मौन पालन एक लाभदायक व्यवसाय (2023)

मधुमक्खियों की आदतो तथा क्रमानुसार उनकी आवश्यकताओं को भली-भाँति समझकर उन्हीं के अनुरूप सुविधा उपलब्ध कराकर और कम से कम कष्ट पहुँचाकर अधिक से अधिक लाभ अर्जित करने के व्यवसाय को मौनपालन कहते हैं।

maun palan ek labhdayak vyavsay | मौन पालन एक लाभदायक व्यवसाय

मौन पालन का इतिहास :

मौनों को पालने की प्रथा बहुत प्राचीन है। साथ ही पुराने समय में मौनों के पालने की विधि समस्त संसार में लगभग एक समान ही थी। मौनों को लकड़ी के बक्सों, पेड़ के खोखले तनों, दीवारों में, मिट्टी के घड़ों या गेहुँ सीकों से बने घरों में सर्वत्र पाला जाता था। उनसे मधु प्राप्त करने की विधि भी सभी जगह लगभग एक जैसी ही थी अधिकांशतः छत्तो में धुंआ देकर मौनों को भगा दिया जाता था और उत्तों को काट लेने के बाद हाथ से निचोड़ कर या धूप में पिघला कर ही मधु को प्राप्त करने की विधि प्रचलित थी।

मौन पालन में आधुनिक युग उस समय से माना जाता है जबसे मौनों को रखने के लिए फ्रेमयुक्त मौनगृह प्रयोग में लाये गये और शहद निकालने के लिए मधु निष्कासन यन्त्र का अविष्कार हुआ।

भारतवर्ष में मधुमक्खी की जातियाँ:

झिल्लीदार पंखो वाले गुंजनपंखी कीट समुदाय में लगभग 16 परिवार हैं। इनमें से एपिडी परिवार के सदस्यों को जो मोम का निर्माण करके अपने भविष्य के उपयोग के लिए रखती है, मुख्यतयः मधुमक्खी कहा जाता है शहद जमा करने का कार्य प्रधानतयः भौरा डम्म एवं मधुमक्खी ही करती ।

जीव विज्ञान के अनुसार मधुमक्खियों की चार प्रजातियां पायी जाती हैं-

1. भँवर या सारंग :

यह भारत वर्ष की सबसे बड़ी मधुमक्खी है। इसे पहाड़ी महाल या दानव मधुमक्खी भी कहते हैं। यह खुले स्थानों में जैसे पेड़ की ऊँची डालों पर, ऊँचे मकान की दीवारों पर तथा कम ऊँचाई वाले लगभग 400 फीट की ऊँचाई पर्वतीय भाग समुद्र तल से छत्ते बनाती हैं। यह मधुमक्खी तापक्रम में परिवर्तन एवं मधुस्राव सीजन के अनुसार काफी दूरी तक एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरित होती रहती हैं। यह इकहरे छत्ते बनाती हैं जो एक से डेढ़ मीटर तक लम्बे और एक मीटर तक नीचे लटके हुए होते हैं। यह मधुमक्खी बहुत खतरनाक होती है। यहाँतक कि यह पानी के भीतर तक अपने दुश्मन का पीछा नहीं छोड़ती हैं।

कमेरी कठिन परिश्रमी होती हैं तथा इसके द्वारा 25 किग्रा. से लेकर 40 किग्रा. तक शहद का उत्पादन हो जाता है। इस मधुमक्खी से सम्पूर्ण उत्पादित मधु एवं मोम लगभग 75 प्रतिशत प्राप्त होता है।

2.छोटी मधुमक्खी या पतिंगा :

यह मधुमक्खी छोटी-छोटी झाड़ियों व पेड़ की नीची डालियों पर अपना इकहरा छत्ता बनाती हैं। नर काले एवं कमेरी की अपेक्षा बड़े होते हैं। इसके छत्ते की लम्बाई 30 / 15 सेमी. पायी जाती है। यह एक वर्ग इंच में लगभग 100 कोष्ठ बनाती हैं। मधु उत्पादन की दृष्टि से यह बहुत उपयोगी नहीं होती क्योंकि यह बहुत कम मात्रा में मधु एकत्र करती हैं परन्तु पर पराणाग में इस मधुमक्खी का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहता है।

3.भारतीय मौन :

यह पेड़ों व दीवालों के खोखलों में पहाड़ों पर चट्टान की दरारों में छत्ते समानान्तर 6 से 7 की संख्या में बनाती है। यह एक स्थान पर कई वर्षों तक रहते हैं। इस गुण के कारण इस मधुमक्खी को आधुनिक मौनगृहों में पाला जाना सम्भव हो सका है। यह मधुमक्खी सारंग एवं इटेलियन मौन से छोटी तथा पोतिंगा से बड़ी होती है। एक मौनवंश से औसतन 5 किग्रा. से लेकर 15 किग्रा. तक मधु का उत्पादन होता है।

पश्चिमी मौन :

यह मधुमक्खी मूलतः यूरोप की है। यह भारतीय मौन की अपेक्षा आकार में बड़ी परन्तु सारंग से छोटी होती है। यह भी 9-10 समानान्तर छ बनाती है। इसलिये इसमें मधु एवं पराग एकत्रित करने तथा अण्डे देने की क्षमता तदनुसार अधिक होती है। इसकी आदत भारतीय मौन से काफी मिलती-जुलती है। इसलिये घरछूट एवं बकछूट की घटनायें बहुत ही कम होती हैं। इसमें भीषण से भीषण परिस्थितियों में भी घर छोड़ने की आदत नहीं है।

मधुमक्खी वंश का संगठन:

मधुमक्खी वंश को अत्यधिक संगठित सामाजिक समुदाय की श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि यह अपनी क्षमता के कारण निरन्तर सफल रहती हैं। एक मौनवंश में एक रानी 20 से 30 हजार की संख्या में कमेरी मौन और कई सौ नर होते हैं।

1. रानी मौन

सामान्यतः एक मौनवंश में एक रानी मौन होती है। इसका प्रमुख कार्य अण्डे देना होता है। मौनवंश से यह सबसे बड़ी होती है और इसका उदर चमकीला तथा सुनहरे रेशों से ढका रहता है। मौनवंश में यही एक मधुमक्खी होती है जो गर्मित एवं अनगर्भित अण्डे देने वाली होती है। जिनसे रानी कमेरी एवं नर की उत्पत्ति होती है। इसके पंख उदर की लम्बाई से छोटे होते हैं। रानी मौन के डंक कमेरी मौन की अपेक्षा कम टेढ़े और छोटे तीर वाले होते हैं। रानी मक्खी अपने डंक का प्रयोग केवल नई आने वाली रानी को मारने लिए करती है। इसका कोई अन्य उपयोग

नहीं है। रानी का जीवनकाल सामान्यतयाः 1 से 2 वर्ष का होता है।

2. नर मौन :

नर मौन के कोष कमेरी मौन की अपेक्षा बड़े होते हैं। इनसे स्वयं की रक्षा हेतु डंक नहीं पाये जाते हैं, इसका कार्य रानी मौन का गर्भाधान करना है। इसके अतिरिक्त यह मौनगृह के अन्दर के तापक्रम को अनुकूल बनाये रखने में सहयोग देते हैं। नर मौन के पास पराग टोकरी, मोम एकत्रित करने की ग्रन्थियाँ नहीं होती हैं। गर्भाधान क्रिया सम्पन्न करने के पश्चात नर मौन का जीवनकाल समाप्त हो जाता है।

मधुसाव सीजन में नर मौन हजारों की संख्या में पाये जाते हैं लेकिन कुछ ही नर व्यावहारिक होते हैं। नर मौन का बहुलता, भोजन की उपलब्धता पर निर्भर करता है। पैदा होने के 12 दिन बाद नर मौन के शुक्राणु परिपक्व हो जाते हैं।

3.कमेरी मौन

मौनवंश में कमेरी मौन की संख्या अधिक होती है। कमेरी मौने प्रजनन के लिए अयोग्य होती हैं पर वे अन्य मातृत्व उत्तरदायित्व पूरी निष्ठा के साथ निभाती हैं। वे कमेरी कोषों में पाली जाती हैं। इनका जीवन काल 3 या 4 सप्ताह से लेकर 6 महीने तक हो सकता है। कमेरी के मुखांग मकरन्द को चूसने के लिए उपयुक्त रचना में रूपान्तरित होते हैं। इनके शरीर का आकार रानी मक्खी की अपेक्षाकृत छोटा होता है, इनके उदर पर पीली या काली धारी पायी जाती है।

यह नोकदार, काठेदार डंक से जुडी रहती है, पंख की लम्बाई उदर के बराबर होती है और इसके पिछले पैर में पराग टोकरी पायी जाती है। उदर में नीचे के अन्तिम चार खण्डों की प्लेट पर 4 जोड़ी मौन ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं, आहार नली का एक भाग मधु संग्रह थैली में परिवर्तित होता है।

यह जीवन के तीसरे दिन से मोम से निर्मित कार्यों की सफाई, चौथे दिन से घर के अन्दर का कार्य, पांचवें दिन से रायलजेली पदार्थ को रानी एवं शिशुओं को खिलाने, 12 से 18 दिन में छत्तों का निर्माण, द्वार रक्षा, मकरन्द का परीक्षण एवं तापमान को अनुकूल बनाये रखने का कार्य करती हैं। क्षेत्रीय मौन, मकरन्द एवं पराग को मोनगृह के अन्दर लाने का कार्य आरम्भ कर देती हैं।

मौनप्रबन्ध

मौनपालन में मौनपालक को दैनिक एवं मौसमी बहुत सी समस्यायें होती हैं। मौने अपने अंतिम उददेश्य की पूर्ति के लिए जहाँतक सम्भव होता है, सैनिक की तरह कार्य करती हैं।

विभिन्न मौसमों में मौनपालकों को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मौनों को मौनगृह में बराबर बने रहने के लिए तथा पर्याप्त लाभ लेने के लिये मौन प्रबन्ध को समझना बहुत ही आवश्यक ।

मौनवंश का सामयिक निरीक्षण :

वंशवृद्धि तेजी से हो रही हो तो मौनों का निरीक्षण सप्ताह में एक बार अवश्य कर लेना चाहिए परन्तु जब मधुस्राव न चल रहा हो तो महीने में कम मधुमक्खियाँ अधिक हस्तक्षेप पसन्द नहीं करतीं। इसलिए जहाँतक सम्भव हो उनको कम से कम छेडना चाहिए।

मघुस्राव सीजन में से कम दो बार निरीक्षण कर लेना चाहिए ।

मौनें जब मकरन्द एवं पराग एकत्रित करने में व्यस्त हों, मौनवंश का निरीक्षण किया जा सकता है, गर्मी के मौसम में प्रातः या सांयकाल तथा सदी के मौसम में दिन के मध्य में निरीक्षण करना चाहिए। तेज हवा, वर्षा, रात में तथा जब मौने अन्दर बाहर आती जाती न हों तो मौनगृह नहीं खोलना चाहिए। सर्दी के मौसम में शिशु फ्रेम को अधिक समय तक खुला नहीं रहने देना चाहिए।

जब कभी मौनों में लूट-लड़ाई या मौनालय में किसी अन्य प्रकार की परेशानी हो तो मौनगृहों के प्रवेशद्वार पर रानी रोकद्वार लगा देना चाहिए। मौनवंशों का निरीक्षण करने से पूर्व मुंह रक्षकजाली और दस्तानों को लगाना हितकर होता है। मौनगृह के बगल में फ्रेम स्टेण्ड एवं धुंवाकार भी रखना चाहिए। प्रदेश द्वार एवं अन्तरपट के छिद्र से हल्की सी धूनी से धुंवा कर देना चाहिए। एक-एक करके फ्रेमों को बाहर निकालिए और उनको लम्बाई में टांग दें।

निरीक्षणोपरान्त उन छत्तों को जहाँ से निकाला गया था वहाँ पर रख देना चाहिए। मौनों की देखभाल करते समय रानी पर नजर रखें ताकि वह कहीं दब न जाय। डंक लगने से बचाव करना अति आवश्यक है। डंक लग जाने पर खुजलाहट एवं दर्द होता है जहर की गन्ध अधिक मौनो को डंक मारने हेतु आमंत्रित करती है जिससे निरीक्षण करने में कठिनाई उत्पन्न होती है।

डंक लग जाने पर किसी तेज धार बाले चाकू से दिखायी पड़ने वाले डंक को निकाल देना चाहिए। उंगलियों से दबाव डाल कर डंक को नहीं निकालना चाहिए। निरीक्षण करने के तुरन्त पश्चात मौनगृह को बन्द बार देना चाहिए। ऊपरी ढक्कन एवं अन्य भागों को बन्द करते समय मौनों को दबने से बचाना बहुत जरूरी है। नोटबुक में प्रत्येक मौनवंश का ब्योरा रखिए।

यह विवरण मौनों की आवश्यकताओं के अनुसार समयानुसार समाग्री प्रदान करने में सहायक होता है। मौनों के कार्यों को सफलत्तापूर्वक चलने हेतु मौनवंश के निरीक्षण का उददेश्य, समयानुसार आवश्यकताओं की पूर्ति करना होता है जिससे कि उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है।

मौनवंश का निरीक्षण करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है :-

मौनवंश के पर्याप्त मात्रा में भोजन है या कृत्रिम भोजन देने की आवश्यकता है। रानी या अण्डे मोजूद हैं? ताजे क्रमबद्ध अकेले अण्डे रानी की मौजूदगी का द्योतक हैं, यदि अण्डे मौजूद नहीं हैं तो रानी का पता लगाने की आवश्यकता पड़ती है। अगर रानी नहीं है तो मौनवंश को नई रानी उपलब्ध कराना आवश्यक होता है।

यदि कोई रानी कोष दिखायी दे, तो रानी को नष्ट कर देना चाहिए। बकछूट काल में रानी कोष का निर्माण यह इंगित करता है कि मौनवंश बकछूट करने की तैयारी कर रहा है। यदि मौनवंशों को बकछूट के लिए उत्प्रेरित करता है तो रानी कोष को रानी निकालने तक पडे रहने देना चाहिए। जब मधुस्राव काल नहीं होता है और रानी कोष बनते हैं तो इससे पता चलता है कि या तो रानी गायब हो गयी है। या मौन वृद्धोंद्वार (गर्भधारण) करना चाहती है।

4. रानी को अण्डे देने या मधु के एकत्रीकरण हेतु पर्याप्त संख्या में छत्तों को देना चाहिए।

5.मौनों के शत्रुओं एवं बीमारियों के प्रति सावधानियाँ एवं उपचार तुरन्त करना चाहिए।

मौनवंशों का विभाजन :

मौनों में घरछुट की प्रवृत्ति बहुत कम होती है। इसलिए घरछुट काल में मौनवंशों को पकड़कर इनकी संख्या में वृद्धि की जा सकती है। दूसरे तरीके से मौनवंशों की संख्या में वृद्धि करके शक्तिशाली मौनवंशों को शरद ऋतु में दोपहर बाद 2 से 3 बजे एवं बसन्त ऋतु में 4 से 5 बजे नये मौनगृह में 3 से 4 फ्रेम के मौनवंश रखकर या तो 3 से 4 किमी. की दूरी से अधिक क्षेत्र में रखकर या पुराने मौनगृह के मूल स्थान से कुछ दूरी पर अगल-बगल से हटाकर नये-नये मौनगृह में मौनवंशों को रखकर विभाजन की प्रक्रिया पूरी की जाती है।

रानी विहीन मौनवंश को 13-14 दिन के हो जाने पर एक-एक स्वस्थ एवं परिपक्व क्वीन सेल रानी विहीन मौनवंश को देकर कम समय में अधिक से अधिक मौनवंशोंका विभाजन किया जा सकता है।

मौनवंश में रानी का प्रवेश :

जब मौनवंश में रानी नहीं होती है या पुरानी रानी को मौनों ने मार दिया होता है तो मौनवंशों में नई रानी देने की आवश्यकता पड़ती है। नवंश में रानी देने के लिए पहले उसको रानी विहीन बनाया जाता है। उसके बाद ही नई रानी का प्रवेश कराना ठीक होता है। यदि मौनवंश काफी समय से रानी विहीन रहा है तो कमेरी मातायें अण्डा देना शुरू कर देती है। ऐसी स्थिति में वह नई रानी को स्वीकार नहीं करती है। अन्त इस तरह के मीन को दूसरे मीनश है मिला दिया जाता है |

पानी को प्रवेश कराने से पूर्व बने रानी कोषों को नष्ट कर दिया जाता है। रानी मौन को रानी पिंजड़ा में कुछ कमेरी मौन के साथ बन्द कर दिया जाता है। रानी पिंजड़े के द्वार पर चीनी के पाउडर एवं कुछ मधु मिलाकर पिंजडे को बन्द करके दो फ्रेमों के बीच लटका देते हैं।

कुछ दिनों में मौने इसी को खाना शुरू कर देती है और धीरे-धीरे रानी को बाहर निकाल लाती है। कुछ समय में मौनवंश की गन्ध रानी मीन प्त कर लेती है। अब कार्क प्लग को हटाकर रानी को खोल दिया जाता है।

यदि रानी को मौनें स्वीकार नहीं करती हैं तथा शत्रुतापूर्वक व्यवहार हदती हैं तो रानी को पिंजड़े में पुनः बन्द करके पहले की तरह दो प्रोमों के बीच में लटका दिया जाता है तथा 24 घण्टे के बाद दुबारा रानी मौन बाहर किया जाता है।

मौनवंशों का स्थानान्तरण:

यदि मौनवंशों को 100 मीटर के अन्दर ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर खिसकाना होता है और जमीन समतल होती है तो मौनवंशों को धीरे-धीरे 3 या 4 फीट प्रतिदिन खिसकाना चाहिए ताकि मौन आस-पास के स्थानों को आशानी से पहचान सकें।

यदि मौनवंश को शीघ्र ही 100 मीटर से अधिक दूरी पर हटाना होता है तो सबसे अच्छा तरीका है कि मौनवंश को तीन-चार किलोमीटर दूर ले जाकर 5 या 6 दिन तक रखा जाता है और उसके बाद ऐच्छिक स्थान पर लाकर रखा जाता है।

इस बीच मौनों को अपने पुराने स्थान की याददास्त भूल जाती है। मौनगृह को स्थानान्तरित करने के लिए शिशु खण्ड के सभी फ्रेमों को एक किनारे दाब देकर कस दिया जाता है। अन्तिम फ्रेम को दोनों किनारों पर एक-एक कील लगा देने से फ्रेमों में झटका नहीं लगता है।

मौनगृह के सबसे ऊपर अन्तपट रखकर उसमें बने हुए छिद्र पर तार की जाली लगाकर कील लगा देते हैं तथा अन्य खिसकने वाले भागों को टिन की पत्ती के सहारे कील लगाकर मौनों के निकलने के रास्ते को पूर्ण रूप से बन्द कर दिया जाता है।

सायंकाल जब मौनें अपने घर में वापस आ जाती हैं तो प्रवेश द्वार को भी कागज के टुकडे से बन्द कर देते हैं। इस प्रकार से मौनगृह को स्थानान्तरित करने के लिए तैयार कर लिया जाता है। गर्मी के मौसम में या दूरस्थ स्थानों पर ले जाते समय प्रतिदिन मौनगृह के ऊपर पानी का छिड़काव किया जाना हितकर होता है।

मौन में लूटलड़ाई :

एक मौनवंश के मौनों द्वारा दूसरे मौनवंश के मधु को थोड़ा थोड़ा चुराने की आदत को मौनों की लूट-लडाई कहते हैं भारतीय मौन में इस प्रकार की प्रवृत्ति विदेशी मौन की अपेक्षा अधिक होती है।

मौनों में जब मौनवंश कमजोर होते हैं या क्षेत्र में फ्लोरा उपलब्ध नहीं होता है तो लूट-लड़ाई अधिक होती है। लुटेरी मौन असुरक्षित द्वार या मौनगृह के छिद्र को खोज करके वे उसमें घुसने की कोशिश करती है।

अगर वे सुरक्षा करने वाली मौनों पर विजय प्राप्त कर लेती हैं तो वे संरक्षित भोजन को स्वतंत्रतापूर्वक लाना शुरू कर देती हैं। एक बाए लूट-लड़ाई आरम्भ होने पर नियंत्रण करने में कठिनाई होती है। भीषण प्रकोप में लूटी जाने वाली मौनवंश की रानी मर जाती है या मौनवंश घर छूट कर जाता है। एक दूसरे के बीच काफी लड़ाई होती है और अधिक से अधिक कौने घायल हो जाती हैं मौनों में लूट-लड़ाई की जानकारी मिलते ही प्रदेश द्वार के रास्ते को इतना सकरा कर देना चाहिए कि मात्र एक मौन ही आ-जा सके।

हरी घास लूटी जाने वाली मौनवंश के द्वार पर रख देना चाहिए। इसके बाद लड़ने वाले मौनों के उस स्थान की खोज करनी चाहिए जहाँ से वह आ रही हो। लुटेरी मौन की पहचान के लिए गेहूँ का आटा या टेल्कम पाउडर लूटी जाने वाली मौनवंश के द्वार पर जो मौन वापस जाती हैं, उनके ऊपर छिड़काव कर पता लगाया जा सकता है।

इस प्रकार लुटेरी मौन की पहचान आसानी से की जा सकती है। लुटेरी मौन या लूटी जाने वाली मौन को कुछ दूरी पर हटा देना चाहिए लूट लढाई को रोकने के लिए निम्नलिखित सावधानियाँ अपनाया जाना चाहिए-

1.मौनवंश को सुदृढ़ बनाये रखें।

2.मौनगृह को दरार रहित रखें।


3.भोजन के अभाव की स्थिति में मौनवंशों का सामयिक निरीक्षण आवश्यक है जैसा पहले स्पष्ट किया जा चुका है।

बी फ्लोरा के अनुपलब्धता काल में इटेलियन मौन भी भारतीय मौन को लटती है और आस-पास में दोनों प्रकार की मौनों को रखना कठिन होता है। ठण्ढक के मौसम में जब इटैलियन मौन काफी शिथिल होती हैं तो भारतीय मौन लूटने की कोशिश करती है लेकिन

4.मौनालय के अन्दर मधु या किसी मीठे पदार्थ को खुला न छोडें ।

5.मौनवंश को कृत्रिम भोजन सायंकाल के बाद ही दें।

6.मधु का निष्कासन मौनों से सुरक्षित कमरे में करना चाहिए।

मौनों का प्रतिपूरक भोजन :

मौनों के प्राकृतिक भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन इत्यादि तत्व पाये जाते हैं। फूलों के मकरन्द को मौनें एकत्रित करती हैं और शहद में परिवर्तित कर देती हैं। यह कार्ब्रहाइड्रेट्स और विटामिन्स का स्रोत हैं। फूलों में जो पीले रंग का पाउडर होता है वह प्रोटीन का मुख्य स्रोत है। उसको शिशुओं को खिलाने के पूर्व मधु के साथ मिश्रित करके खिलाया जाता है। पंखदार मधुमकक्ख्याँ नौजवान भी इस मिश्रित पदार्थ को खाती हैं।

इस पदार्थ को खाने से कमेरी मौनें शीघ्र ही शक्तिशाली हो जाती है और मौनी दुग्ध सावित करती हैं जो रानी का भोजन होता है यह पदार्थ लार्वा की वृद्धि के लिए प्रारम्भ में कमेरी मौनों द्वारा दिया जाता है। इनमें से नौजवान मधुमक्खियों नर्स का काम करती हैं जैसे ही पुरानी होती है। बाहर के कार्यों को करने लगती हैं।

मौनगृह के अन्दर कमेरी मौनों का अधिकांशतयः

एक कोष से दूसरे कोष में नवजात शिशुओं को भोजन खिलाते हुए देखा गया है।

शिशुपालन हेतु पर्याप्त संख्या में फूलों का मिलना महत्वपूर्ण होता है क्योंकि फूल ही मकरन्द तथा पराग के स्रोत होते हैं। एक शिशु को प्रौढ़ मधुमक्खी बनने तक पूर्ण रूप से भरा हुआ एक कोष शहद एवं एक कोष पराग की आवश्यकता पड़ती हैं।

यह कहा जा सकता है कि एक शिशु फ्रेम के बच्चों के पालन पोषण के लिए दो फ्रेम मधु एवं पराग की आवश्यकता होती है।

मौनें चीनी के शर्बत को भी भोजन के रूप में लेती हैं चीनी के शर्बत का घोल मधु के स्थान पर प्रतिपूरक का कार्य करता है जो शक्तिहीन मौनवंश को बचाने के लिए फ्लोरा के अभाव में दिया जाता है।

मधुस्रावकाल के आरम्भ में, जब फूल पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलते, बच्चों के पालन पोषाण कार्य को उत्तेजित करने के लिए कृत्रिम भोजन दिया जात है सफल मौनपालन के लिए यह एक महत्वपूर्ण कारण है।

मधुसाव काल में मौनवंशों को पूर्णरूप से शक्तिशाली रखना चाहिए ताकि अधिक से अधिक लाभ लिया जा सके। एक साधारण मौनवंश के पास कम से कम 2 से 3 किग्रा. मधु का संग्रह रहता है। मधु का स्तर इससे नीचे होने की स्थिति में मौनों को कृत्रिम भोजन दिया जाना चाहिए।

भोजन को रेप्रिड फीडर या चौड़ मुंह वाले गोल शीशी में रखकर मीनगृह के अन्दर रख दिया जाता है। गेहूँ या पुआल के छोटे टुकड़ों को रैपिड फीडर में शर्बत के ऊपरी सतह पर तैरा दिया जाता है। मधुमक्खियाँ इन टुकडों पर बैठ जाती हैं और शरबत में डूबने या भीगने से बच जाती हैं।

चीनी के घोल को खाली छत्तों में भी दिया जा सकता है। एक खाली छत्ते को मौनवंश से निकाल कर थाली में खड़ी अवस्था में रख दिया जाता है। चीनी के गाढे शरबत को छत्तों के कोषों में भर दिया जाता है।

एक तरफ़ के कोषों के पूर्ण रूप से भर जाने पर दूसरी तरफ के कोषों में भी भर दिया जाता है। यह मधुमक्खियों को भोजन देने की सुरक्षित एवं आसान विधि है।

शक्तिशाली मौनवंश बनाये रखने के लिए निम्न प्रमुख बातों को ध्यान में रखकर भोजन देना चाहिए :

1. मधुमक्खियों के वंश को ठीक समय पर भोजन देना एक साधारण मौनवंश के पास 2 से 3 किग्रा. मधु का संग्रह मधुस्राव सीजन के समाप्ति पर होना चाहिए ताकि वे भविष्य में भी प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना कर सकें।

मौनवंश में मधु एवं पराग की कमी को देखते ही मधु एवं पराग पूर्तिकारक पदार्थों को दिया जाना चाहिए। प्रकृति में मकरन्द एवं पराग उत्पादित करने वाले फूलों की कमी से यह स्थिति उत्पन्न होती है।

एक अच्छे एवं कुशल मौनपालक के लिए यह आवश्यक है कि आगामी मधुस्राव का लाभ अधिक से अधिक लेने के लिए फूलों के अभाव के समय मौनवंश को सुदृढ़ बनाये रखें ताकि वह मकरन्द का भरपूर दोहन तथा अपनी फसल / बागवानी में पूर्ण तथा सही पर परागण का लाभ उठा सकें। निम्न दशाओं में मौनवंशों को भोजन दिया जाता है-

अ-मौनवंशों को उत्तेजित करने के लिए भोजन देना मौनवंशों में निम्न क्रियाकलापों को पूर्ण करने के लिए उत्तेजित किया जाता है-

1.रानी मौन को बराबर अण्डे देने के लिए

2.मौनवंश को शक्तिशाली बनाने के लिए मौनवंश की संचय क्षमता बनाये रखने के लिए

3. शिशु प्रजनन हेतु भोजन देना : शिशु प्रजनन में मकरन्द / शहद की पूर्ति के साथ-साथ पराग की मात्रा में उपलब्ध रहना निर्भर करता है। पराग में प्रोटीन महत्वपूर्ण तत्त्व होता है, जो शिशुओं के विकास में आवश्यक होता है।

पराग की कमी को देखते हुए प्रोटीनयुक्त पदार्थ बताये गये मात्रा के अनुसार देने से शिशुओं का विकास तेजी से होता है। मौनवंशों को सुदृढ़ बनाये रखने के लिए उचित मात्रा में मकरन्द एवं पराग पूर्तिकारक पदार्थ समय से दिया जाना चाहिए।

आकस्मिक शिशु प्रजनन बन्द होने पर भोजन देना :

मकरन्द एवं पराग पूर्तित वाले फलों की अनुउपलब्धता के समय कमेरी मौनों को भोजन नहीं मिल पाता है जिससे शिशु ग्रन्थियों में मौनी दुग्ध का उत्पादन कम होने लगता है।

ऐसी स्थिति में रानी मौन तथा शिशुओं को मौनी, दुग्ध बहुत ही कम मिल पाता है जिसकी प्रतिपूर्ति मधु तथा पराग के मिश्रण को कमेरी मौनें खिलाकर करती हैं। इन पदार्थों की कमी में रानी मौन अण्डा देना बन्द कर देती है या बहुत ही कम संख्या में अण्डे देती हैं।

ऐसे शिशुओं से जो वयस्क बनते हैं और प्रायः कमजोर व कम कार्यक्षमता वाले होते हैं। यह समय मौनों के लिए प्रतिकूल समय कहलाता है।

मैदानी क्षेत्र में यह समय मई से अगस्त का महीना तथा सर्दी के मौसम में शीत लहर का समय तथा पर्वतीय क्षेत्र में दिसम्बर, जनवरी तथा जून से अगस्त का होता है जिसमें प्रकृति में मकरन्द एवं पराग देने वाले फूल बहुत ही कम मिलते हैं।

ऐसे काल में उचित अनुपात में कृत्रिम भोजन दिया जाना नितान्त आवश्यक है अन्यथा मौनों घरछूट कर जायेंगी या धीरे-धीरे मौनें समाप्त हो जायेंगी ।

छत्ता निर्माण हेतु भोजन देना : मोमी छत्ता कमेरी मौनों द्वारा बनाया जाता है। मोम उत्पादन हेतु शहद का खाया जाना नितान्त आवश्यक है। एक किग्रा. मोम निर्माण हेतु कम से कम 9-10 किग्रा. शहद का खाया जाना आश्यक होता है।

यह मोम कमेरी मौन के उदर के निचले चार जोड़ी मोमी ग्रन्थियों का विकास पूर्ण रूप से नहीं हो पाता है। कृत्रिम भोजन देने से नये छत्तों का निर्माण मौन करने लग जाती हैं जिससे मधुस्राव सीजन आने पर शहद के उत्पादन एवं वंशवृद्धि पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। शहद की उपयोगिता :

मधु अतिपौष्टिक, खाद्य पदार्थ तो है ही साथ ही औषधि भी है। मधु में निम्नलिखित तत्व पाये जाते हैं –

जल 17 से 18 प्रतिशत, फलों की चीनी 42.2 प्रतिशत, अंगूरी चीनी 34.71 प्रतिशत, एल्यूमिनाइड, 1.18 प्रतिशत एवं खनिज पदार्थ 1.06 प्रतिशत। इसके अतिरिक्त मधु में विटामिन सी, विटामिन बी, फोलिक एसिड, साइट्रिक एसिड़ इत्यादि महत्वपूर्ण पदार्थ भी पाये जाते हैं। मधु भोजन के रूप में, दवा के रूप में एवं सौन्दर्य प्रसाधन के रूप में प्रयोग किया जाता है ।

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