तोरिया की उन्नतशील खेती करने का बेहतरीन तरीका (2023-24)

आज हम अपने ब्लॉग में तोरिया की उन्नतशील खेती के बारे में बात करेंगे | तोरिया की खेती करना एक बहुत आसान और सुलभ खेती है जिससे आप पैसे में अच्छी कमाई भी कर सकते हो | Toriya ki Unnatsheel kheti is Good Farming For Money Gain .

तोरिया की उन्नतशील खेती करने का तरीका

प्रभावी बिन्दु

1. बुवाई 15-20 दिन के भीतर विरलीकरण अवश्य करें।
2.पंक्तियों में समय से बुवाई सुनिश्चित करें।
3. 25-30 दिन की अवधि पर पहली सिंचाई करें।
4. आरा मक्खी एवं माहू से बचाव अवश्य करें।

खेत की तैयारी :

पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 जुताई देशी हल से करके पाटा देकर मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए।

भूमि शोधन :

फसल को भूमि जनित रोगों से बचाने के लिए ट्राइकोडर्मा 2 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.5 किग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर 60-75 किग्रा. सड़ी हुई गोबर की सड़ी हुई खाद में मिलाकर हल्के पानी का छीटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त आखिरी जुताई के समय खेतों में मिला दें दीमक, सफेद गिडार, सूत्रकृमि, जड़ की सूण्डी, कटवर्म आदि कीटों से बचाव हेतु ब्यूवेरिया बैसियाना 1 प्रतिशत डब्लू.पी. बायोपेस्टीसाइड की 2.5 किग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर 60-75 किग्रा. गोबर की सड़ी हुई खाद में मिलाकर हल्के पानी का छीटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त बुआई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देना चाहिए ।

उन्नतशील प्रजातियां :

क्र.स.प्रजातियाँउत्पादन क्षमता (कु./हे.)पकने की अवधि (दिन)उपयुक्त क्षेत्र
1.टा.-9 (काली)12-1590-95सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
2.भवानी (काली)10-1275-80सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
3.पी.टी.-303 (काली)15-1890-95सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
4.पी.टी. – 30 (काली)14-1690-95उ.प्र. का तराई क्षेत्र
5.तपेश्वरी14-1590-91सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
6.आजाद चेतना12-1490-95सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
7.उत्तरा13-1690-95

सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
तोरिया की उन्नतशील खेती
तोरिया की उन्नतशील खेती

बीज दर :

4 किग्रा. बीज एक हेक्टर क्षेत्रफल की बुवाई के लिए पर्याप्त होता है।

बुवाई का समय :

तोरिया के बाद गेहूँ की फसल लेने के लिए इनकी बुवाई सितम्बर के प्रथम पखवारे में समय मिलते ही अवश्य कर लेनी चाहिए, परन्तु भवानी प्रजाति की बुवाई सितम्बर के दूसरे पखवारे में ही करें।

उर्वरक की मात्रा :

उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी परीक्षण की संस्तुति के आधार पर किया जाना सर्वोत्तम है। यदि मिट्टी परीक्षण सम्भव न हो पाये तो :

  1. असिंचित क्षेत्रों में 50 किग्रा नत्रजन तथा 20 किग्रा. फास्फोरस प्रति हे. की दर से सबसे लास्ट जुताई के में इसका उपयोग करना चाहिए |
  2. सिंचित क्षेत्रों में 100 किग्रा नत्रजन तथा 50 किग्रा. फास्फोरस प्रति हेक्टर देना चाहिए। फास्फेट का प्रयोग सिंगिल सुपर फास्फेट के रूप में अधिक लाभदायी होता है क्योंकि इससे 12 प्रतिशत गन्धक की भी उपलब्धता हो जाती है। सिंगिल सुपर फास्फेट के न मिलने पर 2 कुन्तल जिप्सम प्रति हे. का प्रयोग करें। फास्फोरस की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा अन्तिम जुताई के समय नाई या चोंगे द्वारा बीज से 2-3 सेमी. नीचे प्रयोग करना चाहिए। नत्रजन की शेष मात्रा पहली सिंचाई (बुवाई के 25 से 30 दिन बाद) टाप ड्रेसिंग के रूप में देना चाहिए। अधिकतम उपज के लिए 90 किग्रा. नत्रजन तक दिया जा सकता है।

बुवाई की विधि :

बुवाई लाइनों में करनी चाहिए। बुवाई के बाद बीज ढकने के लिए हल्का पाटा लगा देना चाहिए। बुवाई 30 सेमी. की दूरी पर 3 से 4 सेमी. की गहराई पर LINO में करना चाहिए।

निराई-गुड़ाई:

बुवाई के 15 दिन के अन्दर घने पौधों को निकालकर पौधों की आपसी दूरी 10 से 15 सेमी. कर देनी चाहिए तथा खरपतवार नष्ट करने के लिए 35 दिन की अवधि पर एक निराई-गुड़ाई भी कर देनी चाहिए। खरपतवार नष्ट करने के लिए 3.3 लीटर प्रति हे. पेन्डीमेथलीन 30 प्रतिशत ई.सी. का प्रयोग बुवाई के 3 दिन के अंदर प्रयोग करें।

सिंचाई :

तोरिया फूल निकलने तथा दाना भरने की अवस्थाओं पर जल की कमी के प्रति विशेष संवेदनशील है। अतः अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए इन दोनों अवस्थाओं पर सिंचाई करना आवश्यक है। यदि एक ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो वह फूल निकलने के पूर्व (बुवाई के 25-30 दिन बाद) करें ।

फसल सुरक्षा :

बीज शोधन :

बीज जनित रोगों से सुरक्षा के लिए यथासम्भव संशोधित उपचारित एवं प्रमाणित बीज ही बोना चाहिए। यदि यह सम्भव न हो तो निम्नांकित विधि से बीजोपचार करके बुवाई करना चाहिए । बीज जनित रोगों से सुरक्षा के लिए 2.5 ग्राम थीरम /KG बीज की दर से बीज को उपचारित करके बोयें –
खड़ी फसल पर कीट रोग उपचार :

अ- क्षेत्र :

अल्टरनेरिया झुलसा :

पहचान : इस रोग में पत्तियों तथा फलियों पर गहरे कल्थई रंग के धब्बे बनते हैं, जिसमें गोल-गोल छल्ले केवल पत्तियों पर स्पष्ट दिखाई देते हैं।
उपचार : झुलसा सफेद गेरूई तथा तुलासिता रोग की रोकथाम हेतु निम्नलिखित में से किसी एक रसायन का छिड़काव प्रति हेक्टर 500-600 लीटर पानी में मिलाकर करें-

  • मैकोजेब 75 प्रतिशत डब्लू.पी. 2 किग्रा. ।
  • जिनेब 75 प्रतिशत डब्लू.पी. 2.5 किग्रा. । 2. सफेद गेरूई :
  • जीरम 80 प्रतिशत डब्लू.पी. 2 किग्रा. । • जीरम 2 प्रतिशत ई.सी. के 3 लीटर ।
    पहचान : इस रोग में पत्तियों की निचली सतह पर सफेद फफोले बनते हैं और बाद में पुष्प विन्यास विकृत होता है। उपचार : इसकी रोकथाम भी उपयुक्त रसायनों से की जा सकती है।
    नोट : 30 दिन की फसल पर एक अवरोधक SPRAY करना लाभदायक होगा।

ब- कीट :

1. आरा मक्खी :

पहचान : इसकी गिडारें सरसों कुल की सभी फसलों को हानि पहुँचाती हैं, गिडारें काले रंग की होती है, जो पत्तियों को बहुत तेजी से किनारे से अथवा भिन्न आकार के छेद बनाती हुई खाती हैं, जिससे पत्तियां बिल्कुल छलनी हो जाती है।
उपचार : निम्नलिखित किसी एक कीटनाशक रसायन का प्रति हेक्टर की दर से प्रयोग करें-

2. मॉहू :

मैलाथियान 50 ई.सी. 1.5 लीटर।
क्यूनालफास 1.5 प्रतिशत धूल 20 किग्रा. ।
इसकी पहचान : यह छोटा, मुलायम शरीर वाला, हरे मटमैले Color का कीट होता है, और ये पत्तियों, फूलों उठलों, फलियों आदि में चिपककर धीरे-धीरे चूसकर पौधे को कमजोर कर देते हैं।
उपचार : निम्नलिखित कीटनाशक रसायन की संस्तुत मात्रा प्रति हे. की दर से प्रयोग करें-


• क्राइसोपर्ला कार्निया के 50000 अण्डे प्रति हे. 10 से 15 दिन के अन्तराल पर दो बार प्रयोग करें।
आक्सीडिमेटान मिथाइल 25 ई.सी. 1 लीटर या ट्रोथियान 50 ई.सी. 1 लीटर या क्लोरपायरीफास 20 प्रतिशत ई.सी. 0.75 लीटर या मोनोक्रोटोफास 36 प्रतिशत ई.सी. 0.75 लीटर क्वीनॉलफास 25 ई.सी. 1.5 लीटर प्रति हे. ।

3. बालदार गिडार (भुड़ली) :

पहचान : इस भुड़ली के शरीर का रंग पीला अथवा नारंगी होता है परन्तु सिर पर पीछे का भाग काला होता है तथा शरीर पर घने काले बाल होते हैं।
उपचार : इसकी रोकथाम के लिए निम्न उपचार करें-


(क) प्रथम अवस्था में गिडार झुण्ड में पाई जाती है। उस समय उन पत्तियों को तोड़कर एक बाल्टी मिट्टी के तेलयुक्त पानी में डाल दिया जाय, जिससे गिडार नष्ट हो जाये।
 (ख) विभिन्न अवस्थाओं की गिडारों की रोकथाम हेतु निम्नलिखित में से किसी एक कीटनाशक रसायन का प्रति हेक्टेयर बुरकाव / छिड़काव किया जाये-
क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. 1.25 लीटर ।
क्वनालफास 25 ई.सी. 1.25 लीटर ।

कटाई- मड़ाई :

जब 75 प्रतिशत फलियां सुनहरे रंग की हो जायें फसल को काटकर, सुखाकर व मड़ाई करके बीज अलग करना चाहिए। देर करने से बीजों को झड़ने की आशंका रहती है। बीज को खूब सुखाकर ही भण्डारण करना चाहिए। जैसे ही फलियां सुनहरी पीले रंग की पड़ने लगे फसल काट ली जाय। इसका कोई कुप्रभाव उपज व तेल पर नहीं पड़ेगा।

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