सावां की उन्नतशील खेती:अद्वितीय तरीकों से बढ़ता किसान 2023

असिंचित क्षेत्रों में बोए जाने वाले मोटे अनाजों में साँवा का महत्वपूर्ण स्थान है। यह भारत की एक प्राचीन फसल है। यह सामान्यतः असिंचित क्षेत्रों में बोए जाने वाली सूखा प्रतिरोधी फसल है। इसमें पानी की आवश्यकता अन्य फसलों से कम होती है। हल्की नम और ऊष्ण जलवायु इसके लिए सर्वोत्तम होती है। सामान्यतः साँवा का उपयोग चावल के समान तरीके से किया जाता है। उत्तर भारत में साँवा की “खीर” बड़े चाव से खाई जाती है। पशुओं के लिए इसका बहुत उपयोग होता है। इसमें चावल की तुलना में अधिक पोषण तत्व पाए जाते हैं और इसमें पाई जाने वाली प्रोटीन की पाचन योग्यता सबसे अधिक (40 प्रतिशत तक) होती है।

मिट्टी:

सामान्यतः यह फसल कम उपजाऊ मिट्टी में बोई जाती है। इसे आंशिक रूप से जलाक्रांत मिट्टी जैसे नदी के किनारे की निचली भूमि में भी उगाया जा सकता है। परंतु इसके लिए बलुई दोमट और दोमट मिट्टी जिसमें पर्याप्त मात्रा में पोषण तत्व हो, सबसे उपयुक्त होती है।

खेत की तैयारी:

जुताई तथा दो-तीन जुताई हल से करके खेत को भली-भांति तैयार कर लेना अधिक पैदावार के लिए उपयुक्त होता है।

भूमि शोधन:

फसल को भूमि जनित रोगों से बचाने के लिए ट्राइकोडर्मा 2: डब्लू पी. की 2.5 किग्रा मात्रा प्रति हेक्टेयर 60-75 किग्रा गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छीटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखना चाहिए। दीमक, सफेद गिडार सूत्रकृमि, जड़ की सूण्डी, कटवर्म, आदि कीटों से बचाव हेतु ब्यूवेरिया बैसियाना बायोपेस्टीसाइड की 2.5 किग्रा मात्रा प्रति हेक्टेयर 60-75 किग्रा गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छीटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरांत बुवाई करना चाहिए।

मानसून के प्रारम्भ होने से पूर्व खेत की जुताई आवश्यक है, जिससे खेत में नमी की मात्रा संरक्षित हो सके। मानसून के प्रारम्भ होने के साथ ही मिट्टी पलटने वाले हल से पहली के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिलाना चाहिए।

बुवाई का समय:

साँवां की बुवाई का उत्तम समय 15 जून से 15 जुलाई तक होता है। मानसून के प्रारम्भ होने के साथ ही इसकी बुवाई कर देनी चाहिए। इसकी बुवाई छिटकवां विधि से या कूड़ों में 3-4 सेमी की गहराई में की जाती है। कुछ क्षेत्रों में इसकी रोपाई करते हैं। परंतु पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25 सेमी रखने से बुवाई लाभप्रद होती है। पानी के लगाव वाले स्थान पर मानसून के प्रारम्भ होते ही छिटकव विधि से बुवाई कर देना चाहिए और बाढ़ आने के संभावना से पूर्व फसल काट लेना श्रेयस्कर होता है।

बीज दर:

प्रति हेक्टेयर 8 से 10 किग्रा गुणवत्तायुक्त बीज प्रायप्त होता है।

                    पोषक तत्व की मात्रा (प्रत्येक 100 ग्राम में )

  फसलकार्बोहाइड्रेट (ग्राम)फसल प्रोटीन (ग्राम)वसा (ग्राम)कूड़ा फाइबर (ग्राम)लौह तत्व (ग्राम)कैल्शियम (मि.ग्रा.)फास्फोरस (मि.ग्रा.)
चावल6.878.20.50.20.610.0060.0
साँवा11.674.35.814.74.714.0121.0
Sawan ki Unnatsheel kheti 

सावां की उन्नतशील खेती प्रजाति

क्र. सं.प्रजातिपौधों की उपज (कुन्तल प्रति हे.)पकने की अवधि (दिवस में)पौधे की बालीलम्बाई (सेमी.)लम्बाई (सेमी.)पौधों का रंग
1.टी-46 उत्तर प्रदेश विशेष रूप से प्रचलित10-12-80-9014526-28हल्का भूरा रंग
2.आई.पी. – 14912-1374-80126-130हल्का भूरा रंग
3.यू.पी.टी. – 812-1483-88140-150हल्का भूरा रंग
4.आई.पी.एम-971065-67130-140हल्का भूरा रंग
5.आई.पी.एम-10010-1277-8688-88150-16214-17– हल्का भूरा रंग
6.आई.पी.एम – 14811-12-135-162हल्का भूरा रंग
सावां की उन्नतशील खेती प्रजाति

खाद और उर्वरक का उपयोग:

जैविक खाद का उपयोग हमेशा फायदेमंद होता है क्योंकि यह मिट्टी को आवश्यक पोषण तत्वों की आपूर्ति के साथ-साथ जल धारण क्षमता को भी बढ़ाता है। मॉनसून के बाद पहली बोने जाने वाले खेतों में 5 से 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से कॉम्पोस्ट खाद मिलाना फायदेमंद होता है। नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, और पोटाश की मात्रा 40:20:20 किग्रा प्रति हेक्टेयर के अनुपात में उपयोग करने से उत्पादन में बेहतर परिणाम मिलते हैं।

जब सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होती है, तो नाइट्रोजन की आधी मात्रा को टॉपड्रेसिंग के रूप में बोने जाने के 25-30 दिन बाद फसल में छिड़काव किया जाना चाहिए।

सिंचाई:

सामान्यतः साँवा की खेती में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन जब वर्षा लंबे समय तक रुक जाती है, तो फूल आने की स्थिति में एक बार सिंचाई की आवश्यकता हो सकती है। जल संकट की स्थिति में, पानी की निकासी का प्रबंधन अवश्य करना चाहिए।

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खरपतवार नियंत्रण:

बुवाई के बाद 30 से 35 दिनों तक खेत में खरपतवार की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। निराई-गुड़ाई द्वारा खरपतवार की नियंत्रण के साथ ही, पौधों की जड़ों में ऑक्सीजन का प्रवाह होता है, जिससे वे दूर तक फैलकर भोज्य पदार्थ एकत्र कर पौधों को पूर्ण करते हैं। आमतौर पर, दो निराई-गुड़ाई को
15-15 दिनों के अंतर से छिड़काव किया जाता है। पंक्तियों में बोए गए पौधों के निराई-गुड़ाई को हैंड-होवील से कर सकते हैं।

रोकथाम:

रोकथाम के लिए, मैंकोजेब 75 डब्लू.पी. को 2 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से खड़ी फसल में छिड़काव करना चाहिए।

कण्डुवा:

यह एक कवकजनित रोग है, जिसमें पूरी पौधों पर पीले धारियाँ उभरती हैं, जो बाद में सफेद हो जाती हैं और पत्तियाँ सूख जाती हैं। अधिक आक्रमण होने पर, पौधा अन्य पौधों से ऊंचा होता है।

फसल सुरक्षा: रोग:

तुलासिता:

यह एक कवकजनित रोग है। इसके प्रारंभिक आक्रमण में पत्तियों पर पीली धारियाँ उभरती हैं, जो बाद में सफेद हो जाती हैं और पत्तियाँ सूख जाती हैं। अधिक आक्रमण होने पर, बालियों को भूसीदार दिखाई देती हैं। इस स्थिति में, ग्रसित पौधे को नष्ट कर देना चाहिए और ध्यान देना चाहिए कि बीजों को उपचारित करने के बाद ही बोवाई की जाए, ताकि कवकजनित रोगों से फसल सुरक्षा हो सके।

रोकथाम:

रोग की रोकथाम के लिए, बीजों को बीजोपचार के बाद ही बोवाई की जानी चाहिए। बीजों को थिरम 75 प्रतिशत डब्लू.पी. या कार्बेंडाजिम 50 प्रतिशत डब्लू.पी. 2.5 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से शोधित करना चाहिए। ग्रसित पुष्प गुच्छों को सावधानीपूर्वक तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए।

रोग: रोकथाम:

बुवाई के पूर्व, क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत ई.सी. को 2.5 प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचाई के पानी के साथ प्रयोग करना चाहिए।

कीट:

मैंकोजेब 75 डब्लू.पी. या जीनेब 75 प्रतिशत डब्लू.पी. को 2 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से खड़ी फसल पर छिड़काव करना चाहिए।

कीट और कीट प्रबंधन:

दीमक और तना बेधक प्रमुख कीट हैं जो इसे प्रभावित करते हैं।

दीमक:

दीमक की कीट के नियंत्रण के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
1. खेत में कच्चे गोबर का उपयोग न करें।
2. बुवाई से पहले, बीज को शोधित करने के लिए 2.5 ग्राम प्रति किग्रा. क्लोरपाइरीफास की 3 प्रतिशत ई.सी. की दर से उपयोग करना चाहिए।
3. बायोपेस्टीसाइड के रूप में बैसियाना 1.15 प्रतिशत 2.5 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से खड़ी फसल में छिड़काव करना चाहिए।

इसे 8-10 दिनों तक छायां में रखने के बाद बुवाई के पूर्व आखिरी जुताई पर हलके पानी के साथ मिला देने से दीमक और अन्य भूमिजनित कीटों को नियंत्रित किया जा सकता है। खड़ी फसल में, क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत ई.सी. को 2.5 प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचाई के पानी के साथ प्रयोग करना चाहिए।

तना बेधक प्रमुख कीट पर उपाय:

कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत ग्रेन्यूल को 20 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए या क्यूनालफॉस 25 ई.सी. को 2 लीटर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

कटाई और मड़ाई:

पूरी तरह से पकी हुई स्थिति में, कटाई को पौधे की जड़ से हाथी की सहायता से की जानी चाहिए। इसे एक सप्ताह के लिए खेतों में सुखाने के बाद मड़ाई की जानी चाहिए।

उपज:

दाना: 12-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।

भण्डारण:

भण्डारण के पूर्व, बीजों को सुखा लेना चाहिए, ताकि उनमें नमी की मात्रा 10-12 प्रतिशत तक कम हो जाए। सुखाने के बाद, बीजों को थैलों में भरकर एक ऐसी जगह पर रखना चाहिए जहां वर्षा का पानी न जा सके और चूहों आदि कीटों का प्रकोप भी न हो।

मुख्य बिंदु:

• गर्मियों में जुताई करें।
• शोधित बीज का प्रयोग करें।
• जैविक खाद और उर्वरक का सही तरीके से उपयोग करें।
• पानी की निकासी का प्रबंधन करें।
• खरपतवार को नियंत्रित करें।
• फसल सुरक्षा का ध्यान रखें।

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