी के रोग अवरोधक के रूप में अवधि 22-25 दिन है, उपयुक्त क्षेत्र 100-105 वर्ग दिन है।

6. प्रकाश – 2006 में बुंदेलखंड के लिए अवधि 28-32 दिन है, उपयुक्त क्षेत्र 110-115 वर्ग दिन है।

7. हरियाल – 2007 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए हरे गोल दाने और सफेद बुकनी के रोग अवरोधक के रूप में अवधि 26-30 दिन है, उपयुक्त क्षेत्र 120-125 वर्ग दिन है।

8. पन्त पी-42 – 2008 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए अवधि 24-25 दिन है, उपयुक्त क्षेत्र 106-109 वर्ग दिन है।

9. अमन – 2009 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए लम्बे कद और सफेद बुकनी के रोग अवरोधक के रूप में अवधि 22 दिन है, उपयुक्त क्षेत्र 120-130 वर्ग दिन है।

10.आई.पी.एफ.-4-9 – 2010 में उत्तर प्रदेश के लिए अवधि 15-18 दिन है, उपयुक्त क्षेत्र 125-130 वर्ग दिन है।

इसी तरह संस्तुत प्रजातियों के बारे में जानकारी दी गई है, जो मटर की उपयोगिता के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में उपयुक्त होती हैं|

मटर की खेती के लिए उपयुक्त भूमि:

  1. बीज का चयन: सही बीज का चयन करना प्रमुख चरण है। उचित बीज के चयन से पौधों की अच्छी उत्पत्ति होती है जो उचित प्रमाण में फलने में सहायक होती है।
  2. खेत की तैयारी: मटर की खेती के लिए उपयुक्त भूमि की तैयारी करें। भूमि को अच्छे से प्लोट करें और उर्वरकों का उपयोग करके उपयुक्त मिट्टी साजगार करें।
  3. बोने का समय: मटर की बुआई का सही समय चुनना महत्वपूर्ण है। सामान्यत: खरीफ मौसम में जून-जुलाई महीनों में बोने की प्रक्रिया की जाती है।
  4. सिंचाई: पौधों की सही सिंचाई करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। समय-समय पर सिंचाई करके पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करें।
  5. उर्वरक और कीट प्रबंधन: पौधों को उर्वरक प्रदान करके उनकी उत्पत्ति को बढ़ावा दें। कीटाणु और कीटों से बचाव के लिए उचित कीटनाशकों का उपयोग करें।

खरपतवार का नियंत्रण

खरपतवार का नियंत्रण समय पर करने के लिए, बोने का समय सही चुनें, क्योंकि बहुत जल्दी बोई गई फसल में तने की मक्खी और देर से बोई गई फसल में फली बेधक कीट के प्रकोप की संभावना बढ़ जाती है। यदि कीट प्रकोप आर्थिक क्षति स्तर को पार कर गया हो, तो निम्नलिखित कीटनाशकों में से किसी एक कीटनाशक का प्रयोग करें:

तने की मक्खी और पत्ती सुरंगक कीट को नियंत्रित करने के लिए, बुवाई से पहले कार्बोफ्यूरान 3 सी.जी. 15 किग्रा प्रति हेक्टेयर मिट्टी में मिलाना चाहिए। खड़ी फसल में कीट नियंत्रण के लिए, डाईमेथोएट 30 प्रतिशत इसी सी की 1.0 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से लगभग 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

एजाडिरेक्टिन (नीम का तेल) 0.15 प्रतिशत इसी सी की 2.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से भी प्रयोग किया जा सकता है। फली बेधक कीट और अर्द्धकुण्डलीकार कीट को नियंत्रित करने के लिए, निम्नलिखित जैविक / रसायनिक कीटनाशकों में से किसी एक कीटनाशक का बुरकाव अथवा 500-600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें: 1- 2- 3- बैसिलस थुरिनजिएन्सिस (बी.टी.) की कर्स्टकी प्रजाति 1.0 किग्रा ।

एजाडिरेक्टिन 0.03 प्रतिशत डब्ल्यू. एस. पी. 25-3.00 किलोग्राम। एन.पी.वी. (एच) 2 प्रतिशत ए. एस. । खेत की निगरानी करते रहें और आवश्यकतानुसार ही दूसरा बुरकाव / छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर करें। एक कीटनाशक को दूसरे बार नहीं दोहरायें।

(ख) प्रमुख रोग:

1.             अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग: यह रोग पत्तियों पर छल्ले के समान गोल धब्बों के रूप में प्रकट होता है। जब अनुकूल परिस्थितियों में यह धब्बे आपस में मिलते हैं, तो पूरी पत्ती झुलस जाती है।

2.             बुकनी रोग: इस रोग में पत्तियों, तनों और फलियों पर सफेद चूर्ण दिखाई देते हैं, जिससे वृद्धि बंद हो जाती है।

3.             रतुआ रोग: इस रोग में बाद में पत्तियाँ सूख कर गिर जाती हैं।

4.             मृदु रोमिल (आसिता) रोग: इस रोग में पुरानी पत्तियों की ऊपरी सतह पर छोटे-छोटे धब्बे दिखते हैं, जिनके नीचे सफेद रोयेदार फफूदी उग आती है। धीरे-धीरे पूरी पत्ती पीली होकर सूख जाती है। फलों की ऊपरी तथा निचली सतह पर भी धब्बे बनते हैं और फलों के अंदर रुई की तरह फफूदी उग आती है।

नियंत्रण के उपाय:

शस्य क्रियाएँ:

1.             कुशल बीज चुनाव करें और अनुकूल समय पर बुआई करें।

2.             उपायुक्त खादों का प्रयोग करें, जैसे कि गोबर की खाद और सिंगल सुपर फॉस्फेट।

3.             फसल की देखभाल के दौरान पौधों की संख्या का सुनिश्चित रूप से व्यवस्थित करें।

4.             फसल के साथ-साथ फसल रोमिल और समृद्धि के लक्षणों की निगरानी करें और उचित उपचार करें।

बीज उपचार: बीज जनित रोगों के नियंत्रण के लिए थीरम 75 प्रतिशत + कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत की दर पर शोधित बीज का प्रयोग करें।

भूमि उपचार: भूमि जनित और बीज जनित रोगों के नियंत्रण के लिए बॉयोपेस्टीसाइड (जैविक कवकनाशी) ट्राइकोडर्मा विरिडी 1 प्रतिशत या ट्राइकोडर्मा हारजिएनम 2 प्रतिशत की दर पर घोलकर छिड़काव करें।

पर्णीय उपचार:

1.             अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा और तुलासिता रोग के लिए मैंकोजेब या जिनेब का प्रयोग करें।

2.             बुकनी रोग के लिए घुलनशील गंधक या ट्राइडेमेफान का उपयोग करें।

कटाई और भंडारण: पूरी पकने पर फसल काटें और साफ-सुथरे खलियान में भंडारण करें। कटाई के बाद फसल की आखिरी जुताई पर भूमि में बियार मिला दें।

मटर की उन्नत खेती के लाभ:

  1. आर्थिक लाभ: मटर की खेती से किसान आर्थिक रूप से लाभान्वित हो सकते हैं। मटर की मांग के कारण उत्पाद की मूल्य में वृद्धि होती है जो किसानों को फायदा पहुँचाती है।
  2. पोषण संसाधन: मटर आहार में पोषण संसाधन प्रदान करते हैं, जो आरोग्यपूर्ण जीवन जीने में मदद करता है।
  3. जल संरक्षण: मटर की खेती के लिए सिंचाई की जरूरत होती है, लेकिन उचित व्यवस्थित सिंचाई तकनीकों का उपयोग करके जल संरक्षण की दिशा में कदम उठाया जा सकता है।

मटर को इंग्लिश में क्या कहते हैं?

मटर को इंग्लिश में Pea कहते है

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प्रभावी विन्यास:

1.             आपके क्षेत्र के अनुसार प्रजाति का चयन करें।

2.             सही समय पर बुआई करें।

3.             फॉस्फोरस और गंधक के लिए सिंगल सुपर फॉस्फेट का प्रयोग करें।

4.             फसल की देखभाल के दौरान सुरक्षित जैविक और रासायनिक उपचार का प्रयोग करें।

5.             फसल की पूरी फसल प्रक्रिया को सवारते रहें और सही दिशा में प्रगति करें।

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