सिस्टम ऑफ राईस इन्टेंसीफिकेशन (एस.आर. आई.) 2023

प्रदेश में विद्यमान परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करके धान पैदावार बढ़ाने के लिए एक ऐसी प्रक्रिया की आवश्यकता है जिसे पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए निवेशों का दक्षतापूर्वक उपयोग करके कम लागत में अधिक से अधिक उत्पादकता प्राप्त की जा सके। वर्णित यह सभी खूबियां धान उत्पादन की एस.आर. आई. पद्धति में विद्यमान हैं।

एस.आर. आई. क्या है?

श्री पद्धति के नाम से प्रसिद्ध सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन, संक्षेप में एस.आर.आई. के रूप में जाना जाता है।, धान की एक ऐसी पद्धति है जिसमें मृदा उत्पादकता, जल उपयोग दक्षता, श्रम शक्ति एवं निवेशित पूंजी की दक्षता एक साथ बढ़ाने की क्षमता है। श्री पद्धति से उगाई गई फसल द्वारा परम्परागत विधि से उगाई गई फसल की अपेक्षा औसतन 10-30% अतिरिक्त पैदावार विभिन्न स्थानों पर प्राप्त की गई है।

श्री पद्धति के अन्तर्गत न केवल अतिरिक्त उपज प्राप्त होती है बल्कि 50% तक सिंचाई जल की बचत, 90% तक बीज की बचत, मृदा स्वास्थ्य में सुधार, 30-40% रासायनिक उर्वरक बचत, कम निवेशों के फलस्वरूप उत्पादन लागत में कमी का दावा किया जाता है। उक्त को सिर्फ़ अधिक उत्पाद प्राप्त करने का तरीका नहीं, बल्कि एक स्थायी उत्पादन प्रक्रिया के रूप में भी देखा जाता है, जैसे कि एस.आर. आई. पद्धति।

एस.आर. आई. पद्धति से धान की खेती

भूमि का चयन :

मध्यम एवं भारी भूमि जिनमें सिंचाई तथा जल निकास की उचित व्यवस्था हो, उपयुक्त है। श्री पद्धति अपनाने हेतु ऊसरीली, नई तोड़ वाली भूमि एवं निचले क्षेत्र जहाँ जल भराव की संभावना रहती है उपयुक्त नहीं है।

भूमि शोधन :

फसल को भूमि जनित रोगों से बचाने के लिए ट्राइकोडर्मा हारजियेनम 2% डब्लूपी. की 2.5 किग्रा.. मात्रा प्रति हेक्टेयर 60-75 किग्रा0 सड़ी हुई गोबर की सड़ी हुई खाद में मिलाकर हल्के पानी का छीटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त आखिरी जुताई के समय खेतों में मिला दें।

दीमक, सफेद गिडार, सूत्रकृमि, जड़ की सूण्डी, कटवर्म आदि कीटों से बचाव हेतु ब्यूवेरिया बैसियाना 1% डब्लूपी. बायोपेस्टीसाइड्स की 2.5 किग्रा0 मात्रा प्रति हेक्टेयर 60–75 किग्रा0 गोबर की सड़ी हुई खाद में मिलाकर8-10 दिन तक छाया में रखने के बाद, बुआई के पूर्व आखिरी जुताई के समय पूर्व बनाए गए हल्के पानी का छीटा भूमि में मिला देना चाहिए।

पोषक तत्व प्रबन्धन :

श्री पद्धति का लाभ जैविक ढंग से खेती करने पर अपेक्षाकृत अधिक पाया गया है। अतः खेत की तैयारी करते समय 15 टन गोबर / कम्पोस्ट खाद प्रति हैक्टेयर की दर से खेत में मिलायें । हरी खाद हेतु ढैचा की लगभग 45 दिन की फसल को पलट कर खेत में सड़ाने हेतु मिलाकर पानी भर दें । दैंचा सड़ने में लगभग 10 दिन का समय लगेगा। अतः उचित होगा कि जिस दिन ढचा पलटा जाये उसी दिन धान पौध तैयार करने हेतु नर्सरी डाल दी जाये।

नर्सरी तैयार करना :

श्री पद्धति के अन्तर्गत कम अवधि ( 8-12 दिन) की पौध रोपी जाती है। नर्सरी को यथासम्भव मुख्य खेत के समीप ही रखा जाये जिससे नर्सरी से पौध निकालने के बाद शीघ्रातिशीघ्र रोपाई हो जाये। नर्सरी हेतु 5-6 इंच उठी तथा 4 फुट चौड़ी आवश्यकतानुसार लम्बाई की क्यारियाँ बनायें । उठी हुई क्यारियों से जड़ों को बगैर नुकसान पहुँचाए पौधों को आसानी से निकाला जा सकेगा। एक हैक्टेयर खेत की रोपाई के लिये 1000 वर्गफुट की नर्सरी पर्याप्त होगी। उठी हुई क्यारियाँ निम्नानुसार तैयार करें।

पहले परत में गोबर की खाद मिलानी चाहिए

दूसरी पर्त 1.5 इंच मोटी खेत की गुरगुरी मिट्टी
 तीसरी पर्त 1 इंच मोटी सड़ी गोबर की खाद
चौथी पर्त 25 इंच मोटी खेत की भुरभुरी मिट्टी

उपरोक्त सभी पत्तों को ठीक से मिला कर भुरभुरा बना लें। एक हैक्टेयर क्षेत्रफल की रोपाई के लिये नर्सरी तैयार करने हेतु 6 किग्रा बीज की आवश्यकता होगी तैयार की गई क्यारियों में बीज को एक समान रूप से बिखेर कर सड़ी गोबर की खाद या खेत की मिट्टी को भुरभुरा करके बीज को तुरन्त ढक दें। बीज को ढकने के लिये धान के पुआल का भी उपयोग किया जा सकता है। जिससे बीज को सीधे धूप व वर्षा तथा चिडियों द्वारा पहुँचने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है। बोवाई अंकुरित बीज को क्यारियों में भी बोवा सकते हैं।

नर्सरी को मैट अर्थात् चटाई विधि से भी तैयार किया जा सकता है। चटाई विधि से नर्सरी तैयार करने पॉलीथिन या उर्वरकों की खाली बोरियों का उपयोग किया जा सकता है।

हेतु.क्यारियों में पर्याप्त नमी बनाये रखने के लिए फव्वारा विधि से सिंचाई करना श्रेयस्कर होगा। सिंचाई क्यारियों के मध्य बनाई नालियों में पानी चलाकर भी की जा सकती है।

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खेत की तैयारी

सामान्य धान की फसल हेतु तैयार किये जाने वाले खेत की भाँति ही श्री पद्धति के लिये भी खेत तैयार किया जाता है। फसल अवधि की शुरुआत में विशेष ध्यान देने के लिए जल निकासी के लिए सही प्रबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

मार्कर का प्रयोग रस्सी में निर्धारित दूरी पर गाँठें या लकड़ी लगाकर रोपाई रस्सी के सहारे निर्धारित दूरी पर की जा सकती है। इसके अतिरिक्त दूरी निर्धारित करने के लिये लकड़ी या लोहे के बने वर्गाकार मार्कर का निशान लगाने के लिये भी प्रयोग किया जा सकता है। रोपाई कार्य को जल्दी पूरा करने के लक्ष्य से, किसान खेत में एक दिन पहले भी मार्कर के माध्यम से रोपाई कर सकते हैं।

रोपाई :

श्री पद्धति के अन्तर्गत मात्र 8-12 दिन पुरानी पौध प्रयोग की जाती है। अतः पौध को खुरपी की सहायता से इस प्रकार निकालें कि पौध में बीज चोल एवं जड़ों में मिट्टी लगी रहे। यदि मैट विधि से नर्सरी डाली गई है तो मैंट को सीधे उठाकर रोपाई वाले खेत के पास ले जा सकते हैं।

8-12 दिन अवधि की 2-3 पर्णीय पौध को 25 सेनी, से 25 सेमी. की दूरी पर 2-3 सेमी. की गहराई पर अंगूठे एवं अनामिका अंगुली की सहायता से एक-एक पौध बीज चोल एवं मिट्टी सहित प्रति हिल बगैर पानी भरे खेत में लगायें।

पौध की रोपाई जिस बिन्दु पर ऊर्द्धकार एवं समानान्तर लाइन एक दूसरे को काटे पर करें। पौधे की जड़ों को सूखने से बचाने के लिए पौधशाला से पौध निकालने के बाद आधा घण्टे के अन्दर लगाने का प्रयास किया जाना चाहिए।

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खरपतवार नियन्त्रण:

खरपतवार नियन्त्रण हेतु यांत्रिक विधि काफी सस्ती एवं उपयुक्त पाई गई है। वीडर के चलाने के लिये यह नितान्त आवश्यक है कि पौधों से पौधों की तथा लाईन से लाईन की दूरी अधिक हो जिससे दोनों ही ओर से वीडर को आसानी से चलाया जा सके।

वीडर के द्वारा खरपतवार नियन्त्रण करने से खरपतवार खेत में ही पलटकर मिट्टी में दबने से सड़कर जैविक खाद का काम करते है जिससे पौधों को पोषक तत्व प्राप्त होते है। वीडर के प्रयोग से खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाती है और मृदा में वायु संचार बढ़ जाता है।

जड़ों के पूर्ण विकसित होने के फलस्वरूप पौधे की वानस्पतिक एवं पुनरूत्पादक वृद्धि अधिक होती है। रोपाई के 10 दिन बाद से 10 दिन के अन्तराल पर 3-4 बार वीडर चलाकर खरपतवारों का नियन्त्रित किया जाना आवश्यक है। वीडर के सुचार संचालन हेतु खेत में नमी होना आवश्यक है। श्री पद्धति के तहत धन की रोपाई दूरी पर की जाती है तथा कालान्त

वीडर के दाँतों से चिपकी मिट्टी छुड़ाने की व्यवस्था हो ।
वीडर हल्का एवं टिकाऊ हो ।

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