सरसों की खेती(mustard farming): से 5 गुना तक का लाभ (Benefits)


सरसों की खेती : (Sarson ki kheti )सरसों, खेती, बीज, उन्नतशील प्रजातियाँ, उर्वरक, खरपतवार, कीट नियंत्रण, सिंचाई, रोग नियंत्रण, फसल कटाई, फसल भण्डारण, खाद, प्रौद्योगिकी, हाइब्रिड, पायनियर, उत्पादन, राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश|


भारत में सरसों की खेती (sarso ki kheti) एक प्रमुख फसल है, जो खेती क्षेत्र में बड़े(Big field ) पैमाने पर की जाती है। सरसों की खेती साल के अधिकतर महीनों में की जा सकती है, लेकिन सर्दियों में- इसकी खेती ज्यादा की जाती है। सरसों के तेल के लिए खेती सर्वोत्तम विकल्प है, लेकिन इनके साथ भी अन्य उत्पादों जैसे कि- मक्का, चावल और गेंहू के साथ संयुक्त फसल भी हो सकता है।

सरसों की खेती (Sarson ki kheti ) के लिए अच्छी मिट्टी की आवश्यकता होती है , जो अधिक मात्रा में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, और पोटैशियम जैसे – पोषक तत्वों से भरी होती है। सरसों की उन्नत खेती के लिए खाद का अनुपात उत्तम होना चाहिए जिसे 30:60:60 या 40:60:60 के अनुपात में मिलाया जा सकता है।

सरसों की खेती के लिए सही जलवायु(sesion) भी आवश्यक होता है। सरसों के लिए सबसे मुख्या जलवायु ठंडा और शुष्क होता है। यह फसल उष्णकटिबंधीय होती है, इसीलिए जलवायु के अनुसार बीज बोने के समय का चयन करना भी महत्वपूर्ण

Table of Contents

भारत में सरसों की खेती कितने प्रकार की होती है


सरसों एक बहुवर्षीय तथा सदाबहार पौधा होता है , जो दक्षिण एशिया में उगाया जाता है। विभिन्न प्रकार के सरसों होते हैं, लेकिन भारत में दो प्रकार (Two types) के सरसों की खेती की जाती है।

1 — पीली सरसों जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान और मध्य प्रदेश में उगाई जाती है। इस प्रकार के सरसों के तेल का उपयोग खाना पकाने में तथा तेल बनाने में किया जाता है।

2 — इसमें भूरा दाने होती है। इसे मसालों तथा तेल बनाने के उद्देश्य से उगाया जाता है। भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में, इस प्रकार के Sarson ki kheti की जाती है।
इस तरह, भारत में दो प्रकार के सरसों की खेती की जाती है, तोरिया सरसों और सरसों का भूरा दाने ।

कितने प्रकार के बीज होते है और सबसे बेस्ट वाला कौन होता है

सरसों के बीजों की विभिन्न प्रजातियां होती हैं। भारत में अधिकतर सरसों के बीज( sarso ki kheti )

1 -भूरा दाने ( brown color ) और 2 – पीला दाने (yellow color) वाले होते हैं। इनमें से भूरा दाने ( brown color) के बीज सबसे अधिक उपयोग में लाए जाते हैं।

ओर, सरसों के बीज का चुनाव खेती के उद्देश्यों पर निर्भर करता है। अगर आप सरसों की खेती से तेल निकालने के लिए बीज लगा रहे हैं, तो भूरा दाने ( brown color
) के बीज सबसे अच्छे होते हैं। ये बीज तेजी से उगते हैं ,और अधिक मात्रा में तेल उत्पादन करते हैं।

अगर आप Sarson ki kheti से मसाले के उद्देश्यों के लिए बीज लगा रहे हैं, तो पीला दाने के बीज सबसे अच्छे होते हैं। ये बीज खाने में स्वादिष्ट होते हैं, और मसालों के निर्माण में उपयोगी होते हैं।

इसीलिए, सरसों की खेती के उद्देश्यों पर निर्भर करके बीज का चुनाव करना जरुरी होता है। लेकिन ज्यादातर किसान भूरे दाने के बीजों का उपयोग तेल उत्पादन के लिए करते हैं।

भारत में सरसों की बुवाई

सरसों की बुवाई को ध्यान में रखते हुए, यह महत्वपूर्ण होता है,- कि आप इस काम को उचित तरीके से करें। सरसों की बुवाई के लिए समय बहुत महत्वपूर्ण होता है, इसलिए आपको समय पर बुवाई करनी चाहिए। सरसों की खेती बुवाई की समय सीमा अक्टूबर से नवंबर के महीनों तक होती है।

अगर आप सरसों की बुवाई करने के लिए तैयार हैं, तो आपको सबसे पहले खेत को अच्छी तरह से तैयार करना होगा। खेत को छिटकारा दिलाने के लिए आपको बिजाई के बाद खेत को एक बार फिर से धुलाना होगा। इसके बाद, आप एक गड्ढे में दो-तीन बीज रख सकते हैं। याद रखें, आपके बीजों को खेत के दायें और बायें भाग में समान रूप से बांटना होगा।

सरसों की बुवाई के बाद, आपको खेत को अच्छी तरह से पानी देना चाहिए। आपको खेत में पानी देने के बारे में सावधानी से सोचना चाहिए, जिससे कि आपके बीजों को नुकसान न हो।

सरसों की उन्नतशील प्रजातियाँ

सरसों की उन्नतशील प्रजातियों में से कुछ प्रमुख निम्नलिखित हैं:

1. ह्यानोलो डिप (Hylono Dip):- यह भारत में सरसों की खेती के लिए सबसे लोकप्रिय उन्नतशील प्रजाति में से एक है। इस प्रजाति का विशेषता है ,कि इससे उत्पादन में अधिकतम उन्नति होती है। इसके अलावा, यह प्रजाति सूखे और ठंडे मौसम के लिए उपयुक्त है।

2. टी.टी.एस. 36 (TTES 36):- यह उन्नतशील प्रजाति दिल्ली और हरियाणा जैसी -उत्तरी राज्यों में उत्पादित की जाती है। इस प्रजाति का उत्पादन बहुत अधिक होता है ,और यह बीमारियों से मुक्त होता है।

3. आर.एस. 2 (RS2):- यह उत्तर प्रदेश और बिहार जैसी उत्तरी राज्यों में उत्पादित की जाती है। इस प्रजाति के बीज छोटे होते हैं, और उत्पादन अधिक होता है। इसके अलावा, यह प्रजाति अधिकतर क्षेत्रों में लगाई जा सकती है।

4. परगटोरा 2 (PG2):- यह उन्नतशील प्रजाति बिहार, उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसी राज्यों में उत्पादित की जाती है।

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सरसों के लिए जलवायु और भूमि की आवश्यकता

सरसों की उन्नतशील प्रजातियों को उगाने के लिए उचित जलवायु और भूमि की आवश्यकता होती है। सरसों एक ऊष्ण कटिबंध फसल होती है, जो गर्म और खुशक मौसम में अधिक उत्पादक होती है। इसलिए, सरसों की खेती के लिए समय पर बरसात व मात्रा में उपलब्ध पानी आवश्यक होता है।

सरसों के लिए उपयुक्त भूमि मानव निर्मित और संरक्षित भूमि होनी चाहिए। भूमि का अच्छा ड्रेनेज और अच्छी खाद पोषण उत्पादकता को बढ़ाते हैं। सरसों को उगाने से पहले, भूमि का पीएच का स्तर, उपलब्ध खनिजों की मात्रा और समृद्धता जैसे प्रमुख पैरामीटर निर्धारित करने की जरूरत होती है।

इसके अलावा, भूमि को समृद्ध खादों से पोषण देना भी अत्यंत आवश्यक होता है। सरसों के लिए मुख्य खाद में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम शामिल होते हैं। समृद्ध खाद के लिए अच्छी खाद या फर्टिलाइजर का उपयोग किया जा सकता है।

भूमि की तैयारी

भूमि की तैयारी- सरसों की उन्नतशील प्रजातियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। सरसों की खेती के लिए समृद्ध और उपयुक्त भूमि का चयन करना जरूरी होता है। इसके लिए निम्न तरीके का उपयोग किया जा सकता है-

1. समय पर खेत की तैयारी करें :- सरसों की खेती के लिए खेत की तैयारी समय पर करना बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए खेत को अच्छी तरह से खुरदरा करना चाहिए ताकि वह समृद्ध और उपयुक्त हो सके।

2. खाद का उपयोग करें -: समृद्ध खाद सरसों की उन्नतशील प्रजातियों के लिए बहुत जरूरी होता है। खेत में खाद डालने से पहले उसमें निम्नलिखित खनिजों की मात्रा की जांच की जानी चाहिए| नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम। खेत के लिए उचित खाद या फर्टिलाइजर का उपयोग करना चाहिए।

3. समय पर बरसात हो या सिचाई करें: सरसों की खेती में अच्छी बरसात की आवश्यकता होती है। समय पर बरसात न होने की स्थिति में, किसी अन्य स्रोत से पानी उपलब्ध कराया

ज्यादा जानकारी के लिए आप official website जा सकते है |

बीज रेट (price)

बीज कीमत आमतौर पर विभिन्न कारणों के आधार पर अलग-अलग होती है। बीज के प्रकार, गुणवत्ता, वितरण क्षेत्र, और वर्तमान बाजार की स्थिति आदि, बीज कीमत के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सरसों की उन्नतशील प्रजातियों के लिए बीज की कीमत आमतौर पर 150 से 200 रुपये प्रति किलो तक होती है।

बीज कीमत को ध्यान में रखते हुए सभी आवश्यक तत्वों को ध्यान में रखना चाहिए, जैसे कि- उत्पादन और वितरण के लागत, उत्पादकों के साथ तैयारियों के आधार पर समझौते, और बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए, बीज की आपूर्ति नियंत्रित करना चाहिए।

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बीज का शोधन (जाँच )

बीज का शोधन एक विशेष प्रक्रिया है, जिसमें असामान्य बीजों के रूप में पहचाना जाने वाला बीज या फिर नुकसान प्रभावित बीजों को अलग कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में बीजों के वजन, आकार, रंग, विविधता आदि की जांच की जाती है।

बीज का शोधन कई तरह से किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में सम्पूर्ण बीजों को साफ किया जाता है, ताकि अधिक संभवतः उनमें से उत्तम बीजों का चयन किया जा सके। यह सुनिश्चित करने के लिए कि संपूर्ण बीजों को शुद्ध और संयोजित रूप में रखा गया है ताकि उन्हें सही ढंग से पहचाना जा सके।

बीज का शोधन समय-समय पर आवश्यक होता है-, क्योंकि उनके संग्रह व वितरण में धीमी गति से कुछ न कुछ खराबी होती रहती है। इसलिए, उत्पादकों को नियमित रूप से बीजों के शोधन की आवश्यकता होती है, ताकि उन्हें सबसे उत्तम प्रदर्शित किया जा सके, और अधिकतम उत्पादकता हो सके।

सरसों के फसल में सिंचाई

फसल में सिंचाई उस प्रक्रिया को कहते हैं– जिसमें पौधों को जल भरपूर दी जाती है। समय पर उचित मात्रा में सिंचाई करने से पौधों की वृद्धि होती है, और उनमें पोषक तत्वों का समग्र विकास होता है। सिंचाई एक महत्वपूर्ण कृषि तकनीक है, जो सुनिश्चित करती है ,-कि फसल में पानी का संतुलित वितरण होता है, और उसे पूरे मौसम तक उपलब्ध रखा जा सकता है।

सरसों की खेती में सिंचाई करने से फसल की वृद्धि तेजी से होती है और उसमें पोषक तत्वों का समग्र विकास होता है। सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता के साथ-साथ फसल के विभिन्न अंगों की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। एक समझौता के रूप में, समय-समय पर सिंचाई की आवश्यकता अधिकतम मात्रा में होती है।

सिंचाई की प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए, फसल में सिंचाई के लिए विभिन्न तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है, जिनमें समझौता आधारित सिंचाई, बूंद बूंद सिंचाई, सब्सूरब सिंचाई, सुखाना आदि |

खाद और उर्वरकों का प्रयोग

खाद और उर्वरक पौधों के समृद्ध विकास के लिए एक महत्वपूर्ण घटक हैं। खाद और उर्वरकों के उपयोग से पौधों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार पोषण मिलता है।

खाद एक प्रमुख पोषण तत्व है, जो पौधों को प्राकृतिक रूप से पोषण प्रदान करता है। खाद के उपयोग से पौधे विभिन्न पोषक तत्वों को अवशोषित कर सकते हैं, जो पौधे के विकास के लिए आवश्यक होते हैं। खाद को उचित मात्रा में प्रयोग करने से पौधों के साथ साथ भूमि की उर्वरता भी बनी रहती है।

खाद और उर्वरकों के उपयोग से पौधों को उनकी आवश्यक

खरपतवार का नियंत्रण

खरपतवार सरसों की खेती में एक महत्वपूर्ण समस्या होती है। खरपतवार एक प्रकार का कीट होता है जो पौधों के उत्पादन को कम कर सकता है।

खरपतवार का नियंत्रण करने के लिए कुछ उपाय हैं। प्रथम— उपाय है, खेत में स्प्रे करना। इसके लिए निम्न चरणों का पालन करें:

1. स्प्रे करने से पहले खरपतवार के प्रकार की जाँच की जानी चाहिए।

2. स्प्रे के लिए उचित रसायन का चयन करें।

3. स्प्रे करने से पहले खेत को उचित तरीके से साफ करें।

4. स्प्रे करने के बाद पौधों को सम्पूर्ण रूप से सुखा दें।

दूसरा —उपाय है, जैविक खेती का अनुपालन करना। जैविक खेती करने से खरपतवार का प्रकोप कम होता है और पौधों का स्वस्थ विकास होता है।

तीसरा उपाय— है, प्राकृतिक रूप से खरपतवार के नियंत्रण के लिए उपयोग की जाने वाली कुछ वनस्पतियों को लगाना। ये वनस्पतियाँ खरपतवार के नियंत्रण में मदद करती हैं। इनमें नीम, प्याज, लहसुन, टमाटर, और मेथी आदि शामिल होते हैं।

फसल में लगने वाले रोगों का नियंत्रण

सरसों की खेती में फसल में लगने वाले रोगों से बचने के लिए निम्न उपाय हो सकते हैं:–

1. फसल के नियमित जाँच का पालन करें: सरसों की फसल को नियमित रूप से जाँचने से फसल में लगने वाले रोगों का जल्द से जल्द पता चलता है और उनसे बचाव की जा सकती है।

2. उन्नत विकासशील प्रजातियों का उपयोग करें: उन्नत विकासशील प्रजातियों का उपयोग करने से फसल में रोगों की संभावना कम होती है।

3. फसल को समय पर सिंचित रखें: सिंचाई का नियमित रूप से पानी देने से फसल में रोगों का प्रसार कम होता है।

4. उचित रूप से खाद दें: सरसों की खेती को उचित रूप से खाद देने से फसल मजबूत होती है और रोगों का प्रसार कम होता है।

5. रोगों से प्रभावित पौधों को नष्ट करें: अगर फसल में किसी भी प्रकार का रोग फैल जाता है, तो संक्रमित पौधों को नष्ट कर देना चाहिए।

6. रोगों के लिए रसायनों का उपयोग करें: यदि कोई रोग फैल जाता है तो रोगों के लिए उपयोग की जान

फसल में कीट की रोकथाम

फसल में कीटों की रोकथाम बहुत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इनके हमले से फसल नुकसान पहुंचता है, और उत्पादकता कम हो जाती है। कीटों के विषय में अच्छी जानकारी और उचित समझ उन्हें रोकने के लिए बहुत आवश्यक होती है।

एक तरीका है, कीटनाशकों का इस्तेमाल करना, जो खेत में फसल के प्रकार और कीटों के प्रकार के अनुसार उपलब्ध होते हैं। उन्हें उचित मात्रा में और समय पर लगाना चाहिए ताकि कीटों को रोका जा सके। लेकिन, इन कीटनाशकों का उधम ज्यादा होने से फसल के साथ-साथ धरती, पानी और वातावरण पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।

इसलिए, बेहतर है, कीटों को रोकने के लिए प्राकृतिक तरीकों का उपयोग करें। इसमें खेत में प्राकृतिक नियंत्रण उपकरणों जैसे– कीट-नाशक नमक, विवेक, नीम तेल और दीमक नाशक जैसी उपयोगी चीजें होती हैं। इन तत्वों का इस्तेमाल करने से कीटों का प्रभाव कम होता है, और फसल में नुकसान कम होता है।

सरसों की खेती में कौन सा खाद (compost) डालें

सरसों की खेती में उपयोगी खाद के बारे में जानकारी होना बहुत जरूरी है। सरसों की खेती के लिए मुख्य तौर पर तीन प्रकार की खाद का उपयोग किया जाता है–

1. जैविक खाद–: जैविक खाद संश्लेषित खेती के अनुसार आमतौर पर उपयोग की जाती है। इसमें गोबर, खाद और फसल के अवशेष शामिल होते हैं। जैविक खाद से सरसों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार सम्पूर्ण पोषण मिलता है।

2. रासायनिक खाद:– रासायनिक खाद के उपयोग से सरसों की खेती में उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। इसमें उर्वरक शामिल होते हैं , जो खेत में डाले जाते हैं, और खेत की मिट्टी को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार पोषण प्रदान करते हैं।

3. मिश्रित खाद:– सरसों की खेती के लिए एक और विकल्प मिश्रित खाद है। इसमें जैविक खाद और रासायनिक खाद का समन्वय किया जाता है, ताकि सरसों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार संपूर्ण पोषण मिल सके।

उत्तर प्रदेश में सरसों की खेती

उत्तर प्रदेश भारत का उत्तरी राज्य है, जहां सरसों की खेती एक मुख्य फसल है। यहां सरसों की खेती गर्मी की तटस्थ भूमि में अक्सर रबी मौसम में की जाती है। उत्तर प्रदेश में सरसों की खेती की शुरुआत अक्टूबर के अंत या नवंबर के पहले हफ्ते में की जाती है, ताकि इसे गर्मियों के आने से पहले पूरा कर लिया जा सके।

सरसों की बुआई उत्तर प्रदेश में नवंबर के अंत या दिसंबर के पहले हफ्ते में की जाती है। बीज की मात्रा आवश्यकतानुसार उपयुक्त खेती उपज की गुणवत्ता के लिए जरूरी होता है। बुआई के बाद, पहली चार सप्ताहों में समय-समय पर सिंचाई करना जरूरी होता है, ताकि उगाई गई पौधे अच्छी तरह से विकसित हो सकें।

उत्तर प्रदेश में सरसों की उन्नत तकनीकों का उपयोग किया जाता है, जो उत्पादकता में वृद्धि करते हैं। उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में सरसों की खेती के लिए जल संरचनाएं उपलब्ध होती हैं, जो समृद्ध उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण

है |

सरसों की खेती राजस्थान

राजस्थान राज्य में सरसों की खेती एक मुख्य धान्य फसल है। राजस्थान में सरसों की उन्नत – तकनीकों के अनुसार खेती की जाती है, जो फसल के उत्पादकता में वृद्धि होती है।

सरसों की खेती के लिए राजस्थान में सबसे उपयुक्त समय अक्टूबर के आखिरी सप्ताह से नवंबर के पहले सप्ताह तक होता है। इस समय तापमान 20-25 डिग्री सेल्सियस होता है, जो सरसों के बेहतर उगने के लिए उपयुक्त होता है।

खेत की तैयारी के लिए, खेत को गहराई से जोतना चाहिए और अच्छी तरह से ढाल बनानी चाहिए। सरसों की खेती के लिए, खेत में कम से कम दो बार सिंचाई करनी चाहिए। उचित सिंचाई से फसल की उत्पादकता वृद्धि होती है और फसल को कुछ रोगों से भी बचाया जा सकता है।

फसल के लिए उचित खाद भी बोना जाना चाहिए। राजस्थान में सरसों की खेती के लिए मलखंडी, निम्बू का खाद, नाइट्रोजन, पोटाश, फोस्फेट आदि खाद का उपयोग किया जाता है। इन खादों को फसल की वर्षा से पहले खेत में

राजस्थान में सरसों की किस्म

राजस्थान भारत का राज्य है , जो पश्चिमी भारत में स्थित है। राजस्थान एक बड़ा राज्य है , जो विभिन्न जलवायु वाले क्षेत्रों में विभाजित है। इसलिए, राजस्थान में सरसों की खेती की कुछ विशेषताएं हो सकती हैं।

राजस्थान में सरसों की खेती मुख्य रूप से खरीफ मौसम में की जाती है। सरसों की खेती के लिए उपयुक्त मौसम 15-20 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है। साथ ही, सरसों की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी का तापमान 10-15 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए।

राजस्थान में सरसों की खेती के लिए अधिकतर जलवायु सूखे से ग्रसित होते हैं, इसलिए समुचित बुवाई के बाद सरसों को समय-समय पर सिंचित करना आवश्यक होता है।

राजस्थान में सरसों की खेती के लिए प्रायः– एक जगह से दूसरी जगह बीज लाने की आवश्यकता होती है। अत: उचित विशेषज्ञ सलाह लेकर उत्तम गुणवत्ता के बीजों का चयन करना चाहिए।

अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए कब (time) करें सरसों की बुवाई

सरसों की बुवाई के लिए सही समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए सरसों की बुवाई का समय अप्रैल महीने के अंत या मई के पहले सप्ताह में किया जाना चाहिए। इस समय पर भूमि थोड़ी गर्म होती है और जलवायु सही होता है।

बीज की बुवाई के लिए सबसे पहले खेत को तैयार करना होता है। इसके लिए खेत को कांटेदार बनाना चाहिए ताकि पानी बिना रुकावट के निकल सके और बीज अच्छी तरह से बिछा जा सके।

बुवाई के समय बीजों की मात्रा का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है। सामान्यतः, सरसों के लिए 3 से 4 किलो बीज प्रति एकड़ बुवाई की जाती है। बीज को बुवाई के बाद धीरे-धीरे फैलाया जाना चाहिए ताकि उसमें समान मात्रा में बीज हों।

बुवाई के बाद खेत को अच्छी तरह से सिंचाई दी जानी चाहिए ताकि बीजों को ताजगी मिल सके और उनमें उगने की शक्ति बनी रहे। बुवाई के बाद 10 से 12 दिनों में बीज अच्छी तरह से अंकुरित हो जाते हैं

पंजाब में सरसों की फसल की खेती

पंजाब एक ऐसा राज्य है, जहां सरसों की फसल का विस्तार बहुत ज्यादा होता है। यहां सरसों की खेती वास्तव में एक लाभदायक व्यवसाय है, जो कि अन्य फसलों की तुलना में कम निवेश के साथ अधिक मुनाफा देता है।

पंजाब में सरसों की खेती बहुत विस्तृत रूप से की जाती है। इसकी – खेती अक्सर रबी मौसम में की जाती है, जो नवंबर से फरवरी के बीच तक चलता है। इसके लिए जमीन को गर्म रखने के लिए बहुत सारी तैयारियां की जाती हैं।

अधिकतर किसान यह वर्ष में एक या दो बार सरसों की खेती करते हैं। सरसों की बुआई समय पर होनी चाहिए ताकि उत्पादकता में कोई कमी न हो। सरसों की फसल में नियमित रूप से पानी देने की आवश्यकता होती है, लेकिन अत्यधिक पानी सरसों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। फसल में उपयुक्त मात्रा में खाद और उर्वरकों का उपयोग किया जाना चाहिए।

पंजाब में सरसों की फसल कटाई फरवरी और मार्च के बीच होती है।

हाइब्रिड सरसों की खेती

हाइब्रिड सरसों की खेती को लेकर वर्तमान में कई किसान उन्नत तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। हाइब्रिड सरसों का उत्पादन बीजों के माध्यम से किया जाता है जो उत्पादन दर को बढ़ाते हैं ,और उत्पादकता में वृद्धि करते हैं। ये बीज ज्यादातर उन्नत तकनीकों के साथ विकसित किए गए होते हैं, जो बीमारियों और कीटों से लड़ने की शक्ति में उन्नति लाते हैं।

हाइब्रिड सरसों की खेती के लिए किसानों को निम्न ध्यान रखना चाहिए।

1. बीज चुनाव: हाइब्रिड सरसों की खेती के लिए सही बीज चुनना अत्यंत आवश्यक होता है। किसानों को उत्पादकता और रोग प्रतिरोधी बीजों का चयन करना चाहिए।

2. जलवायु: सरसों की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु मानदंड शुष्क और ठंडी जलवायु होता है। इससे उत्पादकता बढ़ती है।

3. भूमि: सरसों की खेती के लिए मिट्टी में उपजाऊ तत्वों की अधिकता होनी चाहिए। जमीन का पीएच और खाद की मात्रा सही होनी चाहिए।

भारत मे काली सरसों की बुवाई का समय

काली सरसों की खेती की बुवाई अक्टूबर के मध्य तक की जानी चाहिए। इसे बारिश के बाद की दो या तीन दिनों में करना चाहिए। इससे पहले जमीन की तैयारी की जानी चाहिए, जिसमें जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए खाद दी जाती है। बुवाई के समय बीजों की बोवा जमीन के साथ अच्छी तरह से मिलाने की जरूरत होती है, ताकि बीज अच्छी तरह से उग सकें। बुवाई के बाद सरसों की देखभाल और पानी देने का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक होता है।

60 दिन में पकने वाली सरसों का खेती

60 दिनों में पकने वाली सरसों को तेजी से विकसित किया गया है ,-ताकि फसल की पैदावार बढ़ाई जा सके। इस प्रकार की सरसों के बीज पहली बार 2009 में विकसित किए गए थे। यह वैज्ञानिक रूप से तैयार किए गए बीज हैं, जो पहले से ही जलवायु एवं भूमि की आवश्यकताओं के अनुसार बनाए जाते हैं। इस तरह के बीज फसल की उचित देखभाल और सही समय पर बुवाई के साथ ही अच्छी पैदावार देते हैं।

इस प्रकार की सरसों की खेती को उन्नत तकनीक से उत्पादित किया जाता है ,जो फसल के सभी पहलुओं पर प्रभाव डालती है। इन बीजों का इस्तेमाल करने से पहले ध्यान देने वाली बात है , कि ये समय से पहले पकते हैं, इसलिए इनकी उन्नत तकनीक से बुवाई और समय पर ही उपज को फायदा पहुंचाया जा सकता है।

इस प्रकार के बीजों का उपयोग करके पूरे देश में अधिक मात्रा में सरसों उत्पादित किया जा रहा है। इन बीजों की सफलता ने किसानों की आय को बढ़ाया है और उन्हें एक अधिकतम उत्पादक फसल कहलाती है |

पायनियर सरसों की पैदावार क्यों अधिक होती है ?

पायनियर सरसों नाम का एक उच्च उत्पादक है, जो उत्तर भारत में सरसों की खेती खेती की जाती है। यह सरसों की प्रजाति उत्तम उत्पादकता, उच्च बीज उत्पादन और उच्च तनाव प्रतिरोध की विशेषताओं के कारण लोकप्रिय है।

पायनियर सरसों की पैदावार दूसरी सरसों की पैदावार से काफी अधिक होती है। यह सरसों का उत्पादन विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता है,- जिसमें पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र शामिल हैं।

पायनियर सरसों का उत्पादन वर्षा के दौरान होता है। इसे सामान्यतः अक्टूबर या नवंबर में बोया जाता है और फिर मार्च या अप्रैल में काटा जाता है। पायनियर सरसों की पैदावार बीस से तीस प्रतिशत तक हो सकती है , जो उत्तम होती है। इस प्रजाति के बीज विशेष रूप से उत्पादक होते हैं , और इन्हें निरंतर उन्नत किया जाता है।

पायनियर सरसों की खेती में समय-समय पर खाद देना, सिंचाई करना, रोगों और कीटों का नियंत्रण करना, और देखरेख करना आवश्यक है |

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फसल की कटाई और भण्डारण का समय

फसल की कटाई एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है,- जो सही समय पर की जानी चाहिए। सरसों की फसल को कटाई के लिए उसकी पत्तियों और डालियों के पकने के समय का ध्यान रखना चाहिए। सामान्यतः सरसों की फसल कटाई के लिए 120 से 150 दिनों का समय लगता है। जब सरसों की फसल पक जाए, तब उसे काट लेना चाहिए।

फसल की कटाई के बाद- उसे उगाया जा सकता है , और उसे भंडारित किया जा सकता है। सरसों को भंडारित करने के लिए, स्टैक या सांचे में संग्रहीत किया जा सकता है। स्टैक में सरसों को धूप में सुखाया जाता है, और फिर उसे संग्रहीत किया जाता है। सांचे में सरसों को संग्रहीत करने से पहले उसे सुखा देना चाहिए।

फसल की भंडारण के लिए, स्टैक या सांचे को साफ-सफाई रखना चाहिए और उन्हें तंदुरुस्त रखना चाहिए। सरसों को ठंडे स्थानों पर रखना चाहिए जहाँ उन्हें भाप नहीं लगता है। फसल की भंडारण के दौरान, सरसों की नमी नियंत्रित रखने के लिए ध्यान देना चाहिए।

फसल की उपज

जब फसल पूरी तरह से पक जाती है, तब उसकी कटाई की जाती है। सरसों की फसल को कटाने का सही समय उसके फूलने के समय के बाद होता है। सरसों की फसल रुखे और टोकरी में कटाई की जाती है , और उसके बाद उसे सुखा दिया जाता है।

फसल के भंडारण के लिए एक स्थान तैयार किया जाता है, जिसमें फसल को स्टोर किया जाता है। यह स्थान सुखा होना चाहिए , और कीटाणुओं और चूहों से दूर होना चाहिए। इसके अलावा, फसल की बिक्री के लिए भी उसे सही तरीके से भंडारित किया जाना चाहिए।

अच्छी सरसों की फसल से उचित देखभाल करने, उसमें उपयुक्त मात्रा में जल से लेकर उर्वरकों तक का उपयोग करने, और सही समय पर कटाई और भंडारण करके एक अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है। सरसों की खेती एक लाभदायक व्यवसाय हो सकती है , जो धैर्य और समझदारी से किया जाता है।

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सरसों की बुवाई कब करें?

सरसों की बुवाई सुरुवाती अक्टूबर से लास्ट अक्टूबर तक कर सकते है |

सरसों की बुवाई कैसे करें?

सरसों एक बहुवर्षीय तथा सदाबहार पौधा होता है , जो दक्षिण एशिया में उगाया जाता है। विभिन्न प्रकार के सरसों होते हैं, लेकिन भारत में दो प्रकार (Two types) के सरसों की खेती की जाती है।

1 — पीली सरसों जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान और मध्य प्रदेश में उगाई जाती है। इस प्रकार के सरसों के तेल का उपयोग खाना पकाने में तथा तेल बनाने में किया जाता है।

2 — इसमें भूरा दाने होती है। इसे मसालों तथा तेल बनाने के उद्देश्य से उगाया जाता है। भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में, इस प्रकार के सरसों की खेती की जाती है।
इस तरह, भारत में दो प्रकार के सरसों की खेती की जाती है, तोरिया सरसों और सरसों का भूरा दाने ।

1 एकड़ में सरसों कितना होता है?

1 एकड़ में सरसों की उपज लगभग 14 से 16 कुंतल तक प्राप्त हो जाती है |

Conclusion

इस तरह से कहा जाए तो, सरसों की खेती भारत में एक महत्वपूर्ण फसल है। इसकी खेती करने से किसान बहुत लाभ उठा सकते हैं। उन्नत तकनीकों, उत्तम बीज, खाद, सिंचाई, रोग व पूँछकर्म नियंत्रण, और उचित प्रबंधन के माध्यम से एक उच्च उत्पादकता दर बनायी जा सकती है। इसलिए, सरसों की खेती के लिए सही तकनीक और प्रबंधन उद्योगी किसानों के लिए महत्वपूर्ण है।

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