राजमा की खेती: एक संपूर्ण जानकारी, उत्पादन और व्यापार के लाभ

राजमा की खेती भारत में पूर्वी और मैदानी क्षेत्र में होती है जो एक रबी की फसल भी जानी जाती है |और आज हम इनसे जुड़े कुछ मुख्य बिंदु पर बातें करेंगे , जैसे – राजमा की खेती , राजमा की भूमि , मैदानी क्षेत्र , पूर्वी क्षेत्र ,भारत में राजमा की खेती , राजमा बीज इत्यादि |

राजमा की खेती कहां होती है ?

रबी की मौसम में राजमा की खेती का भी मैदानी क्षेत्र में बहुत अधिक महत्त्व मिलता है जो की कुछ वषो में काफी प्रचलन में रहा है पर इसका डाटा उत्पादन क्षेत्र में अभी उपलब्ध नहीं है |

भारत में राजमा की खेती के लिए भूमि

हल्की दोमट तथा दोमट भूमि अधिक मुख्या है। जल निकाशी अच्छी रूप से करनी चाहिए ।

भूमि की तैयारी :

खेत की पहली जुताई देशी हल से या कल्टीवेटर से करना उचित रहता है क्योकि इससे खेत की मिटटी को पूरी तरह से पलटने में मदद मिलती है , जिससे बुवाई के समय भूमि या खेत में काफी नमी उपयुक्त मात्रा में बानी होती है |

संस्तुत प्रजातियां टेबल

S.N.प्रजातियांअधिसूचना का वर्षदोनों का रंगउत्पादकता (कु./हेक्टेयर )पकने की अवधि (दिनों में )उपयुक्त क्षेत्र
1P.D.R-141987लाल चित्तीदार रंग30-35125-130प्रदेश का मध्य एवं पूर्वी क्षेत्र
2मालवीय -1371991लाल रंग25-30110-115मध्य एवं पूर्वी क्षेत्र
3V.L.-631991भूरा चित्तीदार रंग25-30115-120रबी के मैदानी क्षेत्र
4अरुण2001लाल रंग15-18120-125सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश वायरस अवरोधी
5अम्बर(I.I.P.R96-4)2002लाल चित्तीदार रंग20-25120-125पूर्वी उत्तर प्रदेश
6उत्कर्ष2005गहरा चित्तीदार रंग20-25130-135पूर्वी उत्तर प्रदेश
कुछ उन्नति प्रजाति

बीज की मात्रा : राजमा का बीज कैसे लगाएं?

125 से 145 kg / हेक्टेयर में पंक्ति से पंक्ति (row -row) की लगभग दुरी 32 से 42 एवं पौधा से पौधा की 12 cm होना चाहिए | और जब हम बीज(Seeds) को बोते है तो इसकी गहराई 9 से 11 cm. के गहराई में रखते है, जिससे बीज उपचार करके डालना चाहिए जिससे पर्याप्त नमी(water) बानी रहे |

बीज शोधन

बीज शोधन में हम फफूंदी नाशक पाउडर डालते है जैसे -कार्बेन्डाजिम या धीरम(Dheeram ) 2 kg / प्रति kg इस प्रकार से सोधन करने से अंकुरण रोगो को नस्ट किया जा सकता है |

बुवाई :

इसकी बुवाई का समय 20 अक्टूबर के बाद मुख्य समय होता है और पूर्वी क्षेत्र में बुवाई का समय सुरुवाती नवंबर में होता है |

उर्वरक :

राजमा की खेती करने के लिए राजमा में नइट्रोजन की अधिक मात्रा में जरुरत पड़ती है क्योकि इसमें Risobium ग्रंथिया नहीं पायी जाती इसलिए | 62 kg फास्फेट , 120 kg नइट्रोजन एवं 32 kg पोटाश /हेक्टेयर के रूप में देना महत्वपूर्ण है | 62 kg नइट्रोजन एवं फास्फेट तथा पोटाश की मात्रा के समय और बाकि 1 /2 नइट्रोजन की मात्रा टॉप ड्रेसिंग में करना चाहिए । 22 किग्रा./ Hectare गंधक डालना लाभकारी परिणाम प्राप्त होते है । 26 के घोल का छिड़काव(Spray) 30 दिन एवं 50 दिन पर करना जरुरी है, जिससे अच्छे परिणाम मिलता है ।

राजमा का पेड़: जानकारी और महत्व

राजमा, जिसे वैज्ञानिक भाषा में “Phaseolus vulgaris” के नाम से जाना जाता है, एक फलीय फसल है जो मुख्य रूप से दक्षिणी अमेरिका का आगमनी फसल है। यह विभिन्न विधियों से तैयार की जाने वाली सब्जी के रूप में खाई जाती है और इसका उत्पादन कृषि में अहम भूमिका निभाता है। राजमा का पेड़ देखने में भी बहुत सुंदर और प्रतिस्पर्धी नजर आता है।

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राजमा के पेड़ की विशेषताएँ:

  • राजमा का पेड़ एक बड़ा और शाखाएंदार पेड़ होता है जो सामान्यतः 15 से 20 फुट ऊंचा होता है।
  • इसके पत्ते तीनों ओर से चारों ओर नकीरे दार होते हैं और यह तेजी से फैलते हैं।
  • राजमा के पेड़ पर घानी फूलों का खूबसूरत समृद्धिवान फूल खिलते हैं, जिनका रंग लाल, सफेद, और हरा होता है।
  • इस पेड़ के फलों का रंग सब्जी के अनुसार लाल, पीला या काला होता है और इनमें बहुत सारे फूलों के बीच छोटे-छोटे दाने होते हैं।
  • राजमा के पेड़ का वृक्षारोहण अंडेरूनी भूभाग के रूप में होता है, जो उसके रूढ़ीबाग के साथ उसके रेंगते पत्तों की अपेक्षित जीवन अवधि को निर्धारित करता है।

राजमा का पेड़ कृषि एवं पर्यावरणीय महत्व रखता है, और इसकी सब्जी लाभदायक एवं स्वादिष्ट होती है। यह भारत और अन्य देशों में भी खेती जाती है और इससे बनी सब्जी का उपभोग भारतीय खाद्य संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है। इसके फूल और वृक्षारोहण भी एक सुंदर दृश्य प्रदान करते हैं जो वातावरण की सुंदरता को बढ़ाता है।

इस प्रकार, राजमा का पेड़ एक चमकदार और उपयोगी पेड़ है जो सब्जी के रूप में बहुत प्रसिद्ध है। इसके बढ़ने वाले पौधों और रंगीन फूलों का नजारा देखने में भी आनंद आता है, जो वातावरण को और भी सुंदर बनाता है |

राजमा की खेती की सिचाई

राजमा की खेती में 2 – 3 बार सिंचाई की आवश्यकता होती है।राजमा बुवाई के चार(4) सप्ताह बाद प्रथम(पहली ) सिंचाई अवश्य रूप से करनी चाहिए। उसके बाद की सिंचाई एक महीने के गैप पर करना चाहिए , सिंचाई इस रूप में करे की खेत में जल न ठहरे ।

निराई-गुड़ाई:

पहली सिंचाई के उपरांत निराई एवं गुड़ाई करना बहुत जरुरी है । गुड़ाई के समय थोड़ी -थोड़ी मिट्टी पौधे में भी चढ़ा देनी चाहिए जिससे फल आने पर पौधे को गिरने से बचाया जा सके। और फसल को उगने के पहले कीट व रोगनाशक Pendy-methelene का छिड़काव (स्प्रे) करना चाहिए |

रोग नियंत्रण :

इसकी पत्तियों में मौजेक देखकर इसमें डाइमेथोएट 30 % इ.सी .(EC) एक लीटर एवं इमिडाक्लोप्रिड 17 .8 % तथा एस. एल. की मात्रा 250 मिली फिर लगभग 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव से सफ़ेद मख्खियो(White Insects) खत्म हो जाती है | इससे मक्खिया या रोग फैल नहीं पते । राजमा के रोगी पौधे को सुरुवात में ही निकाल दें क्योकि रोग फैल न पाए ।

फसल कटाई एवं भण्डारण :

इसकी फलियां जब पकने लगे तो फसल को काट लेना चाहिए ,क्योकि जयदा सूखने से फलिया चटकना सुरु हो जाती है , और राजमा की मड़ई करके दाना निकल लेते है |

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राजमा की खेती कहां होती है?

राजमा की भूमि , मैदानी क्षेत्र , पूर्वी क्षेत्र


राजमा कौन से महीने में बोया जाता है?

OCTOBER LAST AND NOVEMBER STARTING ME


राजमा का बीज कैसे लगाएं?

125 से 145 kg / हेक्टेयर में पंक्ति से पंक्ति (row -row) की लगभग दुरी 32 से 42 एवं पौधा से पौधा की 12 cm होना चाहिए | और जब हम बीज को बोते है तो इसकी गहराई 9 से 11 cm के गहराई में रखते है जिससे बीज उपचार करके डालना चाहिए जिससे पर्याप्त नमी बानी रहे |

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