सहकारी खेती (Co -oprating farming)क्या है , कैसे करे?

सहकारी खेती के कुछ मुख्यरूप है जिसके बारे में हम विस्तार से बात करेंगे -1 .सहकारी उन्नत खेती संस्था(Cooperative Advanced Farming Society),2 .सहकारी काश्तकारी खेती संस्था(cooperative tenancy farming organization),3 .सहकारी संयुक्त खेती संस्था(Cooperative Joint Farming Society),4 .सहकारी सामूहिक खेती संस्था(cooperative collective farming organization) आदि |

सहकारी खेती (Co -oprating farming) :

भारत में आसान सब्दो में जाना जाये की सहकारी खेती क्या है ? तो आसान सा जवाब होता है की सहकारी खेती एक प्रकार की सामूहिक खेती है , जिसमे हम एक संगठन के रूप में खेती करते है | सहकारी खेती में कृषक पास भूमि न भी हो तो वह जो भू -स्वामित्व से सहकारिता से उनके भूमि में कार्य कर सकते और बाद में अपना दोनों लोगो का जो अनुपात हो उस तरह से अनाज(फसल) को बात लिया जाता है | इसीतरह के सहकारिता को ही सहकारी खेती कहते है |

Or (अथवा)

सहकारी कृषि में जब कृषको को अधिक लाभ लेना या कमाने की सोच हो रही हो तो इस अवस्था में सहकारी खेती की संस्था बनाकर के किये गए कार्य को सहकारी खेती कहते है | सहकारिता में स्वमित्वा सम्पूर्ण और समुचित कार्य या श्रम आधारित होता है | सहयोगी खेती में कृषि की स्थिति और उसमे उत्साह एवं फसल की उत्पादन में बृद्धि की लिए सुरु की गयी है |ऐसे खेती को ‘कोलखहोज’ के नाम से भी जाना जाता है |

सहकारी खेती के प्रकार

सहकारी खेती मुख रूप से चार प्रकार की होती है, जो निम्न है –

1 .सहकारी उन्नत खेती संस्था(Cooperative Advanced Farming Society)
2 .सहकारी काश्तकारी खेती संस्था(cooperative tenancy farming organization)
3 .सहकारी संयुक्त खेती संस्था(Cooperative Joint Farming Society)
4 .सहकारी सामूहिक खेती संस्था(cooperative collective farming organization)
आइये इनके बारे में थोड़ा जानने की कोसिस करते है –

1. सहकारी उन्नत खेती संस्था

इस संस्था का बहुत जरुरी कार्य है किसानो को शिक्षित करना है । यह किसानों को बताने का कार्य करती है तो की खेती में कौन कौन से तरीके से खेती की जाती है | यह संस्था से समय-समय पर इन तकनीकों(techniques) की प्रदर्शनी करती है, ताकि किसान इसे समझकर अपनी खेती में सही से इस्तेमाल कर सकें।

2.सहकारी काश्तकारी खेती संस्था

इस सहकारी खेती में संस्था के जरिये किसानों को खेती करने के लिए जमीन(भूमि) मुहैया की जाती है। संस्था खुद की जमीन या कोई जमीन(भूमि) किराए पर लेकर किसानों(kisan) को देती है।जिसमे फसल उगाने की जिम्मेदारी (Responsibility)सिर्फ किसान की रहती है, संस्था द्वारा उसमें कोई हस्तक्षेप(Interference) नहीं किया जाता है।

3. सहकारी संयुक्त खेती संस्था

सहकारी संयुक्त खेती सभी किसान मिलकर फसल उगाते हैं। इसमें संस्था में किसानों को भूमि में होने वाली मदद जैसे – बीज और उर्वरक आदि खरीदने में सहायता करती है । और इस संस्था में किसानो की फसल को बेचने में और खुद भी खरीद लेती है दो तरीको से मदद करती है या सहकारी संयुक्त खेती संस्था |

4. सहकारी सामूहिक खेती संस्था

इस संस्था बंजर जैसे जमीनों पर कार्य करती है । कुछ दिनों के बाद यह जमीन किसान को दे दी जाती है । इस संस्था का काम अधिक उत्पादन करना है ।

सहकारी खेती की विशेषताएँ

सहकारी खेती की कुछ महत्वपूर्ण विशेषतायें निम्न हैं-

1) इसप्रकार की खेती में छोटे-छोटे कृषको की भूमि को मिलाकार एक बड़ा रूप दिया जाता है |

2) सहकारी खेती में छोटे कृषको का यथावत स्वामित्व रहता है |

3)सहकारी खेती के मॅनॅग्मेंट के लिए एक समिति का गठन होता है |

4) इसमें भू-स्वामित्व एक समिति सदस्य होते है |

5) इसमें सभी सदस्यों की इच्छा होती है |

6) सहकारी खेती प्रजातांत्रिक के आधार पर होता है |

7) इसमें खेती का एक बड़ा पैमाना तैयार किया जाता है |

8) सदस्यों के कार्य के अनुसार कुछ स्वमित्वा भी मिलता है |

9) सहकारी कृषि में संचालित एक कोष निर्मित किया जाता है, इसी कोष के उत्पादन के संशाधनो में ही व्यय किया जाता है|

10)फसल से प्राप्त धनराशि को खर्च किये गए धनराशि से निकालकर उसके बाद सभी सदस्यों में बात दिया जाता है |

11) शेष धनराशि को भूस्वामित्व की भूमि के आधार पर बितरित किया जाता है |

सहकारी खेती ,cooprative farming,

सहकारी खेती का महत्व -or सहकारी खेती के लाभ (Benefits of Co – operative Farming) :

सहकारी कृषि के कुछ प्रमुख लाभ निम्नलिखित दिए गए है –

(1).उत्पादकता में वृद्धि – सहकारी कृषि से आप किसान भाइयो को उत्पादकता में वृद्धि होती है, वो इसलिए क्योकि सभी लाभ लेने के लिए ही मेहनत करते है । कृषको की खाने वाली समस्या दूर हो जाती है । सहकारी खेती के कृषक भरसक लगन व जाँच करते है | और इस प्रकार धीरे धीरे हर वर्ष कृषि में लाभ होने के चांस बढ़ जाते है |

(2).रोजगार अवसरों में वृद्धि – इसमें एक लाभ यह भी है की कृषक को अपनी खेती में ही कामकरने का मौका मिल जाता है | जो बेरोजगारी में सहायक होती है |क्योंकि जब जो छोटे कृषक बैठे रहते थे उन्हें भी सहकारी खेती के निर्माण कार्य जैसे नाली , मेड़बंदी , फसल का बोना , जुताई आदि में काम करने का मौका मिलेगा |

(3) लाभकारी जोतों का अन्त – कृषि में उपविभाजन(subdivision) एवं अपखण्डन (fragmentation)की विषम समस्या है, यदि सहकारी कृषि को प्रोत्साहन(Incentive) मिलता है, तो छोटे-छोटे भूमि(Earth) के टुकड़े एक बड़े खेत के आकार में स्वतः(automatically) हो जाते हैं। अतः इस सहकारी कृषि उपविभाजन (subdivision)एवं अपखण्डन को एक बड़े खेते के आकार में पुनः हो जाते हैं। अतः सहकारी कृषि -अलाभकारी जोतों ही एकमात्र इसका हल है।

( 4 ) नवीन तकनीक का उपयोग सहकारी खेती को नवीन पद्धति के तकनीक का प्रयोग द्वारा आधुनिक (Modern) उपकरणों, कृषि यंत्रों(agricultural machinery) व नवीन कृषि पद्धति का उपयोग करने लगती हैं। नवीन कृषि पद्धति से उत्पादन अधिक लाभ होता है।

( 5 ) विपणन सुविधाएँ(marketing features) – सहकारी खेती या कृषि में विपणन की समस्यों से मुक्ति मिल जाती है, किसान को सुविधा हो जाती है बिचौलियों की धोखेबाजी से, क्योंकि सहकारी क्रय समितियाँ उत्पादन का विपणन(marketing features) स्वयं करती हैं, जिससे उन्हें सही फसल का उचित मूल्य मिलता है। अब भारत में इसे कृषि समितियाँ जो मण्डी के रूप में कृषकों की समस्याएँ दूर कर रही हैं।

( 6 ) कृषि नियोजन (planning)- वर्तमान युग में नियोजन(planning) का युग है, इस प्रकार में सरकार के नए नियोजन तरीको से कृषि करने में सहयोगी बनना चाहता है |परन्तु इस सहकारी खेती के अभाव(Lack) में कृषि planning पूर्णतः असफल(fail) सिद्ध हुआ है।

(7) परस्पर सहयोग एवं सद्भाव- कृषकों में परस्पर(mutual) सद्भाव(harmony) एवं सहयोग के लिए सहकारी खेती एक वरदान है, जिसमें कृषक भूमि(earth) को स्वयं एक बड़ा खेत(field) बनाते हैं। परिणामस्वरूप(the resulting) कृषकों की ऐसी लड़ाइयाँ(fight) जो मेड़बन्दी(piling), पानी की नालियों, भूमि पर अवैध(Illegal) कब्जा आदि को लेकर पनपती हैं, सदैव के लिए समाप्त(finish) हो जाती हैं। अतः कृषक एक दूसरे के सुख-दुख(joy and sorrow) में भागीदार रहते हैं। इस प्रकार सहकारी खेती(cooperative farming) से कृषकों में मिल-जुल(together) कर रहने की आदत पड़ जाती है।

( 8 ) जोखिम में कमी- सहकारी खेती(cooperative farming) में जोखिम सामूहिक होता है। यदि कृषकों ने सहकारी सामूहिक कृषि पद्धति(methodology) अपनाई है, तो आकस्मिक कोष(contingency fund) से धन प्राप्त हो जाता है अथवा सहकारी खेती से वित्तीय(financial) सुविधा भी मिल सकती है जबकि व्यक्तिगत(Individual) खेती में जोखिम अधिक होता ळे, क्योंकि सम्पूर्ण जोखिम(risk) व्यक्तिगत(Individual) रहता है।

सहकारी कृषि और सामूहिक कृषि में अंतर

सहकारी कृषि में जब कृषको को अधिक लाभ लेना या कमाने की सोच हो रही हो तो इस अवस्था में सहकारी खेती की संस्था बनाकर के किये गए कार्य को सहकारी खेती कहते है ,और जब समूह में कृषि की जाती है तो उसको सामूहिक कृषि कहते है |

सहकारी कृषि कहां होती है?

भारत के कई राज्यों में खेती की जाती है अधिक जानकारी के लिए नजदीकी कृषि अधिकारी से संपर्क करे|

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सहकारी खेती से सम्बंधित कुछ प्रसन जो गूगल पर पूछे जाते है –

सहकारी कृषि से आप क्या समझते हैं?

सहकारी कृषि में जब कृषको को अधिक लाभ लेना या कमाने की सोच हो रही हो तो इस अवस्था में सहकारी खेती की संस्था बनाकर के किये गए कार्य को सहकारी खेती कहते है|


भारत में कितने सहकारी समितियां हैं?

भारत में लगभग 8 लाख कर्मचारी कार्य कर रहे है , सहकारी समिति में |

सहकारी खेती कब शुरू हुई थी?

भारत में सहकारिता का इतिहास लगभग 100 वर्ष पुराना है परन्तु 1947 के बाद फिर से सुरु हुआ |

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