ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती 2023 में कैसे करे ?

ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती 2023 | मूंग की फसल में खरपतवार नाशक दवा

मूँग एवं उर्द की खेती सामान्यतः खरीफ के मौसम में एकल या अन्तः फसल के रूप में की जाती है । परन्तु पिछले दो दशकों से सिंचाई की सुगम व्यवस्था होने अल्पकालीन शीघ्र पकने वाली किस्मों के विकसित होने, सिंचाई की फुव्वारा विधि एवं अधिक आय प्राप्त होने इत्यादि कारणों की वजह से ग्रीष्मकालीन मूँग एवं बसंतकालीन उर्दू की खेती को बढ़ावा मिल रहा है। इसके अतिरिक्त ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती की सफलता के पीछे दलहन संस्थान कानपुर के वैज्ञानिकों के शोध जैसे- अतिशीघ्र पकने वाली किस्में ( 60-65 दिन), अधिक उपज (1.0-1.5 टन/ हे.) प्रकाश एवं तापमान के प्रति असंवेदनशील समकालिक पकने वाली किस्में मूँगदीन पित्त चितेरी विषाणु के प्रति प्रतिरोधी किस्मों के विकसित होने के कारण ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती का क्षेत्रफल अत्यधिक बढ़ रहा है।

मुंग-की-खेतीMung-Bean-mung dal,
मुंग की खेती

मूंग की खेती की जलवायु का समय

मूँग में गर्मी सहन करने की क्षमता अधिक होती है एवं यह लगभग 60-65 दिन में पककर तैयार हो जाती है (किस्मों पर निर्भर) | सामान्यतः मूँग की वृद्धि हेतु 27 से 35 सेंटीग्रेट तक तापमान सर्वोत्कृष्ट रहता है। फिर भी, इससे अधिक तापमान भी सहन करने की क्षमता होती है। मूँग एक प्रकार से ऊष्मा एवं शुष्कता के प्रति सहिष्णु फसल है।

इसी तरह, उर्द में भी अधिक तापमान सहन करने की क्षमता होती है एवं इसकी जड़ें अधिक गहराई तक जाती हैं। इसी कारण उर्द में अत्यधिक सूखा सहन करने की क्षमता होती है। उर्द की वृद्धि हेतु अनुकूल तापमान 22 से 28 सेंटीग्रेट होता है। ग्रीष्मकाल में सूर्य की अत्यधिक रोशनी होने के कारण तापमान अधिक रहता है एवं आर्द्रता कम होती है इसलिए कीट एवं बीमारियों का प्रकोप भी कम होता है। मृदा एवं खेत की तैयारी

मुंग की खेती के लिए उपयुक्त भूमि

मूँग एवं उर्द की सफल खेती, उपजाऊ एवं दोमट या बलूई दोमट मृदा जिसका PH- मान 6. 3-7.2 तक हो एवं जल निकास की उचित व्यवस्था हो, अच्छी रहती हैं। खेत की तैयारी करने के लिए 2-3 जुताई पर्याप्त रहती हैं। परन्तु गेहूं की कटाई के पश्चात् शून्य कर्षण द्वारा जीरो टिल- फर्टि ड्रिल द्वारा मूँग की बुवाई करने पर पैदावार में कमी नहीं आती है अपितु लागत में कमी आती है।

रबी फसल की कटाई उपरान्त खेत शुष्क रहता है अतः पलेवा करके एक बार हेरो से जुताई करके कल्टीवेटर द्वारा जुताई करें। यदि उर्दे की खेती पूरक फसल के रूप में ली जाती है तो जुताई की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि मुख्य फसल में प्राथमिक जुताई की जाती है। बसंतकाल में उदै की बुवाई हेतु समय की कमी होती है अतः शून्य कर्षण अपनाते हुए जीरो टिल- कम — फर्टि-ड्रिल द्वारा बुवाई करना फायदेमंद होता है।

मूंग की खेती में बीज एवं बीजो का उपचार

. उचित नमी की अवस्था में बीज को 4-5 से.मी. गहराई तक बुवाई करें। ग्रीष्मकाल में मूँग एवं उर्द की वानस्पतिक वृद्धि कम होती है अतः पौधों की संख्या अधिक होना फायदेमंद रहता है। अधिक बढ़वार वाली किस्मों को 25-30 कि.ग्रा. बीज / हेक्टेयर पर्याप्त है ।

मृदा एवं बीज जनित रोगों से बचाव हेतु बीजोपचार अति आवश्यक है। बीजोपचार हेतु ट्राइकोडर्मा हारजिएनम (Trichoderma harzianum) (5 ग्रा./कि.ग्रा. बीज) या थिरम (Thiram) (2.5 ग्रा./कि.ग्रा. बीज) या कार्बेडाजिम (Carbendazim) (2 ग्रा./कि.ग्रा. बीज) का प्रयोग करें। इसके अतिरिक्त राइजोबियम (250 ग्रा. / 10 कि.ग्रा. बीज) एवं फास्फोरस घोलक जीवाणु (250 ग्रा./ 10 कि.ग्रा. बीज) नामक जैव उर्वरकों द्वारा भी बीज संवर्धन करना लाभकारी होता है।’ बुवाई का समय एवं फसल चक्र

उत्तर प्रदेश में ग्रीष्मकालीन मूँग की बुवाई 25 फरवरी से लेकर 10 अप्रैल तक की जा सकती है देर से बुवाई करने पर जून के अंतिम सप्ताह में वर्षा होने पर फसल को नुकसान होने का खतरा रहता है। अतः जहाँ तक संभव हो बुवाई 10 अप्रैल तक अवश्य कर दें। फसल सघनता बढ़ाने एवं अधिक आय अर्जित करने में ग्रीष्मकालीन मूँग मुख्य फसल है।

यह निम्नांकित फसल पद्धतियों में ली जा सकती है। जैसे ग्रीष्मकालीन मूँग – गन्ना / आलू / कपास / सरसों, मक्का / धान – सरसों / गेंहूँ-ग्रीष्मकालीन मूँग, मक्का – आलू – ग्रीष्मकालीन मूँग, धान- आलू – ग्रीष्मकालीन ,मूँग, खरीफ मूंग-सरसों / गेहूँ- ग्रीष्मकालीन मूँग, धान गेंहूँ- ग्रीष्मकालीन मूँग इत्यादि ।

उत्तर प्रदेश में बसंतकालीन उर्द की बुवाई 15 फरवरी से 15 मार्च तक करें देरी से बुवाई करने पर अगेती मानसून द्वारा वर्षा होने पर फसल को नुकसान हो सकता है। मक्का-लाही – बसंतकालीन उर्द, मक्का – आलू – बसंतकालीन उर्द, ज्वार / मक्का – मटर- बसंतकालीन उर्द इत्यादि फसल चक्र अपनाकर आय एवं उपज बढ़ाई जा सकती है।

मूंग की उन्नतशील किस्में

ग्रीष्मकालीन मूँग की 60-65 एवं बसंतकालीन उर्द की 70-80 दिन में पकने वाली किस्में उपयुक्त रहती हैं। अन्यथा देर से पकने वाली किस्में अगेती ग्रीष्मकालीन मानसून की वर्षा आने पर नुकसान हो सकता है एवं बीज गुणवत्ता में कमी आती है।

मूंग की खेती में खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

यदि ग्रीष्मकालीन गूंग की खेती आलू गटर (सब्जी) या सरसों / लाही के उपरान्त की जाती है तो नत्रजन की आवश्यकता नहीं होती है। गेहूँ के उपरान्त मूँग की बुवाई करने पर 10 कि.ग्रा. नत्रजन एवं 35 कि.ग्रा. फास्फोरस / हे. पर्याप्त है ।

उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण की संस्तुतियों के अनुसार करें । सामान्यतः मूंग एवं उर्द को 15-20 कि.ग्रा. नत्रजन, 40 कि.ग्रा. फास्फोरस, 20 कि. ग्रा. पोटाश एवं 20 कि.ग्रा. गंधक प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बुवाई के समय कूडों में बीज से 2-3 से.मी. नीचे देवें

मूंग की खेती की सिंचाई

ग्रीष्मकालीन मूँग की सिंचाई भूमि के प्रकार, तापमान एवं हवा की तीव्रता पर निर्भर करती है । सामान्यतः 3-4 सिंचाई पर्याप्त होती हैं। अनावश्यक सिंचाई करने पर पौधे पीले पड़ सकते हैं एवं अधिक वानस्पतिक वृद्धि होती है। पहली सिंचाई बुवाई के 20-25 दिन पश्चात् करें एवं उसके बाद आवश्यकतानुसार 10-15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करें।

बुवाई के 50-55 दिन पश्चात् सिंचाई नहीं करें ताकि अधिक उपज मिले, फलियाँ एक साथ पर्क एवं वानस्पतिक वृद्धि रुके । फुव्वारा विधि द्वारा सिंचाई करने पर 30-40 प्रतिशत तक जल की बचत होती है । फुव्वारा शाम के समय चलाएं ताकि वाष्पीकरण द्वारा जल की हानि कम से कम हो ।

बसंतकालीन उर्द (कम समय में पकने वाली किस्में) की खेती पर्याप्त सिंचाई के साधन होने पर ही संभव है। उचित बीज अंकुरण एवं शुरुआत में फसल की अच्छी वृद्धि हेतु पलेवा करके बुवाई करें। पहली सिंचाई बुवाई के 25-30 दिन पश्चात करें। इसके पश्चात् 12-15 दिन के अंतराल पर हल्की सिंचाई करें। 4-5 सिंचाई पर्याप्त हैं।

अधिक उपज लेने हेतु शाखाएँ बनते समय, फूल आने एवं दाना बनते समय सिंचाई अवश्य करें। फुव्वारा विधि द्वारा सिंचाई करने पर जल की बचत होती है एवं लागत में कमी आती है तथा पैदावार भी अच्छी होती है। अतः फुव्वारा (स्प्रिंकलर) द्वारा सिंचाई करें।

मूंग की खेती में खरपतवार प्रबंधन

खरीफ की तुलना में ग्रीष्मकाल में खरपतवार कम उगते हैं। फिर भी फसल खरपतवार प्रतिस्पर्धा के क्रांतिक काल / अवस्था (बुवाई के 20-25 दिन पश्चात् ) तक खरपतवार मुक्त खेत जरूरी है। खरपतवार नियंत्रण हेतु बुवाई पश्चातू एवं अंकुरण पूर्व पेंडिमेथालीन (Pendimethalin) 30 ई.सी. की 3.3 लीटर मात्रा को 800-1000 लीटर पानी में घोलकर एक हेक्टेयर क्षेत्र में छिड़काव करें । खरपतवार नियंत्रण एवं अन्य शस्य क्रियाएँ करने हेतु बुवाई पंक्तियों में करें। बुवाई के 22-25 दिन बाद एक बार खुरपी / द्वारा घास और खरपतवार निकालना फायदेमंद रहता है। प्रमुख रोग

मूंग की खेती में पीत चितेरी विषाणु

इस रोग के प्रारंभिक लक्षण पत्तियों पर पीले धब्बे के रूप में दिखायी पड़ते हैं जो आपस में एक साथ मिलकर तेजी से फैलकर पत्तियों पर बड़े-बड़े धब्बे बनाते हैं । अन्ततः पत्तियाँ पूर्ण रूप से पीली हो जाती हैं। रोग ग्रसित पौधे देर से परिपक्व होते हैं तथा ऐसे पौधों में फूल और फलियाँ स्वस्थ पौधों की अपेक्षा बहुत ही कम लगती हैं । अत्यधिक घास वाले पौधों में पत्तियों के साथ-साथ फलियों तथा दानों पर भी पीले धब्बे बन जाते हैं।

मूंग की खेती में विषाणु प्रति

यह रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता है , और यह मक्खी पूरे वर्ष किसी न किसी प्रकार पाई जाती है। गर्मियों में सफेद – मक्खी अरहर से पित्तचितेरी विषाणु ग्रहण करके

ग्रीष्मकालीन मूंग एवं बसंतकालीन उर्द में विषाणु का संचारण होती है । इस तरह पित्त चितेरी विषाणु एक मौसम से दूसरे मौसम तक जीवित रहकर एक फसल से दूसरी फसल में फैलता रहता है। रोग फैलने की गति सफेद मक्खी की संख्या पर निर्भर करती है, सफेद मक्खियों की संख्या अधिक होने पर इस रोग की संभावना अधिक होती है।

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मुंग की खेती में रोकथाम

अवरोधी प्रजातियों का चयन इस रोग के प्रबंधन का सरलतम उपाय है ।

चूंकि यह रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता है इसलिये सफेद मक्खी का नियंत्रण करके इस रोगको नियन्त्रित किया जा सकता है। खेत में रोग के लक्षण दिखते ही या बुवाई के 15 दिनों के पश्चात इमीडाक्लोप्रिड 0.1 प्रतिशत (1 मि.ली. / लीटर पानी) या डायमेथोएट 0.3 प्रतिशत (30 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी) का फसल पर छिड़काव करें। इन कीटनाशियों का दूसरा छिडकाव बुवाई के 40 दिनों के पश्चात करने से इस रोग का प्रकोप कम किया जा जाता है।

रोग ग्रसित पौधों को शुरू में ही उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए । चूर्णील आसिता रोग (Powdery mildew)

गर्म या शुष्क वातावरण इस रोग के जल्दी फैलाने में सहायक होता है। इस रोग के मुख्य लक्षण पौधे को सभी वायवीय भागों में देखे जा सकते हैं। रोग का संक्रमण सर्वप्रथम निचली पत्तियो पर कुछ गहरे (बदरंगे ) धब्बों के रूप में प्रकट होता है। इन्ही धब्बों पर छोटे-छोटे सफेद बिन्दु पड़ जाते हैं जो बाद में बढ़कर एक बड़ा सफेद धब्बा बनाते हैं।

जैसे-जैसे रोग की उग्रता बढ़ती है यह सफेद धब्बे न केवल आकार में बढ़ते हैं। परन्तु ऊपर की नई चूर्णित आसिता प्रतिपर्व पत्तियों पर भी विकसित हो जाते हैं। अन्ततः ऐसे सफेद धब्बे पत्तियों की दोनों सतह पर तना, शाखाओं एवं फली पर फैल जाते हैं। इससे पौधों की प्रकाश संश्लेषण की क्षमता नगण्य हो जाती है और अन्त में संपूर्ण भाग झुलस / सूख जाता है।

मूंग की खेती में रोग की रोकथाम

. रोग अवरोधी प्रजातियों का चुनाव करें।

• फसल पर घुलनशील गंधक के 0.3 प्रतिशत घोल का छिडकाव करें।

• कवकनाशी जैसे कार्बेन्डाजिम (Carbendazim) (0.5 ग्रा./ ली. पानी) या केराथेन (Karathane) (1 मि.ली. / ली. पानी) का छिड़काव करें। प्रथम छिड़काव रोग के लक्षण दिखते ही करना चाहिए। आवश्यकतानुसार दूसरा छिड़काव 10-15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए ।

मूंग की खेती में प्रमुख कीट सफेद मक्खी

यह कीट न केवल मूंग की फसल का प्रमुख कीट है अपितु यह पित्तचितेरी विषाणु रोग का भी संवाहक है। यह पौधों की कोशिकाओं का रस चूसकर भोजन प्राप्त करता है जिसके कारण पौधे की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। पौधों की पत्तियाँ नीचे की तरफ मुड़


जाती है। सफेद मक्खी पौधों की पत्तियों पर काली फफूँदी की परत विकसित करती है जिसके कारण प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

मूंग की खेती में रोकथाम

  1. खेत एवं आस-पास की मेडों, सिंचाई की नालियों इत्यादि पर खरपतवार का उचित प्रबंधन करना चाहिए क्योंकि खरपतवार इस कीट के विकल्पी पोषक होते हैं।

2. कीट अवरोधी प्रजातियों का चयन करें जैसे कि, मूँग की एच. यू. एम. – 16, पी.डी.एम. 139, पूसा विशाल, आई.पी.एम. 2 – 3, मेहा, आई.पी.एम. 214 एवं उर्द की पन्त यू. -19, यू. जी. -218, उत्तरा, पन्त यू – 30 इत्यादि ।

3. डाइमेथोएट (Dimethoate) :30 ई.सी. (0.7 मि.ली. / लीटर पानी) या एसिफेट (Acephate) 75 एस. पी. (1 ग्रा./ली. पानी) या इमिडाक्लोप्रिड (Imidacloprid) 17.8 एस. एल. (02 मि.ली. / ली – पानी) का छिड़काव करें एवं 15 दिन पश्चात् पुनः छिड़काव करें। पर्णजीवक (Thrips)

4. इस कीट की प्रौढ़ तथा शिशु अवस्थायें पौधों में कलियों एवं फूलों का रस चूसते हैं अधिक प्रकोप की स्थिति में पुष्प झड़कर नीचे गिर जाते हैं जिसके कारण पौधों पर फलियाँ नहीं बनती। ग्रीष्मकालीन मूंग एवं बसंतकालीन उर्द की फसल में फूल बनते समय (मई से मध्य जून) इसका अत्याधिक प्रकोप पाया जाता है। इस कीट की अत्याधिक प्रकोप की अवस्था में पौधा झाड़ी जैसी बढ़वार लेता है और फसल गहरी हरी रंग की दिखती है ऐसी फसल में फलियाँ व दाने सिकुड़े से बनते हैं।

5. जीवक से प्रभावित न की फसल

6. फसल में समय पर सिंचाई (15 दिन के अंतराल पर इस कीट की संख्या की बढ़वार को रोकती है। थायोमेथोक्साम (Thiomethoxam) 70 डब्ल्यू.एस. (5 मि.ग्रा./ कि.ग्रा. बीज ) द्वारा बीजोपचार करें।

7. डाइमेथोएट (Dimethoate): 30 ई.सी. (0.7 मि.ली. / ली. पानी) या ट्राएजोफॉस (Triazophos) 40 ई.सी. (2 मि.ली / ली. पानी) या एन. एस. के. ई. (NSKE ) ( 3.5 मि.ली. / ली. पानी का छिड़काव करें।

8. थायोमेथोक्साम (Thiomethoxam): 25 डब्ल्यू. जी. (0.2 मि.ली. / ली. पानी) या ईथीयॉन ( Ethion) 50 ई.सी. (2 मि.ली. / ली. पानी) का छिड़काव करें।

Some Relative Question And Answer

मूंग की फसल कितने दिन में तैयार हो जाती है?

65 – 70 में मुंग की उपज तैयार हो जाती है |

मूंग की बुवाई कब तक की जा सकती है?

जायद में मार्च माह के पहले सप्ताह से अप्रैल के दूसरे सप्ताह के तक और खरीफ में मुंग की खेती जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई लास्ट तक |

1 किलो मूंग का क्या भाव है?

1 किलो मूंग का भाव लगभग 135 -140 प्रति किलोग्राम है |

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