रागी (महुवा) की उन्नतशील खेती कैसे करें 2023

रागी की खेती मोटे अनाज के रूप में की जाती है। रागी मुख्य रूप से अफ्रीका और एशिया महाद्वीप में उगाई जाती है, जिसको मडुआ, अफ्रीकन रागी, फिंगर बाजरा के नाम से भी जाना जाता है। इसके पौधे पूरे साल पैदावार देने में सक्षम होते हैं। इसके पौधे सामान्य तौर पर एक से डेढ़ मीटर तक की ऊंचाई के पाये जाते हैं। इसके दानों में खनिज पदार्थो की मात्रा बाकी अनाज फसलों से ज्यादा पाई जाती है।

इसके दानों का प्रयोग खाने में कई तरह से किया जाता है। इसके दानों को पीसकर आटा बनाया जाता है, जिससे मोटी डबल रोटी, साधारण रोटी और डोसा बनाया जाता है।

इसके दानों को उबालकर भी खाया जाता है। इसके साथ ही, इसका उपयोग शराब बनाने के लिए भी किया जाता है। रागी (महुवा) की उन्नतशील के लिए सूखी जलवायु की आवश्यकता होती है, और भारत में अधिकांश स्थानों पर इसे खरीफ की फसल के रूप में बोते जाते हैं। इसके पौधों को अधिक वर्षा की आवश्यकता नहीं होती है।

इसके पौधों को समुद्र तल से 2000 मीटर तक की ऊंचाई पर सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। भारत में इसकी खेती उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दक्षिणी पूर्वी राज्यों में की जाती है। इसकी खेती किसानों के लिए अधिक लाभ देने वाली मानी जाती है।

रागी (महुवा) की उन्नतशील भूमि की तैयारी

पूर्व फसल की कटाई के पश्चात आवश्यकतानुसार ग्रीष्म ऋतु में एक या दो गहरी जुताई करें एवं खेत से फसलों एवं खरपतवार के अवशेष एकत्रित करके नष्ट कर दें। मानसून की शुरुआत पर, खेत में एक या दो जुताई करके पाटा लगाकर समतल करें।

बीज दर एवं बुवाई का समय

बीज का चुनाव मृदा की किस्म के आधार पर करें। जहां तक संभव हो प्रमाणित बीज का प्रयोग करें। यदि किसान स्वयं का बीज उपयोग में लाता तो बुवाई पूर्व बीज साफ करके फफूंदनाशक दवा (कार्बेन्डाजिम / कार्बोक्सिन) से उपचारित करके बोयें। रागी की सीधी बुवाई अथवा रोपा पद्धति से बुवाई की जाती है। सीधी बुवाई जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई मध्य तक मानसून वर्षा होने पर की जाती है। कतार में बुवाई करने हेतु बीज दर 8 से 10 किग्रा प्रति हेक्टेयर एवं छिंटकवा पद्धति से बुवाई करने पर बीज दर 12-15 किग्रा. हेक्टेयर रखते हैं।

कतार पद्वति में दो कतारों के बीच की दूरी 22.5 सेमी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी. रखे। रोपाई के लिए नर्सरी में बीज जून के मध्य से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक डाल देना चाहिए। एक हेक्टेयर खेत में बोने जाने वाले बीज की मात्रा 4 से 5 किलोग्राम की होती है और 25 से 30 दिन की पौधों की उम्र होने पर रोपाई करनी चाहिए। रोपाई के समय कतार से कतार व पौधे से पौधे की दूरी क्रमशः 22.5 सेमी व 10 सेमी होनी चाहिए।

रागी की उन्नतशील किस्में

रागी की विभिन्न अवधि वाली निम्न किस्मों को उत्तर प्रदेश के लिए अनुशंसित किया गया है-

जी.पी. यू. 45

यह रागी की जल्दी पकने वाली नई किस्म है। इस किस्म के पौधे हरे होते हैं जिसमें मुड़ी हुई बालियां निकलती हैं। यह किस्म 104 से 109 दिनों में पककर तैयार हो जाती है और इसकी उपज क्षमता 27 से 29 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, यह किस्म झुलसा रोग के खिलाफ प्रतिरोधी है।

चिलिका (ओ. ई. बी. – 10 )

इस देर से पकने वाली किस्म के पौधे ऊंचे, पत्तियां चौड़ी एवं हल्के रंग की होती है। बालियों का अग्रभाग मुड़ा हुआ होता है, प्रत्येक बाली में औसतन 6-8 अगुंलिया पाई जाती हैं। दाने बड़े तथा हल्के भूरे रंग के होते हैं। इस किस्म के पकने की अवधि 120 से 125 दिन व उपज क्षमता 26 से 27 कुन्तल प्रति हेक्टेयर होती है। यह किस्म झुलसा रोग के लिए मध्यम प्रतिरोधी तथा तना छेदक कीट के लिए प्रतिरोधी है।

•ब्रा (ओ.यू. ए. टी. – 2)

इस किस्म के पौधे 80-90 सेमी. ऊंचे होते हैं जिसमें 7-8 सेमी. लम्बी 7-8 अंगुलियां प्रत्येक बाली में लगती है। इस किस्म की औसत उत्पादक क्षमता 21 से 22 कुन्तल प्रति हेक्टेयर है। यह किस्म सभी झुलसा के लिए मध्यम प्रतिरोधी तथा पर्णछाद झुलसा के लिए प्रतिरोधी है।

•वी. एल. – 149

इस किस्म के पौधों की गांठे रंगीन होती है। बालियां हल्की बैंगनी रंग की होती है उनका अग्रभाग अंदर की ओर मुड़ा हुआ होता है। इस किस्म के पकने की अवधि 98 से 102 दिन व औसत उपज क्षमता 20 से 25 कुन्तल प्रति हेक्टेयर है। यह किस्म झुलसा रोग के लिए प्रतिरोधी है।

खाद एवं उर्वरक का प्रयोग

मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग सर्वोत्तम होता है। असिंचित खेती के लिए 40 किग्रा. नत्रजन व 40 किग्रा. फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से अनुशंसित है। नत्रजन की आधी मात्रा व फास्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई पूर्व खेत में डाल दें तथा नत्रजन की शेष माता अंकुरण के 3 सप्ताह बाद प्रथम निराई के उपरान्त समान रूप से डालें।

गोबर अथवा कम्पोस्ट खाद (100 कुन्तल प्रति हेक्टेयर) का उपयोग अच्छी उपज के लिए लाभदायक पाया जाता है। जैविक खाद एजोस्पाइरल ब्रेसीलेन्स और एस्परजिलस अवामूरी के साथ 25 ग्राम प्रति किलो बीज पर बीजोपचार किया गया है, जिससे बीज की उपज में लाभ मिला है।

अन्तःसस्य क्रियायें

रागी की फसल को बुवाई के बाद प्रथम 45 दिन तक खरपतवारों से मुक्त रखना आवश्यक है अन्यथा उपज में भारी गिरावट आ जाती है। अतः हाथ से एक निराई करें अथवा बुवाई या रोपाई के 3 सप्ताह के अन्दर 2,4-डी सोडियम साल्ट (80 प्रतिशत) की 1 किग्रा मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने से चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार नष्ट किये जा सकते हैं। बालियाँ निकलने से पूर्व एक और निराई करें ।

फसल पद्धति

रागी की 8 कतारों के बाद, अरहर की दो कतार बोने जाने पर लाभदायक परिणाम मिला है।

पौध संरक्षण रोग-व्याधियां

फफूंदजनित झुलसन एवं भूरा धब्बा रागी की प्रमुख रोग-व्याधियां हैं जिनका समय पर निदान उपज में हानि को रोकता है।

झुलसा

रागी की फसल पर पौध अवस्था से लेकर बालियों में दाने बनने तक किसी भी अवस्था में फफूंदजनित झुलसा रोग का प्रकोप हो सकता है। संक्रमित पौधे की पत्तियों में भिन्न-भिन्न माप के आंख के समान या तर्कुरूप धब्बे बन जाते हैं, जो मध्य में धूसर व किनारों पर पीले-भूरे रंग के होते हैं। अनुकूल वातावरण में ये धब्बे आपस में मिल जाते हैं व पत्तियों को झुलसा देते हैं।

बालियों की ग्रीवा व अगुलियों पर भी फफूंद का संक्रमण होता है। ग्रीवा का पूरा या आंशिक भाग काला पड़ जाता है, जिससे संक्रमित भाग से टूटकर लटक जाती हैं या गिर जाता है। अगुलियां भी आंशिक रूप से या पूर्णरूप से संक्रमित होने पर सूख जाती है जिसके कारण उपज की गुणवत्ता व मात्रा प्रभावित होती है।

रोकथाम

बुवाई पूर्व बीजों को फफूंदनाशक दवा मैंकोजेब, कार्बेन्डाजिम या कार्बोक्सिन या इनके मिश्रण से 2 ग्राम प्रति किग्रा बीज दर से उपचारित करें।
खड़ी फसल पर लक्षण दिखाई पड़ने पर कार्बेन्डाजिम या मैंकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव पुनः करें ।

जैव रसायन स्यूडोमोनास फ्लोरेसेन्स का पर्ण छिड़काव (0.2 प्रतिशत) भी झुलसा के संक्रमण को रोकता है। रोग प्रतिरोधी किस्मों जैसे जी.पी.यू. 45, चिलिका, शुब्रा, वी.एल. 149 का चुनाव करें।

भूरा धब्बा रोग

जिसे फफूंदजनित रोग भी कहा जाता है, पौधों की सभी अवस्थाओं में हो सकता है। प्रारंभ में, पत्तियों पर छोटे-छोटे हलके भूरे और अंडाकार के धब्बे बन सकते हैं। बाद में इनका रंग गहरा भूरा हो जाता है। अनुकूल अवस्था में ये धब्बे आपस में मिलकर पत्तियों को समय से पूर्व सुखा देते हैं। बालियों एवं दानों पर संक्रमण होने पर दानों का उचित विकास नहीं हो पाता है, दाने सिकुड़ जाते हैं, जिससे उपज में कमी आ जाती है ।

रोकथाम

बुवाई पूर्व बीजों को फफूंदनाशक रसायन मैंकोजेब कार्बेन्डाजिम या कार्बोक्सिन या इनके मिश्रण से 2 ग्राम प्रति किग्रा. बीज दर से उपचारित करें।
खड़ी फसल पर लक्षण दिखाई पड़ने पर कार्बेन्डाजिम या मैंकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव पुनः करें | 0.2 प्रतिशत से प्रवृत्त पर्ण छिड़काव भी जैव रसायन स्यूडोमोनास फ्लोरेसेन्स के संक्रमण को रोकता है।

कीट

तना छेदक एवं बालियों की सूड़ी रागी की फसल के प्रमुख कीट है। तना बेधक वयस्क कीट एक पतंगा होता है जबकि लार्वा तने को भेदकर अन्दर प्रवेश कर जाता है एवं फसल को नुकसान पहुंचाता हैं। कीट के प्रकोप से “डेड हर्ट” लक्षण पौधे पर दिखाई पड़ते हैं।

1.रोकथाम

कीटनाशक रसायन डाइमेथोएट 1 से 1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

चिलिका के लिए कीट प्रतिरोधक किस्म(kism) का चयन करें।

बालियों की सूड़ी

इस कीट का प्रकोप बालियों में दाने बनने के समय होता है। भूरे रंग की रोयेंदार इल्लियां रागी की बालियों को नुकसान पहुंचाती है जिसके फलस्वरूप दाने कम व छोटे बनते हैं।

रोकथाम

1.5 प्रतिशत क्यूनालफॉस या 4 प्रतिशत डी. पी. या थायोडान डस्ट का प्रयोग 24 किग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से करें।

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